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मीडिया, बच्चे और असहिष्णुता पर मीडिया संवाद में हुआ सार्थक विमर्श

Aug
22 2017

ओरछा से लौटकर सुमित कुमार की रिपोर्ट

विकास संवाद मध्यप्रदेश द्वारा पिछले 10 वर्ष से राष्ट्रीय मीडिया संवाद का सफल आयोजन किया जा रहा है। इस वर्ष 11 वें राष्ट्रीय मीडिया संवाद का सफल आयोजन मध्यप्रदेश के ऐतिहासिक स्थल ओरछा में संपन्न हुआ।  इस मिडिया संवाद में देश भर के पत्रकार, पत्रकारिता के छात्र, शोधकर्ता तथा शिक्षाविद सहित विषय विशेषज्ञ भाग लेते हैं, इस वर्ष भी देश के जाने माने पत्रकार, विषय विशेषज्ञ, शिक्षा विदों ने 11 वें राष्ट्रीय मीडिया संवाद के चयनित विषय "मीडिया बच्चे और असहिष्णुता" पर अपना वक्तव्य दिया तथा मिडिया संवाद में मौजूद पत्रकार, पत्रकारिता के छात्र तथा शोधार्थियों का मार्गदर्शन किया। विकास संवाद एक गैर सरकारी सामाजिक संगठन है जो सरोकार से जुड़े मुद्दों पर कार्य करती है।

आज असहिष्णुता हमारे समाज में चरम सीमा पर है, कभी अखलाख के साथ तो कभी अयूब पंडित के साथ। इसका ताजा उदाहरण भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी हैं। विकास संवाद द्वारा आयोजित राष्ट्रीय मीडिया संवाद के प्रथम दिन असहिष्णुता पर पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के साथ घटित घटना का उदाहरण देते हुए वरिष्ठ पत्रकार और "द वायर" के संपादक सिद्ददार्थ वरदराजन ने कहा कि जिस तरह की भाषा देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा राज्यसभा में उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी के लिए किया गया, क्या वह शोभनीय था ? ऐसी भाषा का उपयोग एक प्रधानमंत्री का एक उपराष्ट्रपति के प्रति असहिष्णुता ही दर्शाता है। सवाल यह है कि ऐसी भाषा का उपयोग प्रधानमंत्री ने क्यों किया, इसकी वजह क्या थी ? इसकी वजह जग जाहिर है। पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने माइनॉरिटी के लिए चिंता व्यक्त की थी। हमें आज समझने की जरुरत है कि आखिर अंसारी साहब को क्यों लगा की माइनॉरिटी के प्रति चिंता जतानी चाहिए?

उन्होंने आगे कहा कि आर.एस.एस. के कद्दावर नेता इंद्रेश कुमार ने कहा कि अंसारी साहब चाहे तो मुल्क छोड़ कर चले जायें। क्या इस प्रकार की भाषा का उपयोग एक उपराष्ट्रपति के लिए करना सही है ? इनके द्वारा ऐसा बयान देना सही है क्या ? आप इन बयानों से समझ सकते हैं कि इनकी मानसिकता क्या है। असहिष्णुता पर दूसरा उदाहरण पहलु खान का देते हुए वरदराजन कहा कि पहलु खान की जब हत्या हुई तो केस सबसे पहले उनके परिजनों पर हुआ। पहला बयान सरकार के तरफ से वहां के गृहमंत्री का था, उन्होंने कहा था कि हत्या गलत थी लेकिन जो हुआ क्या वह सही हुआ ? बहुत सारे बयान नेताओं के तरफ से आते हैं जो खुले तौर पर कानून का माखौल उड़ाते हैं।

मीडिया में असहिष्णुता और मिडिया पर संकट की ओर इसारे करते हुए सिद्धार्थ वरदराजन ने कहा कि मीडिया देश में जिस ओर जा रहा है वह बेहद ही खतरनाक और चिंतनीय है। मीडिया आज ऐसे दौर से गुजर रही है जहां उन सैकड़ों मुद्दों को कबाड़ में डाल दिया जा रहा है जिन पर सार्थक बहस करने की जरुरत है। राष्ट्रवाद, लव-जिहाद, बीफ जैसे मुद्दों के नाम पर मीडिया द्वारा लोगों के दिमाग में धीरे-धीरे जहर भरा जा रहा है। आज हमें समझने की जरुरत है कि आखिर मीडिया ऐसा क्यों कर रही है। चुकि मीडिया को इन बहसों में बिजनेस और इंटरटेनमेंट नजर आता है और उन्हें लगता है कि इन मुद्दों पर बहस खड़ा करके हम सत्ता पक्ष को खुश कर देंगे। अगर देश में असहिष्णुता बढ़ रहा है तो इसमें मिडिया की भूमिका भी नजर आ रही है।

