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विश्व रंग में प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से किया अभिभूत

Nov
08 2019

भोपाल: 08 नवंबर/ टैगोर अंतर्राष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव विश्व रंग के पांचवें दिन शुक्रवार को साहित्य की विभिन्न विधाओं यथा कविता, कहानी सहित अन्य मुद्दों पर प्रवासी लेखकों सहित ख्यात साहित्यकारों से साहित्य प्रेमियों ने चर्चा की। विभिन्न सत्रों में हुई परिचर्चाओं में साहित्य प्रेमियों खासकर युवाओं ने कहानी व कविता लिखने के गुर सीखे। अपनी जिज्ञासाओं का समाधान भी प्राप्त किया। इस दौरान कवियों ने काव्य पाठ किया तो कहानीकारों ने अपने लेखन के बारे में बताया। इस दौरान प्रवासी साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से किया दर्शकों को अभिभूत भी किया।

विश्व रंग के साहित्य उत्सव में युवा कहानी पाठ का आयोजन किया गया। विश्वरंग के पांचवें दिन समानांतर सत्रों की श्रृंखला में वनमाली सभागार में आयोजित छठे सत्र का आरंभ युवा कहानीकार दिव्या विजय ने कहानी पाठ से किया।

क्रमशः युवा बहुचर्चित कथाकार इंदिरा दांगी ने अपनी कहानी 'लीप सेकेंड' के जरिये पात्र गुलाल के जीवन दर्शन से अवगत कराया। इसी कार्यक्रम के आधुनिक समय के प्रमाणित आलोचक और कहानीकार राहुल सिंह ने बताया बचपन में स्कूल से कहानी लिखने की सीख मिली। अपनी कहानी भूत के इर्द-गिर्द के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा मेरी कहानी आपको जितनी झूठी लगेगी, उतनी ही सच्ची भी। भूतों के सामाजिक जीवन की कहानी ने श्रोताओं को खूब गुदगुदाया। सत्र का संचालन कर रहे आशुतोष ने अपनी कहानी 'स्कूटर गोलगप्पे और वो लहराता आँचल' का पाठ किया जिसमें व्यक्ति के करियर की सफलता के परिश्रम और असफलता के प्रभावों का बताया। 'वीराने का खोदवाल' नामक अपनी कहानी का पाठ कर रहे चंदन पांडेय ने श्रोताओं को अपनी कहानी से ये सोचने पर मजबूर कर दिया कि समय कितना बदल गया है। मनोज पांडेय ने 'एक बूढ़ा था जो शायद कभी था ही नही' का पाठ किया जिसके जरिये अपनी कल्पनाओं से श्रोताओं को अभीभूत किया। सत्र की अध्यक्षता कर रही वरिष्ठ कहानीकार, आलोचक चंद्रकांता ने कहा कि आज का युवा कहानीकार मुख्य धारा से जुड़ गया है। इसके पीछे का कारण ये है कि उन्होंने समाज के हर वर्ग को अपनी कहानियों में समावेशित किया है। सत्र को अपनी उपस्थिति से सुशोभित कर रहे वरिष्ठ कथाकार मुकेश वर्मा ने युवा कहानीकारों को स्मृति चिन्ह और पुष्पगुच्छ से सम्मानित किया।

प्रवासी भारतीय कवियों ने किया हिंदी कविता पाठ

विश्वरंग के पांचवें दिन महादेवी सभागार में प्रवासी भारतीय कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। इस सत्र में 8 कवि शामिल हुए। सत्र का संचालन रेखा राजवंशी ने किया।

चाबी वाली गुड़िया ने अब चाबी से चलना छोड़ दिया – रेखा मैत्र (अमेरिका)

अमेरिका से आईं कवयित्री रेखा मैत्र ने कहा कि विश्वरंग हिंदी का सबसे बड़ा यज्ञ है लेकिन इसका व्यवहार उतना ही सरल है। उन्होंने अपने काव्यपाठ में चाबी वाली गुड़िया, कल रात चांद मेरे पास खिड़की से आया, जुड़वां, तिरेंगे से बातचीत जैसी कवितायें सुनाकर श्रोताओं का खूब मनोरंजन किया। वहीं उन्होंने अपनी प्रस्तुति का समापन कुछ बेहतरीन मुक्तकों के साथ किया।

