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सरकार की जिद, धमकियों और संवादहीनता से बढ़ा संकट और ताक़तवर होता जनांदोलन

Jan
22 2020

राकेश दीवान

मनोविज्ञान के महारथी सिगमंड फ्रायड के एक शिष्य और प्रतिद्वंदी हुए हैं, कॉर्ल गुस्ताव जुंग। बडी ना-नुकुर के बाद बोलकर लिखी गई जुंग की यादों के खजाने में एक है, जब उनके मनोचिकित्सालय में भिन्न-भिन्न विषयों के दो उद्भट विद्वान भरती हुए थे। उनकी खासियत थी कि जब उनमें से एक अपने विषय पर बोलना शुरु करता था तो दूसरा बेहद शांत, सौम्य होकर सुनता था। कुछ इसी तरह का बर्ताव दूसरा भी करता था, लेकिन उनकी बातों में कोई आपसी तारतम्य नहीं होता था। जुंग ने लिखा है कि ‘मेरे पूछने पर उन विद्वानों ने जो प्रति-प्रश्न किया उसका उत्त‍र मैं जीवनभर नहीं खोज पाया। यह प्रति-प्रश्न था- ‘दुनिया में कोई भी ऐसा जोडा बता दो जिनकी बातों में कोई आपसी तारतम्य हो।‘

इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक के लगभग अंत में संवाद का यह बेतुकापन हमारे राजनेताओं, खासकर सत्ताधारी राजनेताओं ने बखूबी सीख लिया है। ‘नागरिकता संशोधन अधिनियम’ (सीएए), ’राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी’ (एनपीए) और ‘राष्ट्रीय नागरिक पंजी’ (एनआरसी) पर जारी मौजूदा बहस-मुबाहसे को ही देखें तो कहने और उस कहे को सुनने वालों के बीच कोसों दूरी है। मसलन-पिछले डेढ-दो महीने से जारी इस बवाल पर सत्तारूढ भाजपा ने देशभर के लोगों को सिखाने-समझाने की मुहीम छेडी है, लेकिन इसमें जो, जैसे कहा जा रहा है उससे और कुछ भी हो, संवाद तो नहीं हो सकता। बानगी के तौर पर छोटे-बडे कस्बों-शहरों में समझाइश के लिए छूटे देश के गृहमंत्री अपने भाषण की शुरुआत में ही साफ कर देते हैं कि वे और उनकी सरकार ‘सीएए’ से ‘एक इंच भी पीछे हटने वाली नहीं है।' अब जब कोई बात पहले से इतनी पुख्ता हो तो फिर उस पर किसी तरह की समझाइश की कोई गुंजाइश कहां बचती है? सुनने वालों को सिर्फ मान लेने और उसे अमल करने के अलावा संवाद का और कौन-सा रास्ता बचता है? क्या इस तौर-तरीके को संवाद की बजाए आदेश नहीं कहा जाना चाहिए? इस संवादहीनता की एक और बानगी हाल में राहुल गांधी के प्रधानमंत्री से इस आग्रह करने पर दिखाई दी कि वे छात्र-छात्राओं से बातचीत करके उन्हें मौजूदा बदहाली के बारे में कुछ समझा दें। इस सामान्य सी बात का जबाव उन्हीं की कैबिनेट के मंत्री रविशंकर प्रसाद ने यह कहकर दिया कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री को धमका रहे हैं।

‘सीएए’ पर देशभर में कहा जा रहा है कि यह संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का उल्लंघन है, लेकिन सरकार इसका जबाव दे रही है कि कानून का यह संशोधन नागरिकता देने के लिए है, नागरिकता लेने के लिए नहीं। संविधान धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि के आधार पर विभाजन करने वाले किसी भी कानून की तस्दीक नहीं करता, लेकिन ‘सीएए’ साफ तौर पर तीन देशों (पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान) और छह धर्मों (हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध, ईसाई और पारसी) की तरफदारी करता है। केन्द्र की बहुमत से लदी-फंदी भाजपा सरकार चाहे तो सीधे-सरल सवालों के सटीक, संविधान-सम्मत जबाव दे सकती है, लेकिन ऐसा किया नहीं जा रहा। जाहिर है, सत्ता के पास जनता के सीधे-सरल सवालों के कोई संतोषप्रद उत्तर नहीं हैं। तो क्या यह जानबूझकर की जा रही कोई राजनीतिक हरकत है या फिर सरकार में ही ऐसे नादान बालमा बैठे हैं जिन्हें सरल सवालों के सीधे जबाव देना नहीं आता?

