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विश्व रंग : वैश्विक भाषा बनने के लिए हिंदी के रास्ते में अभी भी कई बाधाएँ - संतोष चौबे

Nov
10 2019

भोपाल: 10 नवंबर/ टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव में वनमाली सभागार में विश्व रंग का मंच रविवार को एक अंतरराष्ट्रीय कविताओं का मंच बना जब विभिन्न देशों के कवियों ने अपनी मूल भाषाओं में अपनी कविताओं का पाठ किया। उनके कविता पाठ के बाद हिंदी अनुवाद का भी पाठ किया गया। इस सत्र में तिब्बत से तिनजिंग, बांग्लादेश से ओबैद आकाश, फिलीपींस से मार्रा लानोट, रूस से इगोर सैफ मौजूद थे।

तिब्बत के तिनजिंग ने अपनी कविताओं होराइजन और धर्मशाला का पाठ किया। धर्मशाला का हिंदी अनुवाद है, "जब धर्मशाला में बारिश होती है, तब हजारों की तादाद में बूँदें आती हैं और मुक्केबाज़ी करती हैं मेरे घर के साथ"।

बांग्लादेश के ओबैद आकाश ने बंगाली भाषा में अपनी कविता रोक्ते धरा का पाठ किया। रोक्ते धरा का अनुवाद है "जिस मछली का मोल भाव बाता-बाती से हाथापाई में बदल गया, तब बगल से कतला का सर उचककर मेरे थैले में आके गिरा।’

सोशल मीडिया ने दुनिया को बहुत छोटा कर दिया

टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्व रंग के अंतिम दिन रविवार को निराला सभागार में ‘साहित्य दृश्य-श्रव्य माध्यम एवं सोशल मीडिया’ पर परिचर्चा हुई। इसमें वक्ता रवि रतलामी, अनुशक्ति सिंह, अरुण देव (अध्यक्ष), गीताश्री, सुदीप सोहानी, डीपी मिश्र, रेखा सेठी ने अपने विचार रखे। संचालन डॉ. प्रीति प्रवीण खरे ने किया और समन्वयक ईला जोशी थी। इस दौरान आलोचक डॉ. रेखा सेठी ने कहा डिजिटल माध्यम के उतावलेपन पर सेंसर की जरूरत है। उन्होंने कहा सच्चाइयां अंतर्विरोधों में रहती हैं और मेरा मन वहीं अटक जाता है। जो माध्यम आपके मन मे तस्वीरें बुनता है, उस माध्यम के वर्चस्व को आप समझ सकते हैं। इसके कारण साहित्य की भाषा बदल गयी है। अनुशक्ति सिंह (सोशल मीडिया संचालक) ने कहा मैं खुदको एक डिजिटल चाइल्ड मानती हूँ क्योंकि मेरा लेखन डिजीटल से ही शुरू हुआ। पहले हम उस जमाने में थे, जहां, मेरे पिया गए रंगून, वहां से किया टेलीफून और आज मेरा पिया गया न्यूयॉर्क, वहां से किया टिकटॉक। टिकटॉक का यूजर बेस सबसे अधिक है। वैश्विक जनसंख्या के 25 प्रतिशत लोग टिकटॉक पर हैं। इस दौरान सुदीप सोहानी ने कहा ऑडियो पॉडकास्ट ने श्रव्य माध्यम में कई बदलाव लाये हैं। जिसमे विशेषज्ञों की अपनी एक शैली है जो अनूठी है। ऑडियो के मुकाबले वीडियो में ज्यादा अटेंशन होता है।

भारत का लोक सबसे अधिक प्रगतिशील-सत्यकाम

महादेवी सभागार में लोक का उत्तर आधुनिक पक्ष विषय पर चर्चा की गई। इस सत्र की अध्यक्षता नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने की और संचालन प्रो देवेंद्र चौबे ने किया। इस सत्र के मुख्य वक्ता महेंद्र कुमार मिश्र, प्रभु जोशी और सत्यकाम रहे। सत्यकाम ने अपने उदबोधन में कहा कि हमारी पारंपरिक प्रौद्योगिकी को भी भावी पीढ़ी को सौंपने की आवश्यकता है। लोक केवल चित्रकारी और नृत्य ही नहीं है। हमारे परिवारों में अब बच्चों को अंग्रेजी सीखने पर जोर दिया जा रहा है, जब बचपन से ही मां अपने बच्चे से अंग्रेजी में बात करने की कोशिश करती है तभी उसका लोक खत्म हो जाता है। आज की शिक्षा व्यवस्था से लोक खत्म हो रहा है जबकि हमारा लोक सबसे ज्यादा आधुनिक और प्रगतिशील है। हमें हमारे लोक और साहित्य को पहचानने की बहुत जरूरत है। वहीं नर्मदा प्रसाद उपाध्याय ने अपने अध्यक्षीय उदबोधन में कहा कि भारत में उत्तर आधुनिकता को लेकर भारत में बहुत कम चर्चा हुई है। लोक के विभिन्न पक्षों के बारे में तो बात हुई लेकिन लोक पर उतनी चर्चा नहीं हो सकी है। हमारे लोक से पश्चिम का लोक बिल्कुल अलग है, पश्चिम इसे पिछड़ा मानते हैं, और हमारा लोक बहुत प्रगतिशील है।

विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी को भाषा के रूप में नहीं एक संस्कृति के रूप में पढ़ाया जा रहा है : डॉ. यूरी

प्रेमचंद सभागार में ’विश्व में हिंदी- वैश्विक स्तर पर हिंदी के पाठ्यक्रम में एकरूपता की चुनौती’ पर व्याख्यान हुआ। इसमें डॉ. यूरी बोट्विकेन (यूक्रेन), डॉ. इंदिरा गजियाव (मॉस्को), डॉ. सुब्रमणि (फिजी), डॉ. सिराजुद्दीन नुरमतोव (उज्बेकिस्तान) प्रमुख वक्ता थे। इस दौरान "विश्व मैं हिंदी" का विमोचन किया गया।

सत्र का समन्वय करते हुए डॉ. संतोष चौबे ने कहा वैश्विक भाषा बनने के लिए हिंदी के रास्ते में अभी भी कई बाधाएँ हैं। यूक्रेन से डॉ यूरी ने बताया कि विदेशी विश्वविद्यालयों में हिंदी को केवल एक भाषा के रूप में नहीं बल्कि एक संस्कृति के रूप में पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा प्रौद्योगिकी ने शिक्षण के लिए सामग्री प्रदान की है, लेकिन चुनौती किसी भी विदेशी भाषा को सीखने के लिए छात्रों को प्रोत्साहित करना है। युवा छात्रों को एक मजबूत आधार विकसित करने में मदद करने के लिए उन्हें बाल साहित्य भी सिखाया जा रहा है। छात्रों को फिल्मों के माध्यम से हिंदी सीखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है ताकि वे सामान्य संचार भाषा सीख सकें।

मास्को से डॉ. इंदिरा ने कहा कि रूस में 7 विश्वविद्यालयों में हिंदी पढ़ाई जा रही है। रूस में 30000 से अधिक एनआरआई विश्व हिंदी दिवस सहित सभी भारतीय त्योहार मनाते हैं। उन्होंने “रूसी आकाश में सूर्य” के संदर्भ पर आधारित हिंदी में एक कविता का पाठ किया।

उज्बेकिस्तान के डॉ. सिराजुद्दीन ने बताया कि पिछले 70 सालों से उनके देश में हिंदी और विभिन्न अन्य आर्य भाषाओं को पढ़ा और पढ़ाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि विभिन्न शिक्षण संस्थानों में 1000 से अधिक शिक्षक हैं। उन्होंने अपने देश में हिंदी साहित्य और इसकी पसंद के बारे में भी बात की।

डॉ. सुब्रहमनी ने कहा जब आप दो या दो से अधिक भाषाओँ में काम करते हैं तो आप सिर्फ भाषा ही नहीं बल्कि नए देश, नयी संस्कृति से भी पहचान करते हैं।

तकनीक की उपलब्धता हिंदी के लिए वरदान- राहुल देव

निराला सभागार में शाम 5:00 बजे टेक्नोलॉजी और हिंदी पर व्याख्यान हुआ। वक्ता राहुल देव, जितेंद्र चौधरी, मनीष गुप्ता, लीना मेहदेले, ओम विकास, डॉ अनुराग सीठा, अनूप भार्गव (संचालन), डॉ कविता वाचकनवी थे। इस दौरान राहुल देव ने कहा विकिपीडिया में हिंदी के एक लाख पन्ने भी नहीं है। अनुवाद में क्या हो रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में क्या हो रहा है, हमें जानना चाहिए। क्योंकि यह तकनीक भाषा के बिना भी संचार स्थापित करने के लिए प्रयासरत है। तकनीक की उपलब्धता हिंदी के लिए वरदान है। वहीं कुवैत से आए जितेंद्र चौधरी ( हिंदी ब्लॉगर) ने कहा पहले हमारे शब्दों की प्रोसेसिंग बहुत होती थी मगर आज तकनीक आगे निकल गयी है। आज जरूरत है कि युवा विकिपीडिया का एक पेज रोज हिंदी में ट्रांसलेट करें। ओम विकास (विज्ञान प्रकाश मैगज़ीन के संपादक) ने कहा भाषा ऐसी हो जो सहज़ हो और सहयोगी भी हो। आज जो हिंदी है जिसमे 90 प्रतिशत साहित्य ही है। लेकिन अब जरूरत है हिंदी में साहित्य के साथ साहित्यकार का पक्ष भी हो।