पुष्पिता अवस्थी ने प्रेम और महिलाओं पर केंद्रित कविताएं पढ़ी

कवयित्री पुष्पिता अवस्थी ने अपने काव्यपाठ की शुरुआत कविता 'पृथ्वी' से की। उन्होंने औरत को पृथ्वी की संज्ञा देते हुए स्त्रियों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर गहरी चोट की। इसके बाद उन्होंने कविता 'बीज' और 'प्रेम' का पाठ किया। नीदरलैंड से आये कवि रामा तक्षक ने विश्वरंग को ऐतेहासिक आयोजन बताया। उन्होंने अपनी कविता 'मौन' का पाठ किया।

रात बाकी है चंदा फलक में अभी - अशोक सिंह (न्यूयार्क)

न्यूयार्क से विश्वरंग का हिस्सा बने कवि अशोक सिंह ने अपनी नज़्म 'रात बाकी है चंदा फलक में अभी' पेश की। प्रेम पर आधारित इस नज़्म का सभागार में मौजूद युवाओं ने खूब लुफ्त उठाया। अशोक सिंह के बाद सिडनी ऑस्ट्रेलिया से आईं कवयित्री भावना कुंवर ने काव्य पाठ किया। इनके बाद संजय अग्निहोत्री, उमेश ताम्बी, रमेश जोशी ने कविता पाठ किया।

पर्यावरण संतुलन, नागरिकता और विस्थापन पर हुआ कवितापाठ

निराला सभागार में पर्यावरण संतुलन, नागरिकता के साथ विस्थापन पर केंद्रित रचनाओं का पाठ किया गया। कवियों ने अपनी कविताओं से भौगोलिक विस्थापन और आत्मिक विस्थापन को परिभाषित किया। 'साहित्यकार प्रभाकर' से अलंकृत कश्मीर से आए निदा निवाज़ ने अपनी रचना 'विरासत की रक्षा' के जरिए कश्मीर से विस्थापन के मार्मिक दर्द से श्रोताओं को अवगत कराया। सत्र की अध्यक्षता कर रहे प्रोफेसर देवेंद्र चौबे ने अपनी रचनाओं की प्रस्तुति से समकालीन भारत के साथ-साथ पर्यावरण की भयावह स्थिति के बारे में बताया। सामाजिक विकारों, संबंधों की गूंज लिए इस कवितापाठ के सत्र में प्रख्यात कवयित्री चंद्रकांता ने अपनी कविता 'कोई वजह नहीं थी" से विस्थापन पर चोट की। क्रमशः महाराज कृष्ण संतोषी ने अपनी कविता मधुमक्खियां का पाठ किया। पुलिस की सेवा करने के साथ-साथ साहित्य सेवक रहे मनोहर बाथम ने अपने शब्दों में मानव तस्करी जैसे गंभीर विषय पर दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। लीलाधर मंडलोई, प्रांजल धर के साथ सत्र के संचालक कुमार अनुपम की उपस्थिति ने सत्र की शोभा बढ़ाई।

हिंदी की नई आवाज सत्र के दौरान वनमाली सभागार में वक्ता सत्या व्यास, दिव्य प्रकाश दुबे थे तो संचालक सुदीप सोहनी। वक्ताओं से साहित्यप्रेमियों ने कहानी और कविता लिखने की भी प्रक्रिया जानी। सत्या व्यास ने बताया लिखने से ज्यादा पढ़ना है जितना पढ़ेंगे, उतनी ही लेखनी मजबूत होगी। प्रक्रिया दो तरीके की होती है। पहली ये कि जो आप लिख रहे हैं हो सकता है जो आपने लिखा है वह 60 साल पहले लिखा जा चुका हो। साथ ही दूसरा यह कि वर्तमान में क्या लिखा नहीं जा रहा है। क्या लिखा जा रहा है, वह तो सब जानते हैं लेकिन क्या नहीं लिखा जा रहा है, वह नहीं पता होता है।

दिव्यप्रकाश दुबे ने कहा दुनिया में कोई भी बिना पढ़े राइटर तो नहीं बना। मुझे लगता था कि जिस कहानी को जीना चाहिए, मैं उस कहानी को लिख रहा हूं। मैंने अपनी मार्केटिंग की नौकरी के फ्रस्टेशन में हर वीक एंड में कुछ लिखना शुरू किया। जिसमें कोई बात, कोई किस्सा होता था। शनिवार से रविवार तक लिखता और सोमवार को बॉस के जाने के बाद दोस्तों के साथ 10 बजे रात तक बैठकर उसे साझा करता। 14 हफ्ते के बाद पब्लिशर आए और फिर कहानी बन गई। साल में शनिवार और रविवार को मिलाकर 104 दिन मिलते हैं और इसमें किताबें लिखी जा सकती हैं। यदि 60 दिन कहीं जाने के लिए रख लिए जाएं और बचे दिनों में आसानी से किताब लिखी जा सकती है। वहीं अगली कड़ी में सत्या व्यास ने “बाग़ी बलिया”के कुछ अंश सुनाए।

