राष्ट्रपति मुर्मू, गृह मंत्री शाह, बंगाल की सीएम ने संथाल विद्रोह के शहीदों को दी श्रद्धांजलि

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कोलकाता, 30 जून (आईएएनएस)। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रविवार को हूल दिवस (विद्रोह दिवस) के अवसर पर संथाल विद्रोह के शहीदों को श्रद्धांजलि दी।

इस दिन 1855 में दो संथाल भाइयों सिद्धो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने इस आदिवासी समुदाय से करीब 10 हजार लोगों को इकट्ठा करके अंग्रेजों के खिलाफ एक आंदोलन शुरू किया था।

संथाल समुदाय के लोगों को उनकी भूमि से वंचित किये जाने के कारण जो विद्रोह हुआ था, उसे हूल (विद्रोह) कहा गया था। इसलिए परंपरागत रूप से इस दिन को भारत में हूल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

खुद आदिवासी समुदाय से आने वाली राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट किया, “मैं संथाल विद्रोह के सभी अमर सेनानियों को ‘हूल दिवस’ पर सादर श्रद्धांजलि अर्पित करती हूं। अन्याय के विरुद्ध ऐतिहासिक युद्ध करने वाले सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव तथा फूलो-झानो जैसे वीरों और वीरांगनाओं के बलिदान की अमर गाथाएं स्वर्णाक्षरों में अंकित हैं। उन क्रांतिवीरों के आदर्श, हम सभी देशवासियों के लिए, सदैव प्रेरणा-स्रोत बने रहेंगे।”

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी एक्स पर एक पोस्ट में कहा, “हूल दिवस के अवसर पर सभी जनजातीय वीरों के अमर बलिदान को नमन करता हूं। मातृभूमि, स्वसंस्कृति और जनजातीय अस्मिता की रक्षा के लिए सिद्धो-कान्हू, चांद-भैरव जैसे वीरों व फूलो-झानो जैसी वीरांगनाओं ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ते हुए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। इन क्रांतिकारियों के शौर्य और त्याग से संथाल परगना जल, जंगल व जमीन के लिए संघर्ष की प्रेरणा बन गई। महान हूल क्रांतिकारियों की शौर्य गाथा भावी पीढ़ी को मातृभूमि की सेवा करने के लिए प्रेरित करती रहेगी।”

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने एक्स अकाउंट पर पोस्ट किया, “हूल दिवस के अवसर पर मेरे सभी आदिवासी भाइयों और बहनों को हार्दिक सम्मान। शासकों के अत्याचार और शोषण के खिलाफ सिद्धो-कान्हू के नेतृत्व में संथालों का संघर्ष हमें अन्याय के खिलाफ सिर उठाने की प्रेरणा देता है। संथाल विद्रोह के इन दो नायकों को सम्मानित करते हुए उनके नाम को राज्य के एक विश्वविद्यालय में शामिल किया है।

हूल विद्रोह एक वर्ष तक चला था। इसने ब्रिटिश शासकों को काफी परेशान किया। दोनों भाइयों के नेतृत्व में विद्रोहियों ने जंगलों के भीतर से गुरिल्ला युद्ध की रणनीति अपनाई थी।