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दिल्ली में काम जीता है - नफरत हारी है, मगर क्या यह पूरा सच है ?

Feb
12 2020

पुष्य मित्र

एक वक्त पूरे देश में राज करने का सपना देखने वाली भाजपा पिछले दो सालों में 7 राज्यों में चुनाव हार चुकी है। यह सिलसिला रुकने का नाम नहीं ले रहा। जाहिर है पार्टी के रणनीतिकार अपने तरीके से इसका आकलन कर भी रहे होंगे, क्योंकि इन पराजयों के बावजूद अभी भी यही माना जाता है कि भाजपा के पास देश की सबसे बेहतरीन चुनाव जिताऊ टीम है। वह अपनी पार्टी की किसी नकारा सरकार को भी भले जिता न सके, मगर फाइट में तो ला ही सकती है। उसे हर तरह के तरीके आते हैं, बूथ लेवल मैनेजमेंट से लेकर लोकल लेवल के वोट पोलराइजेशन तक। इसलिये अक्सर जब भाजपा के नेता कोई नफरत भरा बयान दे बैठते हैं तो वह महज उनकी व्यक्तिगत मानसिकता का उदाहरण नहीं होता, उसके पीछे कहीं न कहीं एक बड़ी चुनावी रणनीति होती है। उन्हें यह हुनर भी मालूम है कि छोटे छोटे तनावपूर्ण माहौल उत्पन्न कर कैसे पार्टी का वोट बढ़ाया जा सकता है। हम आप इन मुद्दों में भावनात्मक रूप से उलझ जाते हैं, मगर उनके लिये यह महज एक चुनावी रणनीति होती है। वे इस रणनीति में अपने वैचारिक विरोधियों का कुशलतापूर्वक इस्तेमाल करने में भी दक्ष हैं। इसलिए उनकी टीम जरूर सोचती होगी कि आखिरी इन दिनों ऐसा क्या हो रहा है कि वे राज्यों में लगातार हार रहे हैं। इसलिये उन्हें इस सिलसिले में हमारी आपकी सलाह की जरूरत बिल्कुल नहीं है। फिर भी, मन में विचार आ गया सो लिख दे रहा हूँ।

आखिर राज्यों में क्यों हार रही है भाजपा? कल से आम आदमी पार्टी के लोग लगातार कह रहे हैं कि क्या सचमुच नफरत हार गई? अब दिल्ली के लोग धर्म के नाम पर नफरत करना बंद कर देंगे? मुझे नहीं लगता।

मुझे ऐसा इसलिये नहीं लगता, क्योंकि इसी दिल्ली के वोटरों ने महज 9 महीने पहले भाजपा को 56 फीसदी वोट देकर जिताया था। यही हाल झारखण्ड, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, राजस्थान जैसे राज्यों में भी हुआ। लोगों ने राज्यों में भले दूसरी पार्टियों को वोट दिया, केंद्र में मोदी जी के नाम पर ही मतदान किया। आम आदमी पार्टी लोगों की इस भावना को समझ गयी थी, इसलिये उसने मोदी और हिंदुत्व पर हमले से परहेज किया। विवादास्पद मुद्दों से बचे, अपने काम की ब्रांडिंग की और परोक्ष रूप से इस भावना को प्रसारित किया कि देश में मोदी, दिल्ली में केजरीवाल। इसलिये वे शाहीनबाग नहीं गए। वे देश में हिंदुत्व के उभार से टकराये नहीं। इस तरह अपने लिये जीत हासिल कर ली।

दरअसल, देश की राजनीति में इन दिनों यही हो रहा है। हिन्दू वोटर केंद्र के चुनाव में मोदी के पीछे खड़े हो जा रहे हैं और राज्य के चुनाव में काम करने वाली सरकार को चुन रहे हैं। हिन्दू वोटरों ने यह मान लिया है कि मोदी जी का काम सिर्फ हिन्दुओं को राजनीतिक रूप से ताकतवर बनाना है। यह काम वे कर ही रहे हैं। बाकी राजकाज के दूसरे सवाल उनसे नहीं सुलझेंगे, इसके लिये जो पार्टी ठीक है उसे चुन लिया जाए।

शायद भाजपा ने गौर नहीं किया मगर अपने काम काज से उसने अपनी छवि ऐसी बना ली है कि वे सिर्फ हिंदुओं को पोलिटिकल पॉवर दे सकते हैं। विकास करना, रोजगार देना, व्यापार चलाना उनके बस की बात नहीं। कट्टर से कट्टर भाजपा समर्थक यह जानते हैं इसलिये वे कहते भी हैं कि हमने मोदी जी को महंगाई कम करने और रोजगार बढ़ाने के लिये वोट थोड़े ही दिया है। मोदी जी को तो देश का माहौल ठीक करने के लिये वोट दिया है। माहौल ठीक करने से उनका आशय पॉवर का पलड़ा हिंदुओं के पक्ष में हमेशा के लिये झुका देने से है।

इसलिये, अगर आज लोकसभा चुनाव हो जाये तो इसी दिल्ली में भाजपा फिर सात की सात सीट ला सकती है। इसलिये जो लोग समझते हैं कि इस चुनाव ने साम्प्रदायिकता को हरा दिया है, वे गलतफहमी में हैं।

मगर क्या यह बात भाजपा के पक्ष में मानी जा सकती है? क्या लगातार चुनाव दर चुनाव हार रही भाजपा इतनी मजबूत रह पाएगी कि अपने तमाम साम्प्रदायिक एजेंडों को जिसे कट्टर हिन्दू वोटर हिंदुओं का पलड़ा भारी करना समझते हैं, पूरा कर पायेगी?

अभी महज दो महीने बाद राज्यसभा के चुनाव होने हैं। अप्रैल महीने में राजसभा की 55 सीटों पर मतदान होंगे और नवम्बर तक 17 अन्य सीटों के लिये वोटिंग होंगे। और भाजपा की राज्यों की हार का प्रभाव इन चुनावों में दिखेगा। अभी राज्यसभा में एनडीए की 245 में से 125 सीटें हैं। 123 सीटों पर बहुमत हो जाता हैं। इसलिये वे धड़ाधड़ अपनी मर्जी का कानून पास कर ले रहे हैं। मगर अप्रैल में ही यह बहुमत उनके हाथ से फिसलने वाला है। फिर उनकी ताकत वैसी नहीं रह जायेगी, जैसी थी।

यह सब सिर्फ इसलिये होगा, क्योंकि भाजपा ने खुद की पहचान को एक बेहतर रिजल्ट देने वाली कामकाजी पार्टी के बदले हिंदुओं को पॉवर देने वाली कम्युनल पार्टी के रूप में रिड्यूस कर लिया है। जाहिर है, यही बात उसे अंदर ही अंदर खोखला कर रही है, जो बात उस नक्शे में भी दिखती है, जिसे भाजपा की हार के बाद शेयर किया जाता है।

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पुष्यमित्र

लेखक सामाजिक सरोकारों और विकास के मुद्दों पर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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