उन्होंने आगे कहा कि हुकूमत आम तौर पर सवालों से डरता है, आप इतिहास को उठा कर देख लीजिये सत्ता हमेशा मीडिया को कुचलती ही है। आज आप मीडिया और राजनीती को अलग-अलग कर के नहीं देख सकते हैं। आज मीडिया उन मुद्दों को नहीं उठा पा रही है जिन मुद्दों को उठाना चाहिए या उठाना चाहती है। मीडिया का एक हिस्सा असहिष्णुता को बढ़ावा  दे रहा है और दूसरा हिस्सा जो जनता के मुद्दों को उठा रही है उस पर दबाव सत्ता द्वारा डाला जा रहा है।

देश में बढ़ रहे असहिष्णुता पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार विनोद शर्मा ने कहा कि हमारा देश पाकिस्तान बनने की राह पर बढ़ चला है। भारत देश का कोई धर्म नहीं है, यहां हर धर्म को समान अधिकार है। हमारे देश में सभी को संवैधानिक अधिकार है कि वो मर्जी से धर्म का चयन कर सकते हैं। सहिष्णुता हमारा सॉफ्ट पावर है। सहिष्णुता का उदाहरण देते हुए विनोद शर्मा ने कहा कि जब आमिर खान के साथ चारो तरफ से गाली गलौज हो रहा था तब वह प्रेस कन्फ्रेंस में बड़े आराम से अपनी बात रख रहा था और डटा हुआ था। यही सहिष्णुता है।

सत्ता द्वारा मीडिया पर बढ़ रहे दबाव पर विनोद शर्मा ने कहा कि जितना बड़ा अखबार या न्यूज़ चैनल होता है उस पर उतना ही दबाव होता है। सत्ता हमेशा चाहती है कि मीडिया उसकी मुट्ठी में रहे ताकि सरकार अपनी नाकामी छुपा सके और जो भी अखबार या न्यूज़ चैनल सत्ता से सवाल पूछती है तो उन्हें सत्ता का दमन झेलना पड़ता है।

असहिष्णुता पर गांधी का उदाहरण देते हुए वरिष्ठ पत्रकार और वर्धा हिंदी विश्विद्यालय के प्रोफेसर अरुण त्रिपाठी ने कहा कि 1922-23 में जब देश में चारो तरफ दंगे हो रहे थे, तब वह उपवास पर चले गए थे। सहिष्णुता की तलाश बहुत जटिल है लेकिन गाँधी के रास्तों पर चले तो सहिष्णुता की तलाश समाप्त हो जायेगी। आज असहिष्णुता विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम तक पहुँच रहा है, इस पर उदाहरण देते हुए त्रिपाठी ने कहा कि वर्धा विश्वविद्यालय में एक प्रोफेसर ने मुझसे पूछा कि क्या आपके नगर में गांधी की हत्या गलत है ? इस मानसिकता को समझिये जो गांधी की हत्या को सही ठहराने में लगे हैं। हम असहिष्णु इसीलिए हो गए हैं क्योंकि हमें हमारा सत्य सही लगता है।

मीडया संवाद में वक्ता के रूप में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार राकेश दीक्षित ने असहिष्णुता पर चर्चा करते हुए कहा कि हमारी दादी नानी मुसलमानो, दलितों जैसे दूसरे वर्गों के साथ बड़े ही सौहार्द के साथ रहती थी। हमारे पूर्वजों में सद्भावना और संवेदना होती थी। सभी जाती, धर्म, वर्ग, समुदाय के लोगों की समाज में भागीदारी समान होती थी। लेकिन अब सब कुछ बदल चुका है, आज हमारे समाज में लोगों के बीच दूरी बढ़ रही है। मीडिया के माध्यम से समाज में बचे खुचे सौहार्द को समाप्त किया जा रहा है, आज हम सबको अपने विचारों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसने की आवश्यकता है। इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ है, नफरत को सरकार द्वारा ऑफिसियल किया गया हो लेकिन आज सरकार द्वारा ये छूट दे दी गई है कि कोई भी राजनेता या छुटभैया नेता नफरत फैला सकता है।

