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कविता

 

फहराएंगे कल तिरंगा आराम से

अरुण कान्त शुक्लाहाकिम का नया क़ायदा है रहिये आराम से, गुनहगार अब पकडे जायेंगे नाम से,हाकिम को पता है उसकी बेगुनाही,वो तो सजावार है उसके नाम से,उसका सर झुका रहा कायदों की किताब के सामने,हाकिम...

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झूठ का बाज़ार

प्रभा शर्मा जी हाँ येझूठ का बाज़ार हैझूठ ही आचार हैझूठ ही विचार हैयहाँ झूठ की खिचड़ी पकाई जाती हैजी हाँ फिर मिल बाँट कर खाई जाती हैयहाँ  झूठ की दिवाली रोज़ मनती हैयहाँ सच...

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अभी आज़ाद होना बाकि है,,

नैना शर्मा आधी डगर चल चुके हैं,आधी चलना बाक़ी है,स्वतन्त्र तो हम हो चुके हैं,अभी आज़ाद होना बाक़ी है।।है इंतज़ार हमें ग़ुलामी की ज़ंज़ीर खुलने का,कुछ जंजीरे टूट गईं,कुछ को तोडना बाक़ी है,अभी आज़ाद होना...

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हम आज़ाद हैं.....!!!!!

नैना शर्मा हम आज़ाद है,जकड़े हैं हमारे पावँ,रूढ़ियों की बेड़ियोँ में,पकड़े है हमारे हाथ झूठी दलीलों ने,पर हमको ख़ुद में ग़ुमान है,हम आज़ाद है, देश आजाद है।।न जाने कितने ही साल गुज़र गए,न जाने कितने...

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कि हम बाज़ार जाते हैं ....

दिनेश मालवीय "अश्क"दिलाओ कुछ हमें हिम्मत कि हम बाज़ार जाते हैंख़ुदा बक्शे हमे ताक़त कि हम बाज़ार जाते हैं।शहर में कह रहे सब ही बड़े जीवट का बंदा हैहै फैली किस तरह शोहरत कि हम...

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13 वां जनकवि मुकुट बिहारी सरोज सम्मान समारोह का आयोजन 26 जुलाई को ग्वालियर में

भोपाल :  22 जुलाई/ जनकवि मुकुट बिहारी सरोज स्मृति न्यास, ग्वालियर द्वारा 2005 से हर साल जनकवि मुकुट बिहारी सम्मान से कवियों को सम्मानित किया जाता है। इस साल के 13 वां जनकवि मुकुट बिहारी...

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"लगता सावन आ गया है"

नैना शर्मा कहीं मेढक टर टर्रा रहे,कोयल कूँक रही,चिड़ियाँ फ़ुदक कर चहचहा रही,लगता सावन आ गया है।।कहीं बरखा सी बिखर रही,कहीं काली घटा उमड़ घुमड़ रही,आसमान में बिजली की तालियां बजने लगी,लगता सावन आ गया...

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अन्नदाता-जन्मदाता

नैना शर्माझुलस गई है धरती,आसमां बिलख कर रो गया,जो था सबका अन्नदाता,अन्नदाता,जन्मदाता,आज वो काल के गाल में सो गया।।कभी जो कारण था दूसरों की खुशियों का,आज वो अपनों के गम का कारण बन गया,जो करता...

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नया इतिहास रच दिखाऊँगी

नैना शर्मा आज संसार विमुख,मैं विरक्त हो गईं,छाई थी जो लालिमा,होकर निरक्त,मैं निशक्त हो गईं।।था बड़ा अभिमान,मुझे अपनी बुद्धि और ज्ञान पर,होकर विफ़ल,आज ख़ुद से भी त्रस्त हुई,आज संसार से विमुख,,,,,,,,,,,,,मन में है लालसा,एक ही...

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ज़िन्दगी----"कविता"

नैना शर्माआज न जाने क्यूँ मैं बंजर हो गईं,जहाँ थी कभी खिली हरियाली,वो ज़मीन आज बंजर हो गई।।कभी खिलते थे फूल यहां,आज ये जमीं काँटों से ढक गई,कभी बसन्त महकता था,सरसों के खेतों में,बौराता था...

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