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स्वतंत्रता संग्राम में संस्कृत की उपादेयता

Oct
09 2022

डॉ कपिल भार्गव 
सुश्री नीता शर्मा

जब भी हम स्वतंत्रता संग्राम के विषय में चर्चा करते हैं या विचार करते हैं तो सर्वप्रथम हम अपने सेनानियों का स्मरण करते हैं, जिन्होंने अपने देश की स्वतंत्रता में अहम भूमिका निभाई है | ठीक इसी प्रकार अनेकों लेखकों की लेखिनी ने भी स्वतंत्रता की भावनाओं का जागरण किया | इन स्वतंत्रता सेनानियों की और कवियों की लेखनियों ने देश की स्वतंत्रता में जो भूमिका निभाई है उसको हम अनेक पुस्तकों को पढ़कर पुन:स्मरण एवं विस्तार से जान सकते हैं |    

स्वतंत्रता संग्राम भारतीय इतिहास का वहा युग है जो पीड़ा, कड़वाहट आत्मसम्मान, गौरव एवं शहीदों के लहू को समेटे हैं | स्वतंत्रता संग्राम एक ऐसी क्रिया है जिसमे कहीं बहुबल तो कहीं बुद्धिबल का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है | बात बाहुबल  की हो या बुद्धिबल की प्राथमिकता तो शिक्षण को ही दी जाती है | न केवल विद्यालय, शिक्षण प्राप्त करने के अनेकों स्रोत है, जैसे – गुरुकुल, हमारा घर, हमारे पूर्वज, हमारे ज्येष्ठ, हमारा समाज, हमारी संस्कृति और यहाँ तक की हमारी प्रकृति भी | परन्तु व्यक्ति कहाँ से विद्या ग्रहण करता है यह उसी व्यक्ति पर निर्भर करता है | स्वतन्त्रता संग्राम एक एसा पहलू है जहां हमारे देश में अमूल्य रत्नों को खोया है | परन्तु विचारणीय विषय यह भी है की देश के जो अमूल्य रत्न थे उनके अन्दर देश के प्रति अत्यधिक आत्मीयता, इतना अपनापन और देश के लिय मर मिटने की शक्ति कहां से मिली ? इस विषय पर विचार करते है तो हम पाते है की इन के जो माता पिता है, इनके जो सहपाठी है या इन से सम्बंधित कोई भी, इन सभी ने उन्हें अपने देश के प्रति प्रेरित किया है | अगर हम वीरांगनाओं पर विचार करें तो झांसी की रानी लक्ष्मी बाई, जिनके पिता स्वयं आचार्य थे जिनसे लक्ष्मी बाई ने विद्या प्राप्त की | वह संस्कृत के विद्वान थे, न केवल गुरु स्वयं लक्ष्मी बाई भी संस्कृत की बहुत अच्छी ज्ञानी थी अतः इन्हें अपनी झांसी का ग्रंथालय अत्यंत प्रिय था | या फिर हम बात करें शिवाजी महाराज की तो इन के पिता तो स्वयं ही राजा और पराक्रमी थे परन्तु इन की माता भी किसी से कम नहीं थी माता जीजाबाई भी देश प्रेमी और स्वावलम्बी थी जिनके प्रोत्साहन , सहकार और श्रम के कारण शिवाजी महाराज ने अपने देश का गौरव बचाया |                                                                  

अगर किसी भी विषय पर चर्चा करते है तो हम पते है की इन सभी के पीछे संस्कृत भाषा की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है | जब देश के स्वतन्त्रता सेनानियों से संस्कृत का इतना घनिष्ठ सम्बन्ध है तो हमें संस्कृत के विषय में  भी विचार करना चाहिया | विश्व की समस्त प्राचीन भाषाओं और उनके साहित्य / वांग्मय में संस्कृत का विशिष्ट महत्वा है | भारत के सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, दार्शनिक, सामाजिक, और राजनैतिक जीवन एवं विकास के सपनों की संपूर्ण व्याख्या संस्कृत वांग्मय के माध्यम से आज उपलब्ध है | सहस्राब्दियों से इस भाषा और इस के वांग्मय को भारत में सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त रही | संस्कृत भारत की सांस्कृतिक भाषा रही है | सदियों तक समग्र भारत को सांस्कृतिक और भावानात्त्मक एकता मई आबद्ध रखने को भाषा मई महत्वा पूर्ण कार्य किया है | इसी कारण भारतीयों ने इस भाषा को अमर भाषा या देववाणी के नाम से सम्मानित किया है|  