प्रवासी भारतीय कथा लेखन की चुनौतियों पर हुई चर्चा

विश्व रंग के पांचवें दिन महादेवी सभागार में प्रवासी भारतीय कथा लेखन और मूल्यांकन की चुनौतियों पर चर्चा की गई। सत्र की अध्यक्षता कमल किशोर गोयनका ने की। संचालन अनिल शर्मा ने किया।

साहित्य का मूल्यांकन एक ही परिधि पर हो-सक्सेना

सत्र की पहली वक्ता उषा राजे सक्सेना ने अपने उदबोधन में कहा कि प्रवासी भारतीय लेखन के लिए हिंदी साहित्य में हमेशा से बंटवारा होता रहा है, प्रवासी साहित्य नाम का इस्तेमाल ही इसे बांटने का काम करता है। पूरे साहित्य को एक ही दृष्टि से देखा जाना चाहिए, इसमें बंटवारा नहीं होना चाहिए। हिंदी भाषा के साहित्य के साथ यह गंभीर समस्या है, सभी साहित्य का मूल्यांकन एक ही परिधि पर होना चाहिए।

प्रवासी साहित्य में हमेशा भारतीयता का भाव रहता है-वर्मा

ब्रिटेन से आई साहित्यकार जया वर्मा ने कहा कि मनुष्य के जन्म के साथ ही कहानी का भी जन्म हुआ है। आज कई देशों के लोग हिंदी में कहानियां और साहित्य लिख रहे हैं। प्रवासी भारतीय जब भी कहानियां या किताब लिखते हैं तो भारतीयता का भाव उसमें रहता है। प्रवासी भारतीय अपने अनुभवों को कविता, कहानी के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं।

विदेशी में रोप दिए जाने से पौधा विदेशी नहीं होता- दिव्या

प्रवासी सहित्यकार दिव्या माथुर ने कहा कि प्रवासी लेखक दो सतहों पर रहते हैं, हमारा तन विदेश और मन भारत में रहता है। प्रवासी लेखक के साहित्य पर उनके देश की राजनैतिक, भूगौलिक, घटनाओं, लोगों के व्यवहार, संस्कृति का गहरा असर पड़ता है। विदेशी में रोप दिए जाने से पौधा विदेशी नहीं होता, ऐसे ही प्रवासी साहित्यकार की रचनाओं में दो देशों की संस्कृति समाहित हो जाती है।

भारत का साहित्य बहुत व्यापक और विशाल- संध्या

सिंगापुर से आईं संध्या सिंह ने अपने उदबोधन में कहा कि भारत का साहित्य बहुत व्यापक और विशाल है। विश्व की संस्कृतियों को समझने के लिए वहां के साहित्य की पढ़ना बहुत आवश्यक है। इंटरनेट के आने से अब प्रवासी साहित्यकारों को भी आसानी से पढ़ा जा सकता है। सिंगापुर में हिंदी साहित्य पर बात करते हुए कहा कि शुरुआत में सिंगापुर में जो भारतीय बसने आए वो बहुत निचले स्तर का काम करते थे, इसलिए उस समय का कोई साहित्य हमें नहीं मिल सका है। आज के दौर में सिंगापुर में भी हिंदी साहित्य का विकास शुरू हो रहा है, सिंगापुर में नए भारतीय साहित्यकार कविता लेखन और प्रकाशन पर जोर दे रहे हैं।

पाठकों तक साहित्य पहुंचाना सबसे बड़ी चुनौती- शर्मा

तेजेन्द्र शर्मा ने अपने उदबोधन में कहा कि सबसे बड़ी चुनौती यह है कि अपने लिखे साहित्य को पाठकों तक कैसे पहुंचाया जाए। कम्प्यूटर के आने से काफी मदद मिली, यूनिकोड के आने से मुश्किलें और कम हुई। अब बड़ी समस्या प्रवासी भारतीयों की दूसरी पीढ़ी तैयार करने की है, अबतक केवल भारत से जाकर विदेशों में बसे लोग ही साहित्य लेखन का काम कर रहे हैं पर वहीं जन्मे प्रवासी भारतीय लेखन क्षेत्र में काफी कम हैं। तेजेन्द्र शर्मा के बाद राकेश पाण्डेय ने सभागार को विषय पर संबोधित किया।

