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तय स्क्रिप्ट पर "कॉंग्रेसी सत्याग्रह", सफलता को चुनाव तक बनाये रखना होगी चुनौती

Jun
16 2017

विनय द्विवेदी

मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन ने जहां एक और देश और प्रदेश स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए राजनितिक तौर पर चुनौती पेश कर दी है वहीँ दूसरी ओर विपक्ष को जबरदस्त राजनितिक अवसर दिया है साथ ही अन्ना आंदोलन के बाद राष्ट्रीय स्तर पर एक नए आंदोलन की मजबूत संभावना को भी जन्म दिया है. मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की रणनीतिक गलती से सरकार और भाजपा बैकफुट पर आ गई है और इससे सुस्त-सुप्त कांग्रेस में ताजी ऊर्जा के साथ संगठित सक्रियता साफ़ नजर आ रही है। इस दौर में किसान के आक्रोश के अलावा भी और कई कारक हैं जो भाजपा के लिए आने वाले दिनों में गंभीर राजनितिक चुनौती पेश करने वाले हैं। मध्यप्रदेश में चूँकि नवंबर 2018 में विधानसभा चुनाव हैं ऐसे में प्रदेश के राजनितिक सूरतेहाल में बहुत कुछ घटित होने के ठोस हालात साफ़ दिखाई देने लगे हैं। अब भाजपा और प्रदेश सरकार चाहे जितनी राजनीतक और सरकारी कोशिश कर ले पिछले 13 साल के विजय अभियान को जारी रखने की, लेकिन गेंद अब कांग्रेस के पाले में हैं और इसी पाले के खिलाड़ियों के राजनीतक कौशल, टीम भावना, साहस और मेहनत से 2018 में प्रदेश की सत्ता का फैसला होने वाला है।

राजनीतक इतिहास और इसके विशेषज्ञ की बात माने तो सत्ता के मिल सकने की संभावना राजनितिक दलों और गठबंधनों में एका बढ़ाती है और सत्ता से दूर होने की संभावना और स्थितियां राजनीतक बिखराव पैदा करती हैं। इस विचार के आधार पर मध्यप्रदेश की राजनीतक स्थिति को देखने पर मौजूदा राजनितिक कारक और कारण ये इशारा तो कर ही रहे हैं की प्रदेश में कांग्रेस फिर से अपनी खोई हुई ताक़त को पाने की कोशिश में अपने राजनीतक औजारों के साथ मैदान में आ डटी है जो पिछले एक दशक से अधिक समय से मैदान से बाहर थी। आईने पर पड़ी राजनीतक धूल भले अभी साफ़ होना शुरू हुई हो लेकिन इसमें एक धुंधली सी तस्वीर जरूर नजर आने लगी है। जैसे जैसे वक़्त बीतेगा और विधानसभा चुनाव नजदीक आएंगे ये तस्वीर और अधिक साफ़ दिखने लगेगी।

पिछले 13 साल कांग्रेस नेतृत्व को ये समझने में लगे कि वो अब सत्ता से बाहर हैं। ये बात इसलिए की इन्हीं सालों में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कई बार आरोपों के घेरे में आये लेकिन कांग्रेस के बयानवीर नेताओं की राजनितिक भागदौड़ तो दूर चहल कदमी भी जमीन पर नहीं दिखी। लेकिन प्रदेश के किसानों की करबट की ध्वनि कांग्रेस को सुनाई पड़ गई। मंदसौर के जिस किसान आंदोलन की धमक अब देश व्यापी दिखाई दे रही है उस आंदोलन का नेतृत्व कांग्रेस के हाथ में तो था ही नहीं। राजनितिक अवसर को "कैच" कर लेने के लिए आतुर कांग्रेस को अब मैच के जीत सकने की उम्मीद दिखने लगी है। क्रिकेट में कहा जाता है कैच पकड़ों-मैच जीतो। कांग्रेस के लिए राजनितिक चुनौती तो अब शुरू हुई है. क्योंकि कांग्रेस के सत्याग्रह जिसका नेतृत्व ज्योतिरादित्य सिंधिया के हाथ में हैं एक जबरदस्त सफल राजनितिक आयोजन साबित हुआ है लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इसके बाद क्या? क्योंकि विधानसभा चुनाव में तक़रीबन 18 महीनों का समय है और राजनितिक अभियानों की लय को इतने लम्बे समय तक बनाये रखना बहुत बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। कांग्रेस अगर नींद में सत्ता का सपना देख रही है तो उसे यही 18 महीने पूरी तरह जाग कर सपने देखने की आदत डालनी होगी।

मंदसौर किसान गोली काण्ड के बाद कांग्रेस की सक्रियता जमीनी स्तर पर थी भले ही वो पूरी तरह से संगठित स्वरुप में ना दिख रही हो लेकिन ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच में से ही विदेशी दौरे से वापसी के बाद सत्याग्रह से लेकर 2018 के विधानसभा चुनाव के लिए राजनितिक स्क्रिप्ट दिल्ली में लिखी गई है। कांग्रेस के सत्याग्रह की घोषणा से लेकर समापन तक के बीच के छोटे बड़े सभी राजनितिक घटनाक्रम को अगर बारीकी से देखेंगे तो पता चलता है की ये सत्याग्रह भले ही ज्योतिरादित्य सिंधिया का बोला और बताया जा रहा हो लेकिन है ये कांग्रेस का और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और उनकी सलाहकार मंडली की राजनितिक रणनीति का हिस्सा है। राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस राजनैतिक तौर पर जिस स्थिति में है उससे उबरने के लिए मध्यप्रदेश में जीत कांग्रेस के लिए फिर से सीधे खड़े होने में मील का पत्थर साबित हो सकती है, ये बात राहुल गांधी भी जानते होंगे। राहुल गांधी का मंदसौर आना और उसके बाद प्रदेश में कांग्रेस का संगठित जमीनी राजनितिक युद्धघोष यही तो बता रहा है, की नवंबर 2018 तक के लिए कांग्रेस ने मोठे तौर पर सब कुछ तय कर लिया है।