संस्कृत भाषा में जो ज्ञान है वह हमें ज्ञानियों से तो प्राप्त होता ही है परन्तु ज्ञान की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुआ ऋषि मुनियों ने, आचार्यों ने, कवियों ने ग्रंथों के रूप में उस ज्ञान भण्डार को सहेज कर रखा है | अगर हम अपने संस्कृत साहित्य को देखेंगे तो हमें संस्कृत  साहित्य के ग्रंथो में अपने देश का अपूर्व वर्णन मिलता है और देश की स्वतन्त्रता के प्रति उन्हें प्रोत्साहित कर सकते है | आवश्यकता है तो केवल उन साहित्य ग्रंथों का अध्ययन , चाहे वह छोटे हो या  महाकाव्य प्रत्येक ग्रन्थ में विस्तार से या लघु रूप में जानकारियाँ हासिल कर ही लेते है | तथा च – 
      “ अपि स्वर्ण मई लंका न में लक्ष्मण रोचते 
        जननी जन्म भूमिश्च  स्वर्गादपि गरीयसी ” || { रामायण }

इस तरह  के श्लोकों से उक्तियों से सेंनानियों में प्रेरणा जागृत होती हें वो प्रेरित होतें हें उनमे देश प्रेम जागृत होता हे | चाहे उदारवादी राष्ट्रवादियों का आन्दोलन हो या क्रांतिकारी राष्ट्रवादियों का आन्दोलन सभी का प्रेरणा स्रोत संस्कृत साहित्य ही रहा है | महात्मा गाँधी ने सत्य और अहिंसा को स्वतंत्रता आन्दोलन में अभेद अस्त्र मन | 
इसकी  प्रेरणा उन्हें संस्कृत की इन सूक्तियों से मिली -  

“सत्यमेव जयते नानृतम सत्येन पन्था विततो देवयानः |
येनाक्रमंत्यारुशयो ह्याप्तकामो यात्रा तत्सत्यस्य परमम् निधानं ||”   {मुंडकोपनिशत ३.१.६.}

एवमेव “अहिंसा परमो धर्मः’’ | स्वतंत्रता आन्दोलन के काल में उन्होंने धर्मं के जिस स्वरुप की कल्पना की उसकी प्रेरणा भी संस्कृत से मिली है |
“धर्म यो बाधते  धर्मो नस धर्मः कुधर्मकः” | अर्थात  जो धर्मं दूसरे धर्मं का बाधक हे वह धर्म नहीं कुधर्म हें | क्रांतिकारियों के अनुसार “हम मूर्ख होंगे अगर हम उनके अस्त्र से ही उनको जबाब नहीं देंगे” इसकी प्रेरना उन्हें - वृजन्ति ते मूढ़धियः पराभवं भवन्ति मायाविशु ये न मायिनः | 
         
 प्रविश्य ही घ्नन्ति शठास्तथाविधानसम्वृतान्गान्निशिता इवेशव: || {किरातार्जुनीयम १ सर्ग.३० श्लोक}  

हमारी जो गुरुकुल परंपरा उसका इस संदर्भ में ह्रास हुआ और आज के समय  में संस्कृत का संस्कृत के अनुरागियों द्वारा संस्कृत का जीर्णोद्धार किया जा रहा है | उसमे प्रमुख स्थान विद्यालयों एवं विश्वविद्यायों का है जो आज आसमान की बुलंदियों को छू रहे हें | इन विश्वविद्यालयों में छात्रों को पुस्तकस्थ ज्ञान                                        मात्र नहीं दिया जाता अपि तु उस ज्ञान का क्रियान्वयन भी करवाया जाता है | इस बात को सुनकर तो यही प्रतीत हो रहा होगा की यह तो बाकी के विश्वविद्यालयों  और यूनिवर्सिटीमें भी होता हे तो इसमें विशेष क्या हे ? या इस प्रकार के ज्ञान प्रदान करने से देश में क्या परिवर्तन  आएगा या देश की स्वतंत्रता का इस से क्या सम्बन्ध | तो हम आपको बतादें की विश्वविद्यालयीन शिक्षा आत्मविश्वास, देशभक्ति एवं ज्ञान वृद्धि की भूमिका निभाती है | 

जिस प्रकार विश्वविद्यालय अपनी भूमिका स्वतन्त्रता संग्राम में निभाया करते थे उसी प्रकार आज फिर से उसी मार्ग पर अग्रसर है | न केवल विश्वविद्यालय आज देश में अनेकों प्रकार की गोष्ठियां, शिविर एवं प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन किया जा रहा है | इन सभी का मुख्या उद्देश्य संस्कृत के प्रति लोगों में जाग्रति लाना एवं जिस कार्य को करने की प्रतिज्ञा ली है उसके लीला उत्तम कारीगरों का निर्माण है|

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डॉ. कपिल कुमार भार्गव

(लेखक केन्द्रीय विद्यालय में शिक्षक, सामाजिक विषयों के जानकार एवं साहित्यकार हैं, इनसे [email protected] पर संपर्क किया जा सकता है.)

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