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दीपावली, दशरथ से वनवास द्वारा दशानन वध तक की यात्रा है

Oct
18 2017

राकेश कुमार

हम घर मे बाल्मीकी रामायण और रामचरित मानस में पढ़ते आए हैं | वर्षों तक पाठ करने और मनन करने के बाद, अनेक साधुओ से चर्चा और सत्संग से कुछ नया उभर रहा था पर प्रमाणित नहीं हो पा रहा था | एक दिन ध्यान करते समय सारे तथ्य जुड़ गए और सब स्पष्ट हो गया |

दशरथ अर्थार्त दस + रथ, अब ये दस क्या है ? आगे लिखा, ये रथ दस दिशाओ में दौड़ता था | ऐसा कोई वाहन तो विज्ञान आज भी नहीं बना पाया तब ये गप्प लगने लगता था! अचानक एक दिन विचार आया, कहीं ये रथ मन तो नहीं, तुरंत ध्यान आया कि योगदर्श्न में मन को पाँच क्रमेन्द्रियों और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का स्वामी कहा गया है और वह हर दिशा में चला भी जाता है तो दशरथ मन का प्र्तिरूप हैं |

मन तीन गुणो के अधीन रहता है सत्व, रज और तम. कौशल्या सुमित्रा और कैकयी दशरथ को तीनों उपलब्ध हैं पर दशरथ की प्रीति कैकई से है| तमोगुण आलसी है वह स्वयं कुछ नहीं करता पर जब मंथरा का प्रभाव पड़ता है तो मन को आत्मा (राम ) से अलग करता है पर जब शत्रुघ्न मंथरा को अलग कर देते हैं
तो कैकयी पश्चाताप करती है |

इधर राम रूपी आत्म तत्व लक्ष्म्ण (लक्ष्य के लिए समर्पित मन) को साथ ले वन साधना हेतु पहुचते हैं साथ है कुंडलिनी शक्ति की प्रतीक सीता | अब साधना प्रारम्भ हुई. साधना के प्रारम्भ में आती हैं सुपर्णखा। जब भी हम साधना के लिए बैठते हैं हमारे शरीर में खुजली सी उठती है. यदि साधक लक्ष्य के प्रति सजगता (लक्ष्मण ) नही आई तो अपने सुंदर नखों से खुजाना प्रारम्भ कर साधना से पतित होते है. अच्छा साधक राम, लक्ष्मण की सहायता से इन भावो की नाक ही काट डालता है|

जब सूपर्णखा पराजित होती है तो हमारे नकारात्मक एवं सकारात्म्क भाव, जो हमें आगे बढ़ने से रोकना चाहते हैं वे रावण या दशानन के रूप में अलग अलग वेश बना कर आते हैं | क्रम से देखें तो ये हैं:

1- काम 2- क्रोध 3- मोह 4- लोभ 5- मद 6- मत्सर्य (ईर्ष्या) 7- मानस 8- बुद्धि 9- चित्त 10- अहंकार

जब तक दशानन बुद्धि और चित्त के अनुशासन में है तब तक वह ग्रंथ लिखता है, शिव को प्रसन्न करता है, प्रगति के नए सोपान लिखता है. पर जब अन्य अवगुण प्रभावी होते हैं तो सीता का हरण करता है|

शक्ति विहीन साधक राम लक्ष्मण के साथ अब अपने उद्धार के मार्ग खोजता है! इस यात्रा में उन्हें (पवन + पुत्र) हनुमान मिलते हैं. उनकी मदद (प्राणायाम द्वारा वायु अथवा सांस के द्वारा मन का निग्रह ) से सुग्रीव ( सुंदर ग्रीवा या गर्दन ) को शासन अर्थात सिद्धियाँ मिलती हैं | सिद्धियों के सुख में डूबते साधक को, लक्ष्मण फटकार लगाते हैं तो कुंडलिनी ( सीता ) का पता लगता है , पर दशानन (अहंकार ), विभीषण (शरनागति ) और कुंभकर्ण (छ्ह मास शयन छ्ह मास जाग्रत कभी सत और कभी तम के अधीन) के साथ युद्ध के लिए तैयार है |

अहंकार में शरनागति के लिए स्थान नही अतः विभीषण दशानन को छोड़ जाता है. कुंभकर्ण दशानन को काम और मोह के जंजाल में न फंस, लड़ने से बचने की सलाह तो देता है पर अंत में खुद , दशानन की ही बात मान बैठता है और पराभाव को प्राप्त होता है |

इधर साधक मन के उठाए हज़ारों तर्क वितर्क के मेघों के नाद में अपनी चेतना (लक्ष्मण शक्ति) खो बैठता है | अब मायावी मोहक लंका मे खोजना पड़ता है सुशैन वैद्य, जो प्रतीक है खोज, द्रढ़ता, संकल्प, साहस और सतत प्रयास का !