विश्व कविता के दूसरे सत्र में दक्षिण अफ्रीका से लेबो मैशाइल, नेपाल से सुमन पोखरेल, अफ़गानिस्तान से ख़ुस्ता एलाम ने शिरकत की। साथ ही संतोष चौबे भी मौजूद थे। कवियों ने अपनी कविताओं को मूल भाषा में पढ़ा जिसका हिंदी अनुवाद भी सुनाया गया।

अफ़गानिस्तान से खुज़ेस्ता एलहम ने अपनी कविता "इफ यू बिकम द रेन” का अंग्रेजी में पाठ किया, जिसका हिंदी अनुवाद राखी गर्ग ने सुनाया। कविता की एक पंक्ति है "बारिश ... यदि तुम बारिश बनो तो मेरे केशों पर बहना, यदि तुम सूरज बनो से मेरे ठंडे हाथों को ताप देना, यदि तुम एक चिडि़या बनो तो मेरी खिड़की पे आके गीत गाना"। उनकी दूसरी कविता “वॉइस ऑफ़ ए अफगाननिस्तानी वीमेन” थी, इसका हिंदी अनुवाद है “चट्टान... चट्टान याद है तुम्हें, मैं बिलकुल तुम्हारे जैसे ही हूँ, मैं एक बेटी हूँ और एक ज़िम्मेदार माँ भी| कई बार बिखरती हूँ और फिर खड़ी हो जाती हूँ बार-बार कई बार| बाद में अन्य कवियों ने भी अपनी प्रसिद्ध कविता का पाठ किया।

सिनेमा में सबसे ज्यादा महत्व कंटेंट का-जयंत देशमुख

इधर महादेवी सभागार में ‘साहित्य में सिनेमा और कला’ विषय पर संवाद आयोजित किया गया। इस सत्र में फ़िल्म लेखिका ज्योति कपूर, कला निदेशक जयंत देशमुख, कार्टूनिष्ट आबिद सूरती, फ़िल्म समीक्षक अनिल चौबे, विश्वरंग के सह निदेशक विनय उपाध्याय के साथ रंगकर्मी और समीक्षक सुदीप सोहिनी ने सत्र का समन्वयन किया।

कला निदेशक जयंत देशमुख ने कहा कि सिनेमा में सबसे ज्यादा महत्व कंटेंट का है। मैंने बहुत सारी ऐसी फिल्में की जो साहित्य पर आधारित हैं, एक लिटरेचर जब स्क्रीन प्ले में और फिर फ़िल्म में बदलता है तो वो एक लंबी यात्रा तय करता है, इस बीच लिटरेचर में बहुत बदलाव आ जाते हैं। भारतीय फिल्मों पर विदेशी फिल्मों का भी असर पड़ा है।

अच्छा डायरेक्टर साहित्य को अलग स्तर पर ले जाता है-सुरती

आबिद सुरती ने कहा कि जब साहित्य फ़िल्म में कन्वर्ट होता है तो उसमें बहुत बदलाव आते हैं। अगर सत्यजीत जैसे डायरेक्टर के पास आपका साहित्य जाता है तो वो उसे अगले स्तर पर ले जाते हैं, वहीं अगर डायरेक्टर कामर्शियल है तो वो उसमें जबरन आइटम सॉन्ग भी डाल सकते हैं। फ़िल्म लेखक ज्योति कपूर ने कहा कि साहित्य सिनेमा के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।

फ़िल्म बनाने वाले का सहित्य से सम्बंध फ़िल्म पर गहरा असर डालता है-चौबे

फ़िल्म समीक्षक अनिल चौबे ने कहा कि फ़िल्म बनाने वाले का सहित्य से सम्बंध फ़िल्म पर गहरा असर डालता है। सत्यजीत रे मिस्टर ऑथेंटिक थे वो साहित्य से गहरा जुड़ाव रखने वाले डायरेक्टर थे। अच्छा सिनेमा और बुरा सिनेमा, उसी परिपेक्ष में है जैसा अच्छा साहित्य और बुरा साहित्य।