थोडी समझदारी और धीरज से सत्तारूढ भाजपा के इतिहास को देखें तो आसानी से उजागर हो जाता है कि ‘सीएए,’ ‘एनपीए’ और ‘एनआरसी’ अपने परोक्ष रूप में उसकी जन्म-कुंडली के सबसे ऊंचे स्थान पर विराजमान हैं। ये तीनों उस हिन्दू राष्ट्र की स्थापना के लिए नींव की मानिंद हैं जिसे पार्टी के पितृपुरुष विनायक दामोदर सावरकर ने अभिकल्पित किया और बाद के शीर्ष-पुरुषों ने वापरा था। इस सिलसिले में यह जानना भी रोचक हो सकता है कि ‘द्विराष्ट्र वाद’ की ठीक इसी तर्ज पर मोहम्मद अली जिन्ना ने भी इस्लामी राष्ट्र की परिकल्पना की थी और उनके चेले-चपाटियों ने अपनी-अपनी तरह के ‘सीएए,’ ‘एनपीए’ और ‘एनआरसी’ बनाकर लागू करने की कोशिशें भी की थीं। ऐसी लंबी और गहरी पृष्ठभूमि से उठाया गया नागरिकता का यह मसला मामूली सवालों-जबावों से निपटाया नहीं जा सकता। उसके लिए किसी और तरह के संवाद की जरूरत होगी। कमाल यह है कि देश के युवाओं, महिलाओं, दलितों, आदिवासियों और आम नागरिकों ने धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि की दीवारों को तोडकर सत्ता के बरक्स उस संवाद को प्रभावी रूप से देशभर में खडा कर दिया है। जाहिर है, अपने प्रत्यक्ष-परोक्ष हितों की बिना पर नागरिकता परिभाषित करने वाली सत्ता को हिन्दुस्तानी आवाम ने ठीक अपनी बनक का जबाव दे दिया है।

यह नई तर्ज की बनक उन युवाओं की भी है जिनके बारे में बेलूर मठ में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल ही में कहा था कि वे इक्कीसवीं सदी में भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। मुश्किल यह है कि देशभर की नागरिकता तय करने वाली सत्ता, नई ऊंचाइयों पर पहुंचाए जाने वाले इन्हीं युवाओं की सरल-सहज बोली, भाषा तक नहीं समझ पा रही। उसे पता ही नहीं चल रहा कि देश की कुल आबादी के आधे से अधिक, 35 साल से कम उम्र के ये युवा सत्ता और समाज से आखिर क्या चाहते हैं? मोदी-मोदी के सन्निपाती प्रलाप में डूबी भीड के मद में उसे समझ ही नहीं आ रहा कि कैसे पिछले केवल डेढ-दो महीनों में देश के लगभग हरेक गांव, कस्बे, नगर, महानगर में सिर्फ नागरिकता के मसले पर बडे-छोटे धरने जुट गए हैं? ऐसा क्या हुआ कि केवल सात-आठ महीने पहले चुनी गई केन्द्र सरकार को साल बिताने के पहले प्रभावी, देशव्यापी विरोध का सामना करना पड गया?

हिन्दू् राष्ट्र के अलावा युवाओं का यह दूसरा मसला है जहां देश की सत्ता अपने नागरिकों की बात सुनने-समझने में नाकाम साबित हुई है। जिस तरह धर्म, जाति, लिंग, क्षेत्र, भाषा आदि में व्यापक विविधताओं के चलते कोई एक-आयामी सत्ता स्थापित नहीं की जा सकती, ठीक उसी तरह बेरोजगारी, मंहगाई, गरीबी, भुखमरी से दो-चार होती जनता नागरिकता के किसी शिगूफे से बहलाई नहीं जा सकती। आखिर पेंतालीस साल में पहली बार छाई मौजूदा बे-रोजगारी को कोई भी युवा कैसे अनदेखी कर सकेगा? या देशभर में रोज आत्महत्याएं करते 28 किसानों और 36 बे-रोजगारों की दर किसी को, कैसे बेपरवाह रहने दे सकती है? वर्ष 2014 और 2019 के चुनावी अनुमानों ने युवाओं को मोदी का प्रशंसक बताया था। इनमें से पहले चुनाव में बेहतर जीवन की आशा बंधाई गई थी और दूसरे चुनाव में उसी आशा का नवीनीकरण था, लेकिन छह महीने बीतते-बीतते मोदी को अपने राजनीतिक जीवन का सर्वाधिक कठिन विरोध क्यों और कैसे झेलना पडा? इसमें मीडिया के भक्ति-भाव में हुई गफलतों को भी जोड लें तो भी सत्ता और समाज के बीच की संवाद-शून्यता को नकारा नहीं जा सकता। यह बात सत्ता, विपक्ष समेत हर तरह की राजनीतिक जमातों और खास-ओ-आम को समझ लेना चाहिए कि आज का युवा और उसका समाज नए तौर-तरीकों से उठता-बैठता और आंदोलित होता है। उससे सदियों पुराने तौर-तरीकों से निपटा नहीं जा सकता। यदि निपटने की जिद करेंगे तो मुंह की खानी पडेगी।

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राकेश दीवान

लेखक जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार हैं.

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