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स्मृतियों और विरासत को सहेजने की असीम शक्ति होती है महिलाओं में - डॉ. विनीता चौबे

Mar
12 2022

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के उपलक्ष्य में वनमाली सृजन पीठ के मुक्ताकाश मंच पर आयोजित हुआ महिला रचनाकारों का 'कविता–पाठ'

अमराई की छाँव तले महिला रचनाकारों ने किया 'कविता–पाठ'

भोपाल : 12 मार्च/ अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर अमराई की छाँव तले 'वनमाली सृजन पीठ' के 'मुक्ताकाश मंच' पर महिला रचनाकारों का  'कविता–पाठ' आयोजित किया गया। अमराई की छाँव तले महिला रचनाकारों ने जैसे–जैसे अपनी संजीदा रचनाओं का पाठ किया वैसे–वैसे बादलों ने उमड़–घुमड़कर रिमझिम फुहारों से वातावरण को और अधिक खुशनुमा बना दिया। कविताओं की पंक्तियों के साथ–साथ आम के बोर से छन–छनकर आती फुहारों ने रचनाकारों और साहित्यप्रेमी श्रोताओं के उत्साह को दोगुना कर दिया।
 यह आयोजन 'विश्वरंग' के अंतर्गत रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय, भोपाल के तत्वावधान में वनमाली सृजन पीठ एवं आईसेक्ट पब्लिकेशन, भोपाल द्वारा आयोजित किया गया।

कार्यक्रम की मुख्य अतिथि 'इलेक्ट्रॉनिकी आपके लिए' की कार्यकारी संपादक डॉ. विनीता चौबे ने कहा कि कुदरत ने महिलाओं को सृजनकर्ता के साथ–साथ अपनी विरासत और स्मृतियों को सहेजने की असीम शक्ति प्रदान की है। सृजन और रचनात्मकता के क्षेत्र में महिलाओं ने वैश्विक स्तर पर व्यापक फलक को बुना है। आज सभी महिला रचनाकारों द्वारा प्रस्तुत रचनाएँ इसका सशक्त उदाहरण है।
डॉ. विनीता चौबे ने अपनी रचना 'गृहस्थी' का बहुत ही करुणामय पाठ करते हुए विरासत और स्मृतियों को सहेजने का मार्मिक संदेश श्रोताओं के मन तक बहुत सहजता के साथ पहुँचाया।

इस अवसर पर वरिष्ठ कवि–कथाकार, विश्व रंग के निदेशक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति श्री संतोष चौबे ने कहा कि भारतीय परंपरा की दृष्टि से ही हम समाज में समानता के संतुलित दृष्टिकोण को स्थापित कर सकते हैं। कला, साहित्य और संस्कृति हमें यह दृष्टि प्रदान करती है। सदियों से प्रकृति से हमारा गहरा नाता रहा है। कई रचनाकार ऋतुओं के अनुसार रचनाकर्म करते हैं। वे गर्मी में कहानियाँ और बारिश में कविताओं की रचना करते हैं। अर्थात श्रेष्ठ रचनाकर्म के लिए प्रकृति से समन्वय बहुत जरूरी है। मन से समरसता के साथ–साथ रचनाओं में भी समरसता का भाव झलकना चाहिए। आज का यह आयोजन अमराई की सघन छाँव के तले किया जाना इस दिशा में एक नई शुरुआत है।

इस अवसर पर वरिष्ठ कथाकार, वनमाली सृजन पीठ के अध्यक्ष एवं आईसेक्ट पब्लिकेशन के निदेशक श्री मुकेश वर्मा ने  सभी रचनाकारों और साहित्यप्रेमियों का स्वागत करते हुए कहा कि महिला पुरुष समानता के साथ–साथ साहित्य बिरादरी के सभी लोगों को समावेशी दृष्टिकोण के साथ मिलकर समाज हित में साहित्यकर्म करने की जरूरत है। वनमाली सृजन पीठ का मंच मानवता के हितों के लिए रचनात्मक और सृजनात्मक कार्य करनेवाले सभी रचनाकारों का अपना साझा वैश्विक मंच है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ कथाकार एवं स्त्री विषयों की अध्येता डॉ. रेखा कस्तवार ने कहा कि सिर्फ एक दिन ही नहीं सभी दिन महिलाओं और पुरुषों के लिए बराबर होना चाहिए। महिलाओं के बिना सृष्टि का सह–अस्तित्व संभव ही नहीं हो सकता। सभी महिला रचनाकारों ने आज अपनी रचनाओं के जरिए जीवन के विभिन्न रंगों, प्रेम, करुणा, अपनत्व, मानवता के लिये जारी संघर्षों को बखूबी बयां किया।

