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मोदी की मुसीबत बने शिवराज, राख के नीचे दबी चिंगारी को मिली MP से हवा

Jun
14 2017

विनय द्विवेदी
(प्रमुख सम्पादक, kharinews.com)

मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन अब भले ही राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया की सुर्ख़ियों में नहीं हो लेकिन किसानों के सवालों को इस आंदोलन ने देश व्यापी स्वरुप तो दे ही दिया है। इस मामले में जहां एक ओर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी का पुराना राजनितिक पालेबन्दी का हिसाब -किताब चर्चा में है तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री शिवराज और प्रदेश के बड़े किसान नेता शिव कुमार शर्मा उर्फ़ कक्का जी के बीच की राजनितिक टसल भी मीडिया और राजनितिक गलियारों में चर्चा में बनी हुई है।

देश भर के किसान की आम समस्या कमोबेश एक जैसी ही है, इसलिए जानकारों का कहना है की राज्य सरकारें फौरी तौर पर तो किसानों को विभिन्न योजनाओं से राहत दे सकती हैं लेकिन इस समस्या का सटीक और बहुआयामी तथा बुनियाद हल केंद्र सरकार की नीतियों से ही हो सकता है। वैसे भी तक़रीबन सभी राज्य सरकारों की माली हालत बहुत खस्ता है। पिछले तीन सालों से मोदी की छवि के सहारे लगातार हर स्तर पर चुनाव जीत रही भाजपा और उसके नेतृत्व को जीत के नशे और जूनून के कारण किसानों की दुर्दशा दिखाई ही नहीं दे रही है। इसीलिए भाजपा नेता और मोदी सरकार किसानों के सवालों के लिए प्रदेश सरकारों पर ही जिम्मेदारी डालती रही है. हाल ही में वित्तमंत्री अरुण जेटली ने साफ़ कह दिया है की केंद्र सरकार के पास किसानों की कर्ज माफ़ी के लिए पैसा नहीं है जो सक्षम हो वो अपने स्तर पर निर्णय करें।

इस पृष्ठभूमि में मोदी सरकार के आने के बाद देश में जहां कहीं भी किसानों के आंदोलन हुए हैं वे राष्ट्रीय स्वरुप नहीं ले सके। यहाँ तक की तमिलनाडु के किसानों का जंतर मंतर पर मीडिया को आकर्षित करने के अजब-गजब तरीकों वाला आंदोलन भी देश भर के किसानों को आक्रोशित नहीं कर सका लेकिन मध्यप्रदेश का किसान आंदोलन देश भर के किसानों को जगा चुका है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्रदेश के किसान आंदोलन पर शिवराज सरकार का भीषण दमन रहा जिसमें पुलिस की गोली से 7 किसानों की मौत हो गई और मुख्यमंत्री शिवराज को डेमेज कंट्रोल करने के लिए उपवास का प्रहसन करना पड़ा था।

शिवराज सिंह चौहान गंभीर विपरीत राजनितिक परिस्थियों को बस में करने के लिए जाने जाते हैं। शायद इसीलिए चाहे डम्पर हो या व्यापम घोटाला, शिवराज इन बड़े राजनितिक झटकों से खुद को उबार ले गए लेकिन अब प्रदेश के किसान आंदोलन ने उनके सामने बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है। राजनितिक परिस्थितियों को सटीक भांपने वाले शिवराज को पार्टी की अंदरूनी राजनीति और शक्ति संतुलन का भान तो पहले से ही है इसलिए भाजपा के अंदर से कोई राजनितिक चुनौती मिले इससे पहले ही उपवास की घोषणा कर दी।

देश भर के किसानों में प्रधानमन्त्री मोदी के विरुद्ध कुछ समय पहले तक भले ही बहुत बड़ा आक्रोश ना रहा हो लेकिन किसानों की बदहाली के कारण उनमें असंतोष तो था। इसी असंतोष को हवा देने का काम किया मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन ने। अब चूँकि किसानों के सवाल देश व्यापी बन गए हैं तो मोदी सरकार की नोटबंदी की योजना भी सवालों के घेरे में आ गई है। प्रधानमन्त्री और भाजपा नेता अभी तक नोट बंदी की सफलता के गुणगान करते थक नहीं रहे थे ऐसे में किसानों की तात्कालिक परेशानी में नोट बंदी ने कोढ़ में खाज का काम किया है। कई किसान नेता, अर्थशास्त्री और खेती-किसानी के सवालों को लेकर सक्रिय बौद्धिक जमात ने भी किसानों को हो रही तकलीफों के पीछे नोट बंदी की भूमिका को रेखांकित किया है।