राजशाही जीवनशैली का आदी व्यक्ति एक जमीनी नेता के रूप में व्यवहार करे तो इसे रणनीति का हिस्सा ही माना जाएगा। तीन दिन के सत्याग्रह में कांग्रेस नेताओं के भाषण, मंच पर बैठने के स्थान से लेकर ज्योतिरादित्य की भाव-भंगिमाओं और गतिविधि सबकुछ का संकेत साफ़ है की 2018 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ज्योतिरादित्य के नेतृत्व में ही लड़ने वाली है। सांगठनिक तौर पर प्रदेश कांग्रेस के आर्थिक हालात वक़्ती तौर पर भले बहुत अच्छे नहीं हो लेकिन क्या कांग्रेस नेता जिस टैंट में तीन दिन गुजार रहे थे उसमें ए सी नहीं तो कूलर तो लगवा ही सकते थे। राजनीति में इमेज बिल्डिंग और मॉस परसेप्शन (जन धारणा) की बहुत बड़ी भूमिका होती है, हाल के सालों में प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को एक सफल और ताजे उदाहरण के रूप में इसे देखा जा सकता है। कांग्रेस प्रदेश में सत्याग्रह के जरिये यही तो कर रही थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया का टैंट के अंदर सोने के लिए बनाये गए कमरे को मैंने देखा है। टैंट के एक कोने पर कमरे नुमा जगह में एक खटिया (पलंग नहीं) पड़ी है और उस पर टैंट हाउस का गद्दा और चादर बिछी है। टैंट हाउस के गद्दे कैसे होते हैं इसे बताने की जरुरत नहीं है। एक कोने में पानी पीने के लिए घड़ा रखा है और उस पर पानी निकालने के लिए एक हैंडिल लगा हुआ स्टील का मग्गा। खटिया के सामने कोने में टैंट हाउस का स्टैंड फेन लगा है। ये सब यूँ ही तो नहीं, जरूर ख़ास सोच और विचार है इस सबके पीछे। सत्ता की चाहत नेता को खेत और खलिहान तक पहुंचा देती है और यही से शुरू होती है सत्ता तक पहुँचने की सीढ़ी और सत्याग्रह के जरिये इस सीढ़ी पर कांग्रेस ने चढ़ना शुरू कर दिया है।

जिस तरह से इस आंदोलन के केंद्र में ज्योतिरादित्य सिंधिया है वैसे ही वे मंच के केंद्र में भी दिखाई देते हैं। मंच पर बैठे सिंधिया के सामने एक नोट बुक और हाथ में पूरे समय पेन दिखाई दिया है। अगर आपने कभी किसी महत्वपूर्ण बैठक में किसी व्यक्ति को नोट्स लिखते हुए देखा हो तो सिंधिया की नोट बुक के कागजों पर हर समय रुक रुक कर शब्द उगलते पेन के भावार्थ को बेहतर समझ सकते हैं। शायद ज्योतिरादित्य कोई छोटी से छोटी बात को गफलत में नहीं छोड़ना चाहते होंगे। सत्याग्रह के पहले दिन से समापन तक ज्योतिरादित्य सिंधिया हर छोटे बड़े घटनाक्रम पर पैनी जज़र रखे हुए थे और यही वजह थी की नेताओं के समर्थकों के अपने नेता के जिंदाबाद के नारों को उन्होंने रोका था। कांग्रेस के युवा कार्यकर्ताओं के भाषणों को पूरे वक़्त ध्यान से सुनने के साथ ही उनका उत्साहबर्धन तालियां बजा कर करते सिंधिया कांग्रेस कार्यकर्ताओं से निजी जान-पहचान बनाते और बढ़ाते साफ़ साफ़ नजर आ रहे थे। ये सबकुछ आम लोगों ने भले ही नोटिस नहीं किया हो लेकिन राजनीति की लम्बी और विजय पारी खेलने के लिए इसके महत्व को ज्योतिरादित्य भलीभांति समझते हैं।

इस सबका कुल मिलाकर निचोड़ यही है कि मध्यप्रदेश कांग्रेस में नेतृत्व का संघर्ष ख़त्म हो चुका है और ज्योतिरादित्य सिंधिया 2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार होंगे।

मध्यप्रदेश की चुनावी राजनीति के खेल में टेस्ट मैच शुरू हो चुका है। जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जाएंगे वैसे वैसे वन डे और ट्विनटी ट्विनटी मैच देखने को मिलेंगे। जो लोग क्रिकेट के शौक़ीन हैं वे बेहतर समझ सकते हैं की किस फॉर्मेट में क्या क्या होने वाला है।

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विनय द्विवेदी

लेखक www.kharinews.com के मुख्य संपादक हैं।

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