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125 करोड़ की आबादी वाला हिंदुस्तान आज क्यों है बेजुबान ?

Oct
18 2017

स्नेहा चौहान

जिन लोगों को कानून की थोड़ी बहुत भी जानकारी है या नहीं भी हो तो कानून की किताब में अनुच्छेद 19, 20, 21 को गौर से पढ़ें। खासतौर पर अनुच्छेद 19 को, जिसमें आजादी के साथ ही अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को भी मौलिक अधिकार माना गया है। फिर भी 135 करोड़ की आबादी वाला हिंदुस्तान अहम मसलों पर चुप रहता है।

निजाम के बेतुके फरमानों, लोकतांत्रिक संस्थाओं के मनमाने रवैए के खिलाफ कोई बोलना नहीं चाहता। और जो बोलते हैं उनका हश्र गौरी लंकेश की तरह एक मिसाल बन जाता है। सिर्फ हिंदुस्तान में ही नहीं, बल्कि पनामा पेपर्स के भीमकाय घोटाले का अपने ब्लॉग में खुलासा कर दुनिया की कई नामी हस्तियों के चेहरे से नकाब उतारने वाली बेखौफ पत्रकार डाफने कारुआना गालिजिया की दो दिन पहले कार बम विस्फोट से हत्या इसी कड़ी की एक और मिसाल है, जो अभिव्यक्ति की आजादी को रोकने की कोशिश के रूप में देखी जानी चाहिए।

फिर भी कुछ जिगर वाले लोग ऐसे हैं, जो ब्लॉग या लेख के माध्यम से उस सच को सामने रखने का माद्दा रखते हैं, जिन्हें सहज रूप में कोई स्वीकारना नहीं चाहता। इसे मैं एक निर्भीक प्रयास मानती हूं, क्योंकि यह सड़कों पर आंखों में आसू लिए मोमबत्तियां जलाने, रैली निकालने या सोशल मीडिया पर शोक जताकर खानापूर्ति करने से तो कहीं बेहतर ही है। डाफने माल्टा की सबसे मशहूर खोजी पत्रकार थीं। उनके बेटे मैथ्यू ने अपनी दिवंगत मां की स्मृति में एक भावभीना पत्र लिखा है।

मैथ्यू लिखते हैं कि मां ने अपना ब्लॉग पूरा किया और किसी काम से बाहर निकलीं। लगभग आधे घंटे के भीतर उनकी कार में भयानक विस्फोट हुआ। ‘मेरी मां की हत्या इसलिए की गई, क्योंकि वे कानून और कानून तोड़ने वालों के बीच आ गई थीं। उन्हें इसलिए भी निशाना बनाया गया, क्योंकि ऐसा करने वाली वे अकेली पत्रकार थीं। यह तभी होता है जब देश की संवैधानिक संस्थाएं निष्क्रिय हो जाएं और तब आखिरी छोर पर नाइंसाफी के खिलाफ लड़ रहा एक अकेला पत्रकार ही अक्सर निशाना बनता है। मैं अपने जीवन में कभी नहीं भूल सकता कि मैं कैसे सड़क के किनारे अपनी मां की जलती कार की तरफ भागा, कार का दरवाजा खोलने की तमाम कोशिशें कीं। कार का हॉर्न तब भी जोरों से बज रहा था। साथ में उन दो पुलिसकर्मियों की आवाजें सुनाई दे रही थीं, जो आग बुझाने वाले इकलौते उपकरण के साथ अपनी तमाम कोशिशें कर रहे थे। आखिर में उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा, सॉरी, अब हम आपकी कोई मदद नहीं कर सकते। मैंने जमीन पर देखा। मां के शरीर के चीथड़े चारों ओर बिखरे थे। मैंने उनसे कहा- वो मेरी मां थी। वह नही रहीं, क्योंकि आप लोग उसे बचाने में नाकाम रहे। आप लोगों की लापरवाही इस घटना को टाल नहीं पाई।’

मैथ्यू आगे कहते हैं, ‘यह जंग जैसी स्थिति है। हमें यह समझना होगा। यह कोई सामान्य हत्या नहीं है। जब आपके चारों ओर आग और खून फैला हो तो वह युद्ध की स्थिति है। हम सरकार और संगठित अपराधियों के खिलाफ इस जंग में फंसे लोग हैं। इस गठजोड़ को खत्म करना आसान नहीं है। माल्टा की सरकार ने खुद को दंड से बचाने के लिए अच्छे उपाय कर रखे हैं। इसलिए पीएम के लिए यह कहना बहुत आसान है कि घटना के लिए जिम्मेदार लोगों की गिरफ्तारी होने तक वे चैन की सांस नहीं लेंगे। लेकिन उन्हीं की सरकार में बदमाशों की फौज तैनात है, पुलिस में भी ऐसे अधिकारी हैं और यहां तक कि कोर्ट में भी अकर्मण्य लोगों की कमी नहीं है। अगर सरकारी एजेंसियां अपना काम इमानदारी से करतीं तो इस तरह की हत्या की जांच की जरूरत ही क्या है ?’

यह गुस्सा है एक बेटे का, जिसने अपनी मां के शव को चीथड़ों में बिखरा देखा है। यह बगावत है एक ऐसे युवा की, जिसके परिवार को कई बार धमकियां मिलीं और हर बार शिकायत करने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई। क्या आपको नहीं लगता कि नाइंसाफी, छल-कपट, धोखेबाजी या व्यवस्था की गड़बड़ियों को उजागर करने वाले स्वतंत्र लेखकों, ब्लॉगर, कॉलमिस्ट को बजाय डरने के अपनी आवाज को और बुलंद कर चारों ओर फैलाने की जरूरत है।

दिलचस्प बात यह है कि गौरी लंकेश की निर्मम हत्या के बाद फेसबुक पर ट्रोल्स (विनोद दुआ इसे भौंकने वाले मानते हैं) के खुशियां मनाने की तर्ज पर ही माल्टा के ही एक पुलिस अधिकारी ने इस हत्या का सरेआम स्वागत किया। यही नहीं, मामले की तफ्तीश करने वाली एक जज ने खुद को जांच से हटाने की दरख्वास्त करते हुए कहा है कि वह भी डाफने के ब्लॉग में निशाने पर थीं।

मैथ्यू का बेबाक बयान और उसका गुस्सा इस बात की गवाही देता है कि मानहानि, मुकदमे और ट्रोल्स की धमकियों को नजरअंदाज कर सच को सामने रखने की हिम्मत जुटाएं, क्योंकि वे लाख कोशिश कर लें जीत आखिर में सच की ही होगी।

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स्नेहा चौहान

स्नेहा चौहान सामाजिक सरोकारों को लेकर सक्रिय स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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