दरअसल इसीलिए राजनीतक विश्लेषक कह रहे हैं की मोदी के लिए शिवराज ने मुसीबत खड़ी कर दी है। भाजपा के अंदरूनी सूत्र भी इस बात की पुष्टि करते हैं की मध्यप्रदेश के किसानों की समस्यायों को मुख्यमंत्री शिवराज ठीक से हल नहीं कर सके और अब देश भर के किसान आंदोलन की राह पर हैं और 16 जून को देश भर के हाइवे जाम करने जा रहे हैं। 2019 में लोकसभा के चुनाव होने हैं ऐसे में अगर किसान आंदोलन गंभीर स्वरुप ले लिया तो आगामी चुनाव में मोदी के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। दूसरी ओर मध्यप्रदेश के किसान आंदोलन में पुलिस दमन के शिकार अधिकतर किसान पाटीदार समाज के है जिनकी नातेदारी-रिश्तेदारी गुजरात में है तथा इसी दौरान गुजरात के पाटीदार समाज के नेता हार्दिक पटेल भी मध्यप्रदेश के पाटीदार किसानों के बीच सक्रिय हुए हैं। चूँकि इसी साल के अंत में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने हैं और वहां के पाटीदारों की भाजपा से पहले से ही नाराजगी चल रही है ऐसे में मध्यप्रदेश के पाटीदार किसानों का गुस्सा वोट को प्रभावित कर सकता है। गुजरात प्रधानमन्त्री और भाजपा अध्यक्ष का गृह प्रदेश है और ऐसे में भाजपा के लिए विकास का गुजरात मॉडल भी दाएं पर लग गया है।

जब मोदी प्रधानमन्त्री बने थे तभी से भाजपा का शिवराज विरोधी खेमा ये मान कर चल रहा था की शिवराज की मुख्यमंत्री पद से विदाई तय है क्योंकि भाजपा की राष्ट्रीय राजनीति में शिवराज को लाल कृष्ण अडवाणी ग्रुप में माना जाता था तथा मोदी और आडवाणी के बीच की दूरियां जग जाहिर हैं। ऐसे में शिवराज विरोधी मोदी खेमा भी यह मानकर चल रहा है की प्रधानमन्त्री मोदी के सामने विकराल रूप ले चुकी किसान आंदोलन की समस्या मुख्यमंत्री शिवराज की अफसरों पर निर्भरता और निजी टसल के कारण पैदा हुई है. भोपाल ही नहीं बल्कि दिल्ली तक के राजनितिक प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा पिछले काफी समय से चल रही है की मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने ख़ास सलाहकार अफसरों के अलावा किसी की नहीं सुनते और यही अफसर शिवराज सरकार को चला रहे हैं. भाजपा के कई बड़े नेता भी ऑफ द रिकॉर्ड यह बात कहते हैं.

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और किसान नेता शिव कुमार शर्मा उर्फ़ कक्का जी के बीच निजी टसल भी दिल्ली तक चर्चा का केंद्र बनी हुई है. प्रदेश के किसान आंदोलन के पीछे कांग्रेस का हाथ होने की बात मुख्यमंत्री और भाजपा नेता चाहे कितना भी कहें लेकिन इस आंदोलन के पीछे कक्का जी की बड़ी भूमिका है. बता दें की कक्का जी पूर्व में भाजपा और rss के संगठन भारतीय किसान संघ के मध्यप्रदेश के लम्बे समय तक अध्यक्ष रहे हैं. लेकिन किसानों की समस्यायों को मुखरता से उठाने के कारण शिवराज सरकार के सामने संकट खड़ा हो गया और कक्का जी को संगठन से निकाल दिया गया. कक्का जी ने एक नया किसान संगठन खड़ा किया और प्रदेश में फिर से किसान आंदोलन मुखर हो गया. अब कक्का जी किसान आंदोलन को देश व्यापी बनाने के लिए विभिन्न किसान संगठनों के नेताओं से दिल्ली में मिल रहे हैं. इस पहल में कक्का जी सफल होते भी दिख रहे हैं. ऐसे में फिर वही बात सामने आ रही है की अगर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रदेश के किसानों की समस्याओं के प्रति गभीर राजनितिक-प्रशासनिक पहल की होती तो मोदी सरकार के सामने किसान आंदोलन की चुनौती खड़ी नहीं होती और शिवराज सिंह चौहान ने शिव कुमार शर्मा से राजनितिक लड़ाई को निजी लड़ाई नहीं बनाया होता तो प्रधानमन्त्री मोदी के सामने किसान आंदोलन की समस्या विकराल रूप लिए हुए खड़ी नहीं होती।

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विनय द्विवेदी

लेखक www.kharinews.com के मुख्य संपादक हैं।

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