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रंगमंच का डिजिटल तकनीक से कोई मुकाबला नहीं, वे रिकोरडेड हैं और हम जीवित - के जी त्रिवेदी

Jun
02 2020

लॉक डाउन के कारण कई लोगों की दिनचर्या बदल गई लोग घर मैं बैठने को मजबूर हो गए. भोपाल के रंगकर्मी भी इससे अछूते नहीं रहे. कई लोगों के सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो गया  ऐसे वक़्त में भोपाल की संस्था "आर्टिस्ट वेल्फेयर सोसायटी" कलाकारों की मदद के लिए आगे आयी. संस्था ने कलाकारों के घर पर राशन पहुंचाया. आर्टिस्ट वेल्फेयर सोसाइटी के संस्थापक भोपाल के वरिष्ठ रंगकर्मी के जी त्रिवेदी से लॉक डाउन के कारण उपजी परेशानियां और इस लॉक डाउन के समय का उपयोग कैसे किया? इस विषय को लेकर हमारे कला संवाददाता आबिद अली ने के जी त्रिवेदी से महत्वपूर्ण बातचीत की है. 

आबिद - भोपाल के रंगकर्मियों ने इस लॉक डाउन के समय का किस तरह से सदुपयोग किया? 

के जी त्रिवेदी - वरिष्ठ रंगकर्मी के जी त्रिवेदी ने बताया की जो काम करने वाला था वह बंद नहीं किया बस अपने काम करने का तरीका बदल दिया। बदले हुए तरीकों में हमने ऑनलाइन काम किया इस दिशा में सबसे पहले हमने जूम पर काम किया। जूम के जरिए मीटिंग की लेकिन इस मीटिंग में लगा की बच्चा कुर्सी पर फंसा हुआ है और रंगमंच तथा कुर्सी का कोई नाता नहीं है दूर दूर तक. लेकिन उसमें एक समस्या थी बच्चा उसमें फंसा हुआ महसूस करता था इसलिए व्हाटसअप ग्रुप बनाया। उसमें ऐक्टर से कहा गया कि अपनी कल्पना शक्ति से एक 3-4 मिनट का सीन बना कर उसमें इम्प्रोवाइज कर के ग्रुप में भेजो। फिर उस सीन को देख कर उस ऐक्टर से वीडियो कॉल पर बात कर के उस सीन की कमियां बता देता था. इस ऑनलाइन वर्कशाप का फायदा ये हुआ कि अब उस ऐक्टर को कभी भी किसी ऑडिशन में कैमरे से डर नहीं लगेगा.

आबिद - कोरोना काल के इस सोशल डिस्टेंसिंग के दौर में किस तरह थिएटर आगे बढ़ेगा?

के जी त्रिवेदी - अब मैं अपने आप को अपने काम को कन्वर्ट करूंगा जब तक लॉक डाउन है. इसमे एक तरीका है "ड्रॉइंग रूम थिएटर" का इसमे होगा ये की 2 या 3 ऐक्टर का नाटक तैय्यार करूंगा। आपके ड्रॉइंग रूम में जहां आपके कुछ दोस्त होंगे वहां प्रस्तुति दूँगा. दूसरा तरीका ये है कि मैं मेरे रिहर्सल प्लेस पर 20-25 लोगों को बिठा कर नाटक दिखाऊंगा। इसके अलावा जिन रंगकर्मियों के रिहर्सल प्लेस हैं वहां जाकर प्रस्तुति दूँगा. अगर ऑडिटोरियम मिल जाता है तो पहले इंटरनैट पर फार्म दूँगा उस फार्म को नाटक देखने के इच्छुक व्यक्ती भर कर फीस के साथ इन्टरनेट पर जमा करेंगे। उस फार्म का प्रिंट निकाल कर सोशल डिस्टेंसिंग के अनुसार 3 कुर्सी छोड़ कर ऑडिटोरियम की कुर्सी पर लगाऊंगा ताकि संबंधित व्यक्ती वहां आकर बैठ सके, व्यक्ती को हॉल में घुसने से पहले सेनेटाइज किया जाएगा. उसके बाद नाटक की प्रस्तुति दी जाएगी.

आबिद- बदलते हुए परिवेश में आजकल एक बड़ा दर्शक वर्ग ओ टी पी प्लेटफॉर्म और यूट्यूब चैनल पर आने वाली शॉर्ट फिल्म और वेब सीरीज की तरफ मुड़ गया है तो इस बदले हुए परिवेश मैं थिएटर मैं क्या बदलाव लाना होंगे?

के जी त्रिवेदी - रंगकर्म जीवंत कला है और बाकी सब मृत कला है क्योंकि इसमें एक बार शूट हो जाने के बाद बदलाव की संभावना नहीं होती। वहीं रंगमंच में अभिनेता दर्शक से रुबरु होकर दर्शक की आँखों में आंख डाल कर अभिनय करता है, इसलिए रंगमंच के मुकाबले में कोई नहीं। आजकल तकनीक के नाटक भी होते हैं लेकिन नाटक में जितनी तकनीक ईस्तेमाल होगी अभिनेता उतना गौण होता चला जाएगा, इससे बचना चाहिए। रंगमंच जितना सहज होगा अभिनेता की कला उतनी ही निखर कर सामने आएगी. रंगमंच का इस डिजिटल तकनीक से कोई मुकाबला नहीं है क्योंकि वे रिकोरडेड है और हम जीवित. 

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