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आर्थिक विषमताः तीन आने बनाम पंद्रह आने

Oct
15 2017

जयराम शुक्ल

मुट्ठीभर गोबरी का अन्न लेकर लोकसभा पहुंचे डा.राममनोहर लोहिया ने प्रधानमंत्री नेहरू से कहा-लो तुम भी खाओ इसे, तुम्हारे देश की जनता यही खा रही है। आज अखबार में जब विश्व के हंगर इन्डेक्स में 119 देशों में भारत के 100 वें स्थान में रहने की स्थिति के बारे में पढा तो 1963 का नेहरू-लोहिया का ये प्रसंग जीवंत हो गया जिसमें लोहिया ने तीन आने बनाम पंद्रह आने की वो ऐतिहासिक बहस की थी। दरअसल लोहिया ने रीवा  के एक गाँव की एक महिला को गोबर से भोजन के लिए अन्न छानते देखा था और इतने मर्माहत हुए कि वही गोबरी का मुट्ठी भर अन्न लिए सीधे लोकसभा पहुंच गए थे। लोहिया ने सदन में कहा कि देश की जनता तीन आने रोजाना में जी रही है और उसके प्रधानमंत्री पर पचीस हजार रुपए खर्च हो रहे हैं। देश के जनता की स्थिति तो प्रधानमंत्री निवास में रह रहे कुत्ते से भी गई गुजरी है क्योंकि उसपर तो तीन आने से भी ज्यादा खर्च होता है। नेहरू इतने विचलित हो गये कि इसके जवाब में तथ्य देने की बजाए यह कहा - लोहिया का दिमाग सड़ गया है, देश की जनता की रोजाना आमदनी पंद्रह आने है। लोहिया ने चुनौती दी कि यदि मेरी बात गलत निकल जाए तो मैं लोकसभा हमेशा के लिए छोड़ दूंगा। नेहरू ने योजना आयोग के उपाध्यक्ष समेत अपनी पूरी आर्थिक सलाहकार परिषद को लगा दिया लेकिन सभी मिलकर भी लोहिया की बात को झुठला नहीं सके। इतिहास में यही घटनाक्रम..तीन आने बनाम पंद्रह आने..की बहस के नाम से जाना जाता है।

देश में आर्थिक विषमता को लेकर हुई इस बहस के पचास साल बाद भी स्थिति जस की तस से भी ज्यादा भयावह हुई है। देश का विकास हुआ है, आर्थिक आकार भी बढा है, फोर्ब्स सूची में भारतीय अमीरों की संख्या भी बढी है पर सबकुछ एक तरफा। आर्थिक विषमता की खाई उत्तरोत्तर चौड़ी होती गई। अमीर ज्यादा अमीर होते गए, गरीब ज्यादा गरीब। इन पचास सालों में देश में खतरनाक किस्म का आर्थिक ध्रुवीकरण हुआ है। मध्यवर्ग के विखंडन की प्रक्रिया आज लगभग उस मुकाम तक पहुंच गई कि उसका छोटा हिस्सा अमीरी की ओर खिसक रहा है और एक बडा हिस्सा गरीबों की कतार में लगता जा रहा है। जिस गति से इस प्रक्रिया में तेजी आई है उसे देखते हुए आप कह सकते हैं कि वह दिन दूर नहीं जब समूचा समाज अमीर और गरीब के दो फांकों में बँट जाएगा।

हमारी हैसियत का पैमाना नापने वाली रेटिंग एजेन्सियां हर साल हमारा आँकलन करके बताती हैं कि भारत में अमीरों की संख्या किस तेजी से बढ रहीहै, उसके मुकाबले गरीबी भी, भुखमरी भी, बीमारियों से मरने की संख्या भी, महिला व विपन्न वर्ग के साथ अत्याचार भी और इन सबसे ऊपर भ्रष्टाचार भी। इन रेटिंग एजेंसियों के आँकडे़ हम इसलिए मानने को मजबूर हैं क्योंकि यही एजेंसियां जब हमारी ग्रोथरेट, हमारी आर्थिक शक्ति, हमारी वैश्विक ताकत,हमारे बढते हुए बाजार के आँकडे़ पेश करती हैं तब हमारी सरकारें इसी को आधार बनाकर अपनी पीठ ठोकती हैं, इसी को आधार बनाकर खूबसूरत रंगीन प्रचार सामग्री परोसती हैं। और चलिए मानते भी हैं कि ये रेटिंग एजेन्सियां संदिग्ध हैं तो अपनी आँखों से देखते हैं किसानों को मरते हुए, अपनी आँखों से देखते हैं महिलाएं, बच्चों, कमजोर लोगों पर जुल्म होते हुए, दर-दर,दफ्तर-दफ्तर बाबू अफसरों को रिश्वत, कमीशन लेते हुए। बाजार में दो के लागत वाली वस्तुओं को दो सौ में खरीदते हुए। क्या अपनी आँखें भी संदिग्ध हैं.? नहीं उनकी आँखों में पट्टी बँधी है जिन्हें हमने ये सब देखने का जिम्मा सौंपा है।

