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UP की नई नवेली दुल्हन ने दहेज़ प्रताड़ना को लेकर ऐसा लिखा की एक बार सोचने पर मजबूर हो जाएंगे आप

May
05 2017

 लखनऊ : 5 मई/ पेशे से फार्मासिस्ट सुष्मिता अपने फेसबुक पर अक्सर ऐसे कुछ लिख देती है जो आम आदमी को सोच बदलने पर मजबूर कर देता है। सुष्मिता फीमेल्स लाइफ की मुश्किलों पर अक्सर लिखती रहती हैं। इसबार सुस्मिता ने दहेज़ को लेकर टिपण्णी की है। सुष्मिता ने लिखा …

सारी लड़कियां गलत नही होती तो सारे लड़के कैसे गलत हो सकते हैं ?
आज की बात कुछ ख़ास -- 1984 में दहेज़ के 3988 केस ( लगभग ) दर्ज़ हुए जिसमे करीब 2458 केस ऐसे थे जिसमे लड़किया गलत थी। मतलब झूठा  'दहेज़ का आरोप ' तो आज की बात उन लड़कियों के लिए  है जो अपनी  'शक्ति' दहेज़ सम्बंधित कानून का गलत प्रयोग करती हैं।  सुष्मिता ने लड़कियों को संबधित करते हुए लिखा कि “रिश्ते निभा सकती हो तो निभाओ वरना अलग हो जाओ लेकिन दहेज़ का झूठा आरोप मत लगाओ। क्योंकी यह आपकी शक्ति है और शस्त्र उस वक्त के लिए है जब आप के साथ गलत हो न की इसका गलत प्रयोग करो और किसी निर्दोष को दोषी साबित करो। क्योंकि जिनके नाम पर केस फाइल होता है उनकी तो जिंदगी बर्बाद हो जाती है। कई बुजुर्ग माता पिता की जिंदगी जेल में कट जाती है और तो और कुछ तो नाबालिग छोटे बच्चों का भी नाम डलवा देते हैं जिन्हे तो दहेज़ का पूरा मतलब भी नहीं पता होता है और जो लड़कियां आज भी दहेज प्रताड़ना का आज भी शिकार हो रही हैं। वे अपने दहेज़ विरोधी कानून को उपयोग में लाओ ऐसे चुप चाप घर बैठने से कुछ नहीं होता !!

इतना ही नहीं सुष्मिता ने आगे लिखा पता है मुझे बहुतों को बुरा भी लगेगा लेकिन जो सही है वो सही है और जो गलत है वह गलत, जब नियम बना था तब के लिए सही था पर आज कानून का मिसयूज़ बहुत ज्यादा हो रहा है।
(उक्त टिप्पणी सुष्मिता मिश्रा के फेसबुक वाल से ली गई है)

कुछ वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने दहेज़ के झूठे मुक़दमे को लेकर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए जजों से कहा था कि दहेज़ प्रताड़ना के मुक़दमे की सुनवाई करते समय जल्दबाज़ी में फैसले नहीं लें। दोनों की पक्षों को पूरा समय दिया जाना चाहिए। यह कतई जरुरी नहीं कि आनन फानन में  कानून सम्मत फैसले तुरंत ही सुना दिए जाएँ। चीफ जस्टिस ने दहेज़ के झूठे मामले को "लीगल टेररिज़्म" तक कहा है।

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