विष्णु सहस्त्र नाम मे सुशैन को विष्णु का 540 वां नाम माना गया है. पुनः मदद लगती है हनुमान की पर इस बार प्राणायाम प्रत्याहार बन जाता है. जैसे ही दशरथ की दस इंद्रियाँ संसार से विमुख हो अंतर्मुखी होती हैं शक्ति की कामना करने वाला साधक संजीवनी ऊर्जा का पूरा पहाड़ ही पा जाता है | इस नयी ऊर्जा से ओत प्रोत साधक दशानन के भिन्न शीशों को प्राणायाम की अग्नि से जला डालता है ! अब वे पुनः जीवित नहीं हो सकते |

योग दर्शन मे इन संस्कारो की उपमा भुने चने से की गयी है जो अब दुबारा उगने में असमर्थ है | ब्रह्मानन्द कहते हैं:

छोड़ दुनिए के मज़े सब, बैठ कर एकांत में,
ध्यान धर हरि का, चरण का, फिर जनम नही आयेगा।

अब राम रूपी साधक और सीता रूपी कुंडलिनी के मिलन के बीच दशानन, अपने अंतिम शीश “अहंकार” के रूप में ही शेष है. धैर्य और एकाग्रता से साधक राम अपने अहंकार को विलीन (मरते) देखता है. चूंकि उसने दशानन पर विजय पायी है तो दशरथ से बिछुड़ा राम इस दिन को दशहरा घोषित करता है|

दशानन के मरते ही राम को सीता से मिलन का अवसर मिलता है | या कहें की कुंडिलिनी अपने अंतिम लक्ष्य पर पहुँच गयी. अब वन की, साधना की, जरूरत समाप्त हुई ! अब योग जप तप का समय बीता !

कबीर के शब्दों में कहें तो:

मनुआ तो निर्मल भय जैसे गंगा नीर
पाछे पाछे हरी फिरें क़हत कबीर कबीर।

अब साधक लौट आता है. नव द्वारा पूरी अयोध्या ( मनुष्य शरीर ) में जो उसका पतित पवन धाम हैं, उसके हृदय में जलती है आत्मज्ञान की ज्योति। उस प्रकाश से जुडने के लिए संसार मनाता है दीपावली।

जब भी कोई साधक साक्षात्कार की आत्म ज्योति में प्रदीप्त हो उठता है तब तब मनती है दीपावली।

राम के लिए मनी, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शंकर, समर्थ, रामदास, मीरा, सूर, कबीर, ज्ञानेश्वर, नरसी, चैतन्य, नामदेव, दयानंद , रामकृष्ण, विवेकानंद, हमारे यहाँ, मंसूर, रबिया, साई, लाओत्से कहीं और. हम कहाँ जान पाते हैं, हम कब देख पाते हैं, हम कब जान पाते हैं, ये पटाखे और हैं सुमेरु ( लचीली रीढ़) मैं छूटने वाले और वे पटाखे न प्रदूषण फैलाते हैं, न किसी न्यायालय की सीमा मे आते हैं.

अद्भुत हैं वे, अद्भुत हैं आप, शुभ दीपावली पुनः एक बार.

कामना है
बिछुड़ें आप भी,
अपने दशरथ से,
करने विजय,
अपने ही दशानन पर.

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About Author

राकेश कुमार

राकेश कुमार प्रबंधन में FMS दिल्ली विश्वविद्यालय से परास्नातक हैं और सार्वजनिक क्षेत्र की वित्तीय संस्था में महाप्रबंधक हैं. 40 वर्ष से अष्टांग योग अध्येता, भारतीय दर्शन की आधुनिक भारत में प्रसांगिकता पर भी काम कर रहे हैं. रामायण, गीता व योग दर्शन को प्रबंधन में उपयोगी बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं.

email: rksp01@yahoo.com, mobile: 918527131122

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