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आधुनिक युग में भी डायन बताकर महिलाओं को उतारा जा रहा है मौत के घाट

Mar
29 2017

पुष्यमित्र

मैं यह शब्द इस्तेमाल नहीं करना चाहता था, मगर मजबूरी में करना पड़ा कि हमारे गंवाई समाज की जहालत खत्म होने का नाम नहीं ले रही। कल पूर्णिया जिले के रुपौली से खबर आई कि डायन होने के संदेह में लोगों ने एक 85 साल की वृद्धा को जिंदा जला दिया। लोगों का शक था कि एक बच्चे की मौत उस वृद्धा के जादू-टोने से हुई है। जबकि उसकी मौत सर्प दंश की वजह से हुई थी।

यह शक सामूहिक चेतना में बदल गया और उस बेचारी बूढ़ी को जिसके बारे में तमाम लोगों ने मान लिया था कि उसने ही सांप को बुलवा कर उस बच्चे को कटवा दिया था, पुआल के ढेर पर धकेल दिया और आग लगा कर जिन्दा जला दिया। इस नफरत से भरी हिंसक कार्रवाई के पीछे अमूमन सर्वसम्मति रही होगी। अक्सरहाँ कहा जाता है कि आदमी पढ़ लिख कर क्रूर हो जाता है, मगर अनपढ़ जमात भी मौके पर क्रूरता प्रदर्शित करने में चूकता नहीं है।

किसी महिला को डायन बताकर हत्या करना, उसे नंगा घुमाना, सर मुंडवाना, मैला पिलाना यह सब आज की तारीख में भी उसी तरह हो रहा है, जैसे पिछली सदी में होता था। झारखंड में पिछले एक दशक में माओवाद की वजह से जितनी हत्याएं हुई हैं, डायन बताकर उससे कम हत्याएं नहीं हुई हैं। एक दफा हमने इसका आंकड़ा भी प्रकाशित किया था।

लोग आज भी समझने के लिये तैयार नहीं है कि डायन या ओझा गुनी में इतनी ताकत नहीं होती कि अपने मन्त्र से किसी की हत्या कर दे। हालांकि सरकार ने कानून बना रखा है कि कोई किसी को डायन कह कर संबोधित नहीं कर सकता। कुछ साल पहले मधेपुरा के एक गांव ने यह तय किया था कि अगर गांव का कोई व्यक्ति किसी महिला को डायन कह कर संबोधित करता है तो उसपर एक हजार रूपये का जुर्माना किया जायेगा।

एक तरफ हमारे पास ऐसी मिसालें हैं तो दूसरी तरफ रुपौली जैसी क्रूरताएं। निश्चित तौर पर यह एक सामाजिक समस्या है और समाज बदलेगा तभी यह खत्म होगा। मगर इसमें सरकार की भी बड़ी भूमिका है। ऐसे मामले में पुलिस प्रशासन को सख्ती से पेश आना चाहिये और कार्रवाई में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिये। अगर कानून का डंडा सख्त होगा तो भयवश ही सही लोग ऐसे अपराध को दुहराने में डरेंगे।

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पुष्यमित्र

लेखक सामाजिक सरोकारों और विकास के मुद्दों पर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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