प्रवासी भारतीय उपन्यास लेखन-मूल्यांकन में चुनौतियां

भारत के कई लेखक हैं जो अब विभिन्न देशों में आधारित हैं लेकिन वे हिंदी में साहित्य लिख रहे हैं। विश्व रंग ने उन लेखकों को एक विशेष चर्चा सत्र के लिए आमंत्रित किया, जो उन्हें लेखन में मिल रही चुनौतियों पर था। अनूप भार्गव ने चर्चा का संचालन किया, वहीं नासिरा शर्मा ने अध्यक्षता की। इस सत्र में डेनमार्क की एक प्रसिद्ध लेखिका अर्चना पैन्युली ने अपने लेखन में आने वाली चुनौतियों के बारे में बात की, जहां उन्होंने कहा कि जैसे हम एक अलग संस्कृति में रह रहे हैं इसलिए हमारी भावना और सोच की दिशा इससे प्रभावित होती है। इसके अलावा दो संस्कृति के साथ रहने से एक मिश्रित संस्कृति विकसित हुई है जिस पर लेखन अब महत्वपूर्ण हो गया है। अमेरिका से सुषम बेदी, बर्मिंगम से वंदना मुकेश भी चर्चा में शामिल थीं।

चाण्डालों का बदला - क्रोनिकल्स ऑफ़ कोसल

पुस्तक के लेखक संदीप नय्यर ने पुस्तक के बारे में बताते हुए कहा कि ये पुस्तक एक तीन पुस्तकों की श्रृंखला का प्रथम भाग है जिसमे महाभारत युग के बाद के वैदिक काल की कथा है. इसमें बताया गया है कि वह समय परिवर्तनों का युग था, जिसमे ऋग्वेद काल की उदारवादी नीतियां रूढ़िवादी हो रही थीं. समाज में रूढ़िवादिता बढ़ रही थी. इस पुस्तक में लिखी गयी कहानी काल्पनिक हैं. उन्होंने बताया कि कोसल राज्य पर राम ने राज्य किया जिसके बाद इसे उन्होंने अपने पुत्रों लव और कुश में विभाजित किया और किस प्रकार उन्होंने इसका विकास किया।

इस पुस्तक के प्रथम भाग में एक ब्राह्मिन महिला कहानी है जिसे उसके परिवर्तन ग्रसित समाज के विरोध के कारण समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता है. जिसके बाद वो चाण्डालों की बस्ती में शरण लेती है और अपनी दयनीय स्थिति के विरोध में समाज के खिलाफ हिंसा के साथ लड़ती है। श्री नय्यर ने बताया कि इस पुस्तक के माध्यम से वे ये सन्देश देना चाहते हैं कि हिंसा यदि प्रेम और किसी की भलाई के लिए की जाए तो ही उसे सार्थक माना जाता है।

उन्होंने बताया कि पुस्तक का अगला भाग भी लगभग पूर्ण हो चुका है और उसमें किसानों की दयनीय स्थिति के चलते उनका समाज से द्रोह करते हुए दस्यु बन जाने की कथा है। किताब के विषय पर पाठकों ने भी प्रश्न किए, जिनका लेखकों ने उत्तर देकर उन्हें संतुष्ट किया। संचालक के रूप में मनोज त्रिपाठी मौजूद थे।

प्रेमचंद्र सभागार में पानी और पर्यावरण विषय पर आधारित परिचर्चा में अभय मिश्र द्वारा रचित पुस्तक "माटी मानस चून" पर चर्चा की गई। इस विषय पर चर्चा करने के लिए लेखिका और कवयित्री ऋतुप्रिया खरे, प्रो. मौली कौशल इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र और श्री गौरी शंकर रैना, सलाहकार इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र मौजूद थे।