हिंदी को बढ़ावा देने के लिए आयोजित कि जाए "अंतर्राष्ट्रीय मानक परीक्षा "

प्रेमचंद हॉल में आयजित व्याख्यान में "विश्व में हिंदी- विदेशी भाषा के रूप में हिंदी की वर्तमान स्थिति" विषय पर चर्चा की गई। इस दौरान कहा गया कि हिंदी में वैश्विक भाषा होने के सभी लक्षण हैं..लेकिन सिर्फ इसलिए कि यह एक राष्ट्रीय भाषा नहीं है, इसलिए यह एक वैश्विक भाषा नहीं हो सकती है, इस विचार को बदलने की आवश्यकता है। लगभग 80 देशों में हिंदी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में सिखायी जाती है। वर्तमान में 650 मिलियन से अधिक लोग हिंदी बोलते हैं, जो इसे दूसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा बनाते हैं।

मॉस्को विश्वविद्यालय में हिंदी और भाषा विज्ञान कि प्रोफेसर डॉ. ल्यूडमिला खोखलोवा ने अपने विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम के बारे में बात की। जैसे कि इसे हिंदी व्याकरण और साहित्य के विभिन्न खंडों में कैसे वितरित किया जाता है और बुनियादी और उन्नत तौर पर कैसे पढ़ाया जाता है। उन्होंने कहा कि छात्रों के दोषों को सुधारने की जरूरत है।

जर्मनी से डॉ. तात्याना ओरान्सक्या ने कहा कि वैश्विक स्तर पर एक अंतर्राष्ट्रीय मानक परीक्षा आयोजित करने के लिए एक नया सुझाव दिया जाएगा, जो दुनिया में हिंदी की लोकप्रियता बढ़ाने में मदद करेगा। इनके साथ डॉ. उपुल रंजीत (श्रीलंका), डॉ. रिप्सिमे नेरसियन (आर्मेनिया), डॉ. डारगिया कोकियोवा (कजाकिस्तान), डॉ. गनेडी श्लेम्पोरे (इज़राइल) सहित अन्य वक्ताओं ने हिंदी को वैश्विक भाषा बनाने के लिए अपने विचारों और कार्यों को साझा किया। प्रो वीके वर्मा ने इस सत्र का सञ्चालन किया।

पुस्तकों से वंचित बच्चों तक यात्रा के जरिये पहुंची पुस्तकें : शशांक

भोपाल. लेखक से मिलिए कार्यक्रम में वक्ता शशांक, रामकुमार तिवारी, महेश कटारे थे। इस दौरान शशांक ने कहा ये जो विश्वरंग की यात्रा जमीनी स्तर से शुरू हुई थी, गांव-गांव में पुस्तक यात्रा गई उन गांवों तक पहुँची जहां के बच्चे पुस्तकों से वंचित थे। वहीं महेश कटारे ने कहा बचपन में जब हम पढ़ाई कर रहे थे, हमारे पिताजी मनचाहा पैसा नहीं दिया करते थे, जितना भी पैसा मिलता था, उसमें एक ही शौक था पुस्तक खरीदने का। हमने उस दौर में अलग-अलग प्रकाशनों की पुस्तकें खरीदी, इसी से मुझे पढ़ने लिखने और विचारधारा समझने की इच्छा हुई।

लेखक से मिलिए कार्यक्रम में वक्ता बलराम गुमास्ता, मुकेश वर्मा थे तो संचालन मोहन सगौरिया ने किया। इस सत्र में मुकेश वर्मा की कहानियों और बलराम गुमास्ता की कविताओं के लेखन पर चर्चा हुई। जिसके तहत वक्ता ने कहा कवि लिखते-लिखते एक समय के बाद आलोचक हो जाता है और लेखक लिखते-लिखते एक समय के बाद सम्पादक हो जाता है। इसके बाद अगली कड़ी में कहानी और कविताओं का पाठ हुआ।

लेखक से मिलिए के अगले सत्र में मनोज श्रीवास्तव और डॉक्टर वीणा सिन्हा ने जीवन आध्यात्म और उसको प्रेरित करने वाली कविता और कहानी पर चर्चा की। साथ ही इसी बीच दर्शकों और वक्ताओं के बीच सवांद भी हुआ। वहीं अगले सत्र में महेश दर्पण पाठकों से रूबरू होकर उन्हें कहानी लेखन और उन्हें गढ़ने की कला से अवगत कराया। इंद्रजीत सिंह ने दर्शको की जिज्ञासा को शांत किया।

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