समाज में बढ़ रहे असहिष्णुता पर वरिष्ठ पत्रकार चंद्रकांत नायडू ने अपने वक्तव्य में कहा कि नफरत यदि आपके अंदर व्यवहारिक रूप में मौजूद हो तो उससे लड़ना आसान होता है, लेकिन आप के अंदर यदि नफरत राजनैतिक रूप में मौजूद हो फिर नफरत से लड़ना बहुत मुश्किल है। आज नफरत को राजनितिक तौर पर फैलाया जा रहा है, ताकि इसका फायदा एक ख़ास विचार के लोग उठा सकें। इस देश में पहली बार इमरजेंसी कह कर लगाया गया था लेकिन आज बिना बोले लगाया जा चूका है। आप क्या खाएंगे, क्या पिएंगे, क्या पहनेगें ये सत्ता पक्ष तय कर रही है।

मीडिया संवाद के दूसरे दिन बच्चों के प्रति बढ़ते असहिष्णुता पर बात करते हुए वरिष्ठ पत्रकार पियूष बघेल ने कहा कि बच्चों के स्कुल बैग का वजन दिन-बदिन बढ़ता जा रहा है। बच्चों के बैग के वजन से बड़ा बोझ उसके मन का बोझ है। लोग कहते हैं कि बच्चे देश के भविष्य होते हैं, बच्चा बड़ा हो जाएगा तब वह भारत का बेहतर नागरिक बनेगा। सबसे बड़ा सवाल है कि क्या बच्चों का कोई वर्तमान नहीं है। हम बच्चों को चिढ़ाते हैं और हमें मज़ा आता है, क्या ये असहिष्णुता नहीं है।

उन्होंने आगे कहा कि हम बच्चों के साथ जुल्म कर रहे हैं, यदि कोई बच्चा सवाल पूछता है तो हम उसे कहते हैं चुप रहो तुम अभी बच्चे हो, हम उनके सवाल को दबा देते हैं। हम उनके उत्सुक और कोमल मन के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। बच्चों का मन उत्सुक होता, वह बहुत कुछ जानना चाहता है, सवाल पूछता है। लेकिन हम उसके सवालों को तब तक दबाते रहते हैं, जब तक वह हम जैसा घटिया आदमी नहीं बन जाता है। सही सोचो कहने वाले अभिवावकों को पियूष बघेल ने लताड़ते हुए कहा कि कभी हम बच्चों को आँख दिखाकर तो कभी जोर से डांट कर डराते हैं और कहते हैं सही सोचो। ये सही सोच क्या होती है सोच तो सोच होती सोच न गलत होती है और ना ही सही।

पियूष बघेल ने बच्चों को कम तर आंकने वाली सोच पर कहा कि बच्चे हमसे भले ही तजुर्बे में कम होते हैं ये सही बात है, लेकिन समझ में जो बच्चों को अपने से कम समझते हैं, ये बात मुझे समझ में नहीं आता। बच्चों को हम सीधा बहाना चाहते हैं, लेकिन हम ये नहीं समझते कि बच्चों का मन नदी की धारा के समान होता है। नदी अपनी धारा तो खुद बनाती है। बच्चों को ना समझपाना हमारा दोहरा चरित्र है। बच्चों को हम फॉलो करें तो हम सहिष्णु जरूर हो जाएंगे।

पोस्ट ट्रूथ पर प्रकाश डालते हुए वरिष्ठ पत्रकार अरविंद मोहन ने कहा कि 1990 के बाद से ही मीडिया में बदलाव शुरू हो गए थे। पोस्ट ट्रूथ की चर्चा इतनी हुई कि ऑक्सफोर्ड ने पिछले साल इसे वर्ड ऑफ दा इयर घोषित कर दिया। मैं पोस्ट ट्रूथ जैसे शब्द को नहीं मानता, मेरे लिए सत्य ही सबकुछ है। आज इतने जोर शोर के साथ झूठ को फैलाया जा रहा है, जिसके कारण आम लोगों के जन जीवन पर असर पड़ने लगा है। अब पोस्ट ट्रूथ का मतलब ये समझा जा रहा है कि सत्य जैसा कुछ नहीं होता जो हम चला रहे हैं, जो हम दिखा रहे हैं वही सत्य है।