वरिष्ठ रचनाकार डॉ. साधना बलवटे ने अपनी रचना में मनुष्य जीवन की सच्चाइयों को अभिव्यक्त करते हुए कहा कि–
कितना कुछ सीखा जाना  'शेष' रहा करता है,
कितना कुछ संचित है किन्तु'लेश' रहा करता है।
अनुभव की गठरी को लादे पथ पर बढ़ती हूँ।
मीलों के पत्थर पर अपनी सींखें गढ़ती हूँ
फिर भी दूरी पर मंजिल का देश रहा करता है
कितना कुछ सीखा जाना 'शेष' रहा करता है।

युवा कवियत्री एवं वर्तमान में मध्यप्रदेश पुलिस के आर्थिक अपराध प्रकोष्ठ में ए.आई.जी. सुश्री पल्लवी त्रिवेदी ने स्त्री के अंतर्मन की अनकही बातों को अपनी रचना 'भाषा' में एक नया स्वर प्रदान करते हुए कहा कि–
हँसी की भाषा में सुनाऊँगी अपने सबसे घने अवसाद  के किस्से
रूठने की भाषा में वसूलूँगी तुमसे देर से आने का हर्जाना
ग़ुस्से की भाषा में कराउँगी स्मरण तुम्हें तुम्हारे वायदे
तुतलाती बोली में पोंछ दूँगी तुम्हारे माथे से टपकती दिनभर की थकान

उदासी की भाषा में दूँगी तुम्हारी बेरुख़ी का जवाब
आँसुओं की भाषा में बतलाऊँगी कि
'आह..दुखता है मन तुम्हारे मन पर पड़े नील से'

झूठ की भाषा में सुनाऊँगी अपने ज़ख्मों के हालचाल
सच की भाषा में थामूँगी हर बार तुम्हारा हाथ

प्रार्थना की भाषा में तुम्हारे लिए उगाऊँगी स्वप्न अपनी आँखों में
कामना की भाषा में तुम्हें उबारूँगी ठुकराए जाने की पीड़ा भरी स्मृति से

मौन की भाषा में पुकारूँगी तुम्हारा नाम
चिड़िया की भाषा में भरूँगी तुम्हारी आत्मा में संगीत

और विदा के वक्त
गूँथकर सारी भाषाएँ एक चुम्बन में
रख दूँगी तुम्हारे होंठों पर    
सफ़र के सामान की तरह।

वरिष्ठ लेखिका ममता तिवारी ने अपनी दो पंक्तियों के माध्यम से महिलाओं पर लगे पहरों को उजागर करते हुए कहा कि–
वे कनात तान कर पूछते है कि
तुम्हें दिखाई क्यों नहीं देता नीला आसमान।
अपनी रचना 'रोटी' में स्त्री की व्यथा को बयां करते हुए उन्होंने कहा कि–
चूल्हे के पास
मन की आँच पे
रोज सेंकती हूँ रोटीयाँ
कुछ पकी, कुछ कच्ची
कुछ फूली, कुछ पिचकी
पर मन है कि नहीं भरता
जाने क्यों इन सवालों से डरता
कि...
आज रोटी कुछ ज्यादा सिंक गई
या थोड़ी कच्ची रह गई...
रोटी के जरिए मेरे कच्चेपन पे भी
ताने कसे जाते...
और शाम ढलते तक
मैं फिर चूल्हे की आँच उकसाती
सेंकने बैठ जाती हूँ रोटियाँ
काश! मेरी जिंदगी भी रोटियों की मानिंद हो जाती
तो शायद...
मैं तेरे गले उतर जाती...।

युवा रचनाकार डॉ. रितु पल्लवी ने अपनी कविता 'नारीत्व' में नारी के विराट स्वरूप के माध्यम से समाज को आईना दिखाते हुए कहा कि–
मैं सुंदर हूँ
ये आईना नहीं बताएगा अब
सदियों से
कभी रानी पद्मावती
के मान का
कभी देवी द्रौपदी के अभिमान का
बिम्ब बनाया
उनके सौंदर्य को ग्रहण लगाया
पर अब
इस सहज नारीत्व को
बाँध नहीं पाएगा
पल-पल बदलते
गतिमय रूप को
साध नहीं पाएगा
आईना है
दिखाएगा
पर मेरी छवि नहीं बनाएगा !

