Kharinews

लानत है ऐसे "विकास" पर जो संतोषी को भूख से मार देता है

Oct
17 2017

स्नेहा चौहान

संतोषी मर गई। बीते 28 सितंबर को। 11 साल की बच्ची थी संतोषी। पढ़ी-लिखी, आजाद, बिंदास लड़कियों के #Metoo ग्रुप से बाहर झारखंड के सिमडेगा जिले की एक बच्ची। राशन को आधार कार्ड से लिंक न कराने के कारण उसके परिवार को 6 माह से राशन नहीं मिला था। खेती की जमीन नहीं, मनरेगा की मजदूरी नहीं और न ही परिवार की कोई निश्चित आय।

आठ दिन से भूखी संतोषी ने आखिर दम तोड़ दिया। लगभग 20 दिन बाद यह खबर तब सामने आई, जब पूरा देश धनतेरस मना रहा था। धनतेरस। घर में लक्ष्मी यानी संपत्ति के लाने का दिन। अखबारों में बाकायदा स्पांसर्ड विज्ञापननुमा खबर छपती है इस खास दिन पर ग्राहकों को लुभाने के लिए। सर्वार्थ सिद्धी योग, पुष्य योग और न जाने क्या। लेकिन संतोषी की भूख से मौत की खबर 20 दिन बाद सामने आई।

यह देश में भूख, कुपोषण और भोजन के अधिकार जैसे अलग-अलग दलगत नामों से काम कर रहे, या यूं कहें कि दुकान चला रहे एनजीओ पर भी लानत है कि उन्हें संतोषी और उसके परिवार की भूख का पता ही नहीं चला। वह भी तब, जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के बाद कई फैसलों में साफ कहा है कि खाद्य सुरक्षा जैसे हकदारी के मामलों में तो आधार को कतई अनिवार्य नहीं किया जा सकता। फिर भी झारखंड और राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में राशन कार्ड की जगह आधार को ही तवज्जो दी जा रही है।

इन आदेशों की अवहेलना के खिलाफ लड़ने के बजाय एनजीओ, फंड के मोह में तेजी से कॉर्पोरेट समूहों के फंड की तरफ लुढ़कने लगे हैं। अपनी काली कमाई में एक छटांक भर हिस्सा जनसेवा के नाम पर खर्च कर ये अरबों लूटते हैं और जनसेवा के नाम पर अपने कर्मचारियों को एय्याशियों की खुली छूट देते हैं।

बहरहाल, संतोषी को इन गोरखधंधों का तो पता भी नहीं था। वह भूख से मर गई। उस दुनिया में चली गई, जिसके बारे में कहा जाता है कि वहां किसी को भूख नहीं सताती। जब टीवी वाले बेशरमी से कैमरा लेकर उसके मां-बाप से बेटी की मौत के बारे में पूछते हैं तो वे भी इत्मीनान से बताते हैं, ‘हां। हमारी बेटी भूख से मर गई। दुर्गा पूजा के कारण स्कूल बंद था, इसलिए उसे मध्यान्ह भोजन भी नहीं मिला।’ लेकिन किसी भी मीडिया वाले को यह नहीं मालूम कि मध्यान्ह भोजन किसी पर्व विशेष, यहां तक कि गर्मी की छुट्टियों में भी बंद नहीं किया जा सकता। खासकर पांचवीं अनुसूची के जिलों में।

बेशक मीडिया वाले भी बीजेपी के एमएलए संगीत सोम की तरह 12वीं पास से ज्यादा और कुछ भी नहीं हैं। वे तथाकथित शिक्षित, खुद को समाजसेवी और डेवलपमेंट सेक्टर की कहलाने वाली महिलाएं भी इसी दर्जे की हैं, जो रात को एक बोतल दारू पीकर आजाद, बिंदास जिंदगी का लुत्फ उठाकर चैन की नींद सोती हैं।

हमारे प्रधानसेवक कहते हैं कि देश विकास कर रहा है। जीडीपी के आंकड़े उछाल पर हैं। लेकिन संतोषी जैसी किसी भी बच्ची की मौत ऐसे नेताओं के मुंह पर एक करारा तमाचा है, जो अपनी अवाम का पेट भी नहीं भर सकती। संतोषी की मौत ऐसे झोला टांगकर घूमने वाले लोगों के  एक मुंह पर तमाचा है, जो दावा करते हैं कि उन्होंने समाज की दशा और दिशा को बदलने का बीड़ा उठाया हुआ है। ये सत्ता की दलाली करने वाले मीडिया के मुंह पर थूकने के समान है, जो ढोल-धमाके से बताते हैं कि देश वाकई विकास की राह पर चल निकला है।

खूब धूम-धड़ाके से दिवाली मनाइए। मगर याद रहे कि खुद को विकास का पैरोकार मानने वाली सत्ता के साए में संतोषी जैसी बच्चियां ऐसे ही मरती रहेंगी। अखबारों के किसी कोने पर, या टेलीविजन के चंद सेकंडों में उसकी कहानी कहीं दब जाएगी। संतोषी की मौत एक सामान्य घटना नहीं, जानबूझकर की गई एक हत्या है। इस हत्या के जिम्मेदार हमारा निष्ठुर समाज, जिद्दी सरकार और नाकाम व्यवस्था के साथ वे ढोंगी लोग भी हैं तो समाज को सुधारने, इसे सशक्त बनाने का दिखावा कर खुद की जेबें भर रहे हैं। 

Category
Share

About Author

स्नेहा चौहान

स्नेहा चौहान सामाजिक सरोकारों को लेकर सक्रिय स्वतंत्र पत्रकार हैं.

Related Articles

Comments

 

संन्यास से पहले 7 'बालोन डी ओर' खिताब जीतना चाहते हैं रोनाल्डो

Read Full Article

Subscribe To Our Mailing List

Your e-mail will be secure with us.
We will not share your information with anyone !

Archive