लाभ कमाने का स्रोत नहीं हैं नदियां - अभय मिश्रा

किताब के विषय में बताते हुए लेखक अभय मिश्र ने कहा कि इसमें सन 2075 में हमारे समाज की स्थिति को दर्शाया गया है कि यदि समाज और सरकारें यदि इसी प्रकार विकास के नाम पर योजनाओं का क्रियान्वयन करती रही तो भविष्य में क्या स्थिति होगी। उन्होंने कहा कि नदियां केवल एक धन अर्जन का स्रोत बना दी गई हैं। जिससे इनका दोहन करने के पूर्व हम कुछ नहीं सोचते हैं. पुस्तक में बताया गया है कि यदि नदियों ने हमारी योजनाओ के बदले में प्रतिक्रिया दी तो समाज कि स्थिति बेहद दयनीय हो जाएगी।

कवयित्री ऋतुप्रिया खरे ने एक गीत "गंगे नमामि नमामि " से अपने वक्तव्य से शुरुआत की। उन्होंने कहा कि नदियां किसी भी सभ्यता के उद्गम और विकास का मुख्य कारण है। प्रो मौली कौशल ने कहा कि समाज के लोग ये कहकर के हमारा नदियों से सीधा कोई सम्बन्ध नहीं है उनकी दयनीय स्थिति से मुंह नहीं फेर सकते। गौरी शंकर रैना ने बताया कि पूर्व वर्ष में संस्थान द्वारा 8 फिल्मों का निर्माण किया गया जिनमें प्रमुखता से इस विषय पर बात की गयी है। परिचर्चा के अंत में मौजूद दर्शकों ने वक्ताओं से प्रश्न भी किए।

जीवन का सत्य प्रेम है : संतोष चौबे

भोपाल. लेखक से मिलिए कार्यक्रम में देशभर से आए लेखकों ने अपनी पुस्तकों के बारे में विस्तार से चर्चा की। इसमें मंच पर प्रियंवद, अरुणेश, राकेश मिश्र और संतोष चौबे ने कहानियों पर बात की। सत्र के आरंभ में साहित्यकार संतोष चौबे ने कहा जीवन का सत्य प्रेम है और कहानियां लिखना कोई आसान काम नहीं। वनमाली राष्ट्रीय कथा सम्मान से अलंकृत प्रियवंद ने कहा कि कोई भी लेखक किसी सत्ता के साथ खड़ा नहीं हो सकता। इस सत्र का संचालन स्वास्तिका चक्रवर्ती के साथ-साथ बद्र वास्ती ने किया।

वहीं दूसरी ओर पंकज मित्र और जयनंदन ने अपनी कहानी मान मर्दन के बारे में बताते हुए कहा कि शब्द चयन से ही बंधते हैं दर्शक। क्रमशः पंकज मित्र ने अपनी कफन रिमिक्स नामक कहानी के बारे में पाठकों से बातचीत की और युवाओं को यह संदेश दिया कि अगर आप कहानी लिखना चाहते हैं तो आप को पढ़ना पड़ेगा। इस सत्र का प्रवाहमय संचालन डॉ प्रीति प्रवीण खरे ने किया।

कश्मीर में आतंकवाद ने वहां की कला और संस्कृति को भी प्रभावित किया है

शाम के सत्र के लेखक से मिलिए कार्यक्रम में महाराज कृष्ण संतोषी अनंतनाग से शामिल हुए तो पुलवामा से निदा नवाज़। मंच का संचालन प्रांजल धर ने किया। महाराजा कृष्ण संतोषी ने कहा कि हम दोनों ही लेखक कश्मीर से हैं जहाँ आतंकवाद ने कश्मीर को ध्वस्त कर दिया है। कला, संस्कृति, राजनीति, धर्म हर जगह आतंकवाद ने प्रभावित किया है। पिछले 30 सालों में जो कश्मीर आप देख रहे हैं वो वैसा कश्मीर नहीं है। वहाँ के लेखकों और लोगो से मिलिए तब असली कश्मीर से पहचान होगी।

संतोषी ने निदा नवाज़ की किताब सिसकिया लेता स्वर्ग डायरी में निजता के अंश तो मिलते ही हैं लेकिन इसमें जोख़िम भरे अंश भी हैं।

वहीँ समानातंर सत्र लेखक से मिलिए में जगन्नाथ दुबे, राकेश तिवारी, विनोद तिवारी और किरण सिंह भी मौजूद थी। इसमें किरण सिंह ने कहा कि धर्म ग्रंथ में यदि स्त्री के बारे में पढ़ा जाए जिसमे कई तरह के मिथक मिलते हैं और उनको फिर से परिभाषित किया जा सकता है। उन्होंने रामायण के कई उदाहरण देकर अपनी बात रखी।

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