वरिष्ठ कवियत्री श्रीमती ममता वाजपेयी ने अपने गीत 'जिस दिन मैं साहस खो दूंगी' में स्त्री के सामर्थ्य और भविष्य के प्रति उसकी आशाओं को नये स्वर प्रदान करते हुए कहा कि–
मैं हूँ ग्रंथ सभ्यताओं का
इश्तिहार व्यापार नहीं
मेरे भीतर लिखा समर्पण
स्वारथ का व्यवहार नहीं...

इतिहास के पृष्ठ भरे हैं
मेरी करुण कथाओं से
सदा जूझती रही समय से
हारी नहीं व्यथाओं से
जिस दिन में साहस खो दूँगी
सोचो उस दिन क्या होगा
कोई रिश्ता नहीं बचेगा
कोई भी घर द्वार नहीं...

अपनी बेबाक रचनाशीलता के जरिए रचना संसार में एक विशिष्ट पहचान कायम करने वाली युवा कवयित्री सुश्री श्रुति कुशवाह ने अपनी रचना  में पुरुषों के लिये कहा कि–
मैंने देखे हैं नदी से तरल और आकाश की तरह ऊँचे पुरुष
ऐसे पुरुष जो परिभाषा में नहीं, सही अर्थ में मनुष्य हैं।

मैं एक फेमिनिस्ट स्त्री हूँ
और मैंने देखे हैं मुझसे बेहतर स्त्रीवादी पुरुष

मैं ऐसी स्त्री हूँ जो स्त्री अधिकार के लिये लड़ती है हमेशा
लेकिन ये पुरुष विरोधी होना नहीं
ठीक वैसे ही जैसे
पुरुष होना मनुष्य विरोधी होना नहीं है।

प्रेम की अद्भुत कविताएँ रचने वाली युवा कवियत्री विशाखा राजुरकर राज ने अपनी कविता 'प्रेमिका' में स्त्री के जीवन में घटित होती घटनाओं के दारुण चित्र को प्रस्तुत करते हुए श्रोताओं को करुणा से भर दिया। 'प्रेमिका'  में उन्होंने कहा कि–
प्रणय के क्षणों में
जब तुम अपनी ऊँगलियों से
मेरी पीठ छूओगे
तो तुम्हें अपनी प्रेमिका की पीठ की जगह
एक घायल पीठ मिलेगी!
तुम पाओगे खुरदुरे निशां
धोके के
लानत के
धिक्कार के
नफ़रत के
चिढ़ के
अपमान के
तिरस्कार के
और साहस के भी...

अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर आयोजित इस अविस्मरणीय 'कविता–पाठ' का सफल संचालन युवा रचनाकार डॉ. मौसमी परिहार द्वारा किया गया।
इस अवसर पर वरिष्ठ कवि श्री बलराम गुमास्ता, श्री विनय उपाध्याय, श्री गोकुल सोनी, सुश्री कांता राय, श्रीमती प्रभा वर्मा, श्री रवि ब्रजपुरिया, श्री देवी प्रसाद बाजपेयी, श्री अविनाश कस्तवार, सुश्री साधना चतुर्वेदी, सुश्री पुष्पा असिवाल, डॉ. संगीता जौहरी, डॉ. सावित्री सिंह परिहार, श्री मोहन सगोरिया, श्री अरुणेश शुक्ल, श्री रवि जैन, श्री नीरज रिछारिया, सुश्री नीतू मुकूल, सुश्री मौलश्री सक्सेना आदि सहित कई साहित्यानुरागी उपस्थित रहें।
कार्यक्रम का संयोजन श्री संजय सिंह राठौर, श्री कुणाल सिंह, सुश्री ज्योति रघुवंशी, प्रशांत सोनी द्वारा किया गया।
तकनीकी संयोजन रोहित श्रीवास्तव, श्री उपेंद्र पाटने, श्री उमेश द्वारा किया गया।

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