इस सरकार के अभी साढे तीन साल पूरे हुए  हैं। सत्तर बनाम साढे तीन साल की बहस चल रही है। बहस की धारा, कौन ज्यादा बेहतर, कौन ज्यादा ल़ोककल्याणकारी नहीं वरन् कौन कम बेईमान, कौन कम भ्रष्ट की ओर मोड़ दी गई है। उदारीकरण और खुले पूँजीवाद की अंधी दौड़ में लोककल्याण की कसमें रोज टूटती हैं। हमने इसका कभी आँकलन नहीं किया कि अमेरिकी विकास माँडल के लिये हम कितने मुफीद हैं। ग्लोबलाइजेशन तो किया पर नीति में कोई चेक एंड बैलेंस का प्रावधान नहीं किया जिससे कि जरूरत पड़े तो रोल बैक किया जा सके। आर्थिक विषमता की बहस तो 90 के बाद से ही कूडेदान में डाल दी गई है। अपने राजनेताओं की हैसियत का आँकलन इस बात से होता है कि किसका किस उद्योग समूह से प्रगाढ़ रिश्ता है। खादी और मखमल की साँठगाँठ अब रात अँधेरे नहीं खुले आम कारपेट पर होती है। इनवेस्टर्स मीट में हम सरकारोँ को देखते हैं। सरकारों की स्थिति स्वयंवर में खड़ी उस युवती की भाँति होती है जिसे हैसियत वाले दूल्हे की तलाश हो। समूची ब्यूरोक्रेसी घरातियों की भाँति आव भगत में लग जाती है। क्या करियेगा जब यही लोग किसानों की जोत की जमीन को कारखाने के लिए जब्त करवा देते हैं। यही लोग श्रम कानूनों में मुश्के बँधवा देते हैं। और हम इनवेस्टमेंट और ग्रोथरेट के आँकडे़ देखकर ताली पीटते रहते हैं। जब यही नग्न सच है तो विषमता की बात कौन करेगा। लोहिया की तरह कौन मसीहा आएगा बताने कि प्रधानमंत्री जी आपके देश की जनता गोबरी का अन्न खाके जिंदा रहने की जंग लड़ रही है।

कभी पूंजीपतियों से सत्ता की साठगाँठ को बडे़ गुनाह के तौरपर देखा जाता था। इंदिरा और जयप्रकाश नारायण के बीच इसी बात को लेकर मतभेद बढा। जेपी ने इंदिरा सरकार पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इंदिरा ने जवाब में कहा ..उद्योगपतियों के रुपये पर पलते हुए आरोप लगाने वालों की वे परवाह नहीं करती। जेपी ने अपने खर्चे और आमदनी का ब्यौरा चुनौती के साथ इंदिरा जो को भेज दिया। इसके बाद भ्रष्टाचार और सत्ता की निरंकुशता के खिलाफ जो जंग छेड़ी उसका परिणाम दुनिया जानती है। लोहिया के इलाज के लिए 12 हजार रुपए इसलिये नहीं जुट पाए क्योंकि कि किसी उद्योगपति की देने की हिम्मत नहीं हुई, सरकार की मदद लेने से मना कर दिया और मजदूरों का चंदा जुटने में देर हो गई। दीनदयाल जी विकट गरीबी में पले और जिंदगी भर यायावरी करते हुए कार्यकर्ताओं के घर भोजन लिया, उन्हीं की भेंट की हुई कुर्ता धोती पहना। ये लोग उस गोबरी के अन्न की गहन मार्मिकता समझ सकते हैं और ऐसे लोगों से ही तीन बनाम पंद्रह आने की बहस की उम्मीद कर सकते हैं। राजनीति में कहां हैं ये लोग..? पूंजीपतियों के लिए स्वयंवर की राजकुमारी की भाँति सजने वाले राजनेताओं से आर्थिक विषमता पर बहस की बात छेड़ना पानी को लाठी से पीटने जैसा है।

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जयराम शुक्ल

लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार हैं.
jairamshuklarewa@gmail.com

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