वरिष्ठ पत्रकार तथा समाजिक कार्यकर्ता चिन्मय मिश्र ने बच्चों के प्रति बढ़ते असहिष्णुता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि आज के दौर में जो धर्मनिरपेक्षता की बात करता है, सहिष्णुता की बात करता है, उनलोगों को गाली देने और उनके साथ हाथापाई करने का चलन चल पड़ा है। आज जिस तरह का माहौल देश में बनाया गया है, आप उसमें असहिष्णुता की बात नहीं कर सकते। सवाल यह है कि क्या मुगलों का समय हमारे समय से खराब था, क्या मस्जिद में लिखा रामचरित मानस का समय खराब था, क्या वाकई में हमारा इतिहास खराब था ? इतिहास पढ़ने पर लोगों को पता चलता है कि हमारे समय से बेहतर तो हमारा इतिहास था। जब हमारा समाज ही असहिष्णु है तो हम बच्चों की बात कहाँ से करेंगे।

बच्चों के साथ हो रहे असहिष्णुता पर प्रकाश डालते हुए चिन्मय मिश्र ने कहा कि पहले हम बच्चों को पैदा भी होने देते थे, अब तो हम इतने असहिष्णु हो गए हैं कि बच्चों को पैदा ही नहीं होने देते। जरा सोचिये कि उन बच्चों के बारे में जिनके लिए ना किताब है, ना स्कूल है, ना अस्पताल है। हम सोच नहीं सकते क्योंकि हम असहिष्णु हैं। हम ऐसे असहिष्णु समाज में जी रहे हैं जहां बच्चों को देह व्यपार में धकेला जा रहा है, जहां बच्चों के साथ दोयम दर्जे की असहिष्णुता की जा रही है।

आज के समय में मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार किया जा रहा है, यह हमारे समाज के लिए बेहद ही खतरनाक है। दुष्प्रचार के लिए चंद आत्ममुग्ध लोगों के द्वारा सत्य रचा जा रहा है। दुष्प्रचार के तंत्र पर बात करने के लिए राष्ट्रीय मिडिया संवाद में मौजूद थे वरिष्ठ पत्रकार प्रकाश हिन्दुस्तानी। किस प्रकार से दुस्प्रचार के लिए मीडिया का उपयोग किया जा रहा है, इसका उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हाल ही में जेएनयू के पूर्व छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार छात्र को संबोधित करने इंदौर आये थे। कार्यक्रम के ठीक एक दिन पूर्व हिन्दू संगठनों द्वारा सोशल मीडिया पर प्रचार चलाया गया कि देशद्रोही कन्हैया को हम इंदौर में घुसने नहीं देंगे और भरी सभा में उसका मुंह काला करेंगे। हालांकि वो ऐसा नहीं कर पाए, बाद में उन्होंने फोटोशॉप का  उपयोग कर स्टेज पर बैठे कन्हैया कुमार की तस्वीर पर  कालिख पोत कर दुस्प्रचार किया कि हमने कन्हैया कुमार का मुंह कला कर दिया है। अब इस से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि किस प्रकार सत्य रचा जा रहा है।

असहिष्णुता पर अपनी बेबाक राय रखते हुए वक्ता के रूप में मौजूद आईबीएन 7 के न्यूज़ एंकर सुमित अवस्थी ने कहा कि असहिष्णुता हमारे समाज का आज एक अभिन्न अंग बन कर उभर रहा है, असहिष्णुता होना चाहिए ये मेरा निजी विचार है लेकिन एक सीमा तक। मैंने इमरजेंसी नहीं देखी लेकिन आज जब इमरजेंसी नहीं है उसके बावजूद मीडिया पर पड़ रहे दवाब को महसूस कर रहा हूँ, फिर घोषित आपातकाल में मीडिया पर कितना दवाब होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल है।

विकास संवाद द्वारा "मीडिया बच्चे और असहिष्णुता" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय मिडिया संवाद से एक सार्थक बहस खड़ा करने कोशिश की गई, जो कि सफल रही। आज मिडिया से बच्चों से जुड़े मुद्दे गायब हैं, बच्चों के प्रति बढ़ रही असहिष्णुता की बहस मीडिया के बहस में शामिल ही नहीं है। इस राष्ट्रीय संवाद में शामिल पत्रकार, पत्रकारिता के छात्र, तथा शोधार्थियों के साथ साथ प्रतिभागियों को बहुत कुछ सीखने को मिला है।

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