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आखिरकार संघर्ष की जीत हुई, किसान विरोधी काले कानून वापस लेने को मज़बूर हुई मोदी सरकार

Nov
19 2021

रानी शर्मा

भोपाल :19 नवंबर/ दुनिया के सबसे लंबे समय तक भारत में चले शांतिपूर्ण अहिंसक किसान आंदोलन के सामने आखिरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज 19 नवंबर को समर्पण कर दिया। जिसमें 700 से ज्यादा किसान शहीद हुए।

देश के किसानों की यह बहुत बड़ी जीत है, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज की जाएगी, जिसमें यह बात भी दर्ज होगी कि भाजपा सरकार के राज्य में देश के किसानों को कृषि कानूनों को वापस लेने की अपनी मांगों के लिए एक साल से ज्यादा समय तक सर्दी-गर्मी -बरसात में सड़कों पर रहने के लिए मजबूर होना पड़ा था ।

आखिरकार 1 साल से ज्यादा समय तक जब किसान सड़कों पर अपने परिवार के साथ छोटे- छोटे बच्चों के साथ रह रहे थे, तब सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान क्यों नहीं दिया ? हालांकि यह खुशी की बात है कि किसानों की जीत हुई है लेकिन इस जीत के लिए 700 से ज्यादा किसानों ने अपने प्राणों की आहुति दी है, इस बात को इतिहास कभी नहीं भूलेगा। दुनिया के सबसे लंबे समय तक चले इस अहिंसक आंदोलन ने एक बार फिर साबित किया है कि इस देश को किसान और मजदूर ही चलाते आए हैं. वही इस देश की रीढ़ है और किसान - मजदूर की मेहनत से ही देश चल रहा है,  हालांकि देश के पूंजीपतियों के दबाव में सरकार ने तीन कृषि कानूनों को लागू करने के बहुत प्रयास किए, जिसके लिए देश की जनता-किसान और मजदूर उनको कभी माफ नहीं करेंगे ।
 
आजादी के 70 साल में कभी भी कोई सरकार इतनी निष्ठुर नहीं रही जोकि एक साल से ज्यादा समय तक किसानों का आंदोलन चलता रहा और ध्यान ना दे कर अपने कई जश्न समय-समय पर मनाती रही। इसके साथ ही यह भी याद रखा जाएगा कि इस आंदोलन को नृशंस तरीके से कुचलने के और समाप्त करवाने के कई प्रयास भी सरकार ने गोदी मीडिया के साथ मिलकर बड़े पैमाने पर किया है लेकिन हर बार सरकार को किसान आंदोलन के सामने मुंह की खानी पड़ी । 

इस आंदोलन में सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि किसान आंदोलन को समाप्त करके किसानों की मांगों को मानने का आश्वासन राजनीति से जुड़ा हुआ है, जिसके पीछे सब जानते हैं उत्तर प्रदेश सहित दूसरे राज्यों में आने वाले समय में चुनाव भी होने वाले हैं जिसमें भाजपा को मुंह की ना खानी पड़े इसलिए किसानों को खुश करने की कोशिश की गई है । जिस किसान आंदोलन को बहुत समय पहले ही समाप्त करने के लिए सरकार को मांगे मान लेनी चाहिए थी लेकिन हटधर्मी,  हिटलर शाही सरकार ने अपनी हठधर्मिता के आगे नहीं माना और आज तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की बात की है । 

सवाल यह भी है 1 साल से ज्यादा समय तक चले इस आंदोलन के दौरान जो देश के किसानों का और देश की जनता का नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा? जिन 700 से ज्यादा किसानों की सड़कों पर सर्दी- गर्मी- बरसात और बीमारियों के कारण मौत हो गई , उनकी मौत का मुआवजा भाजपा सरकार को भाजपा पार्टी के फंड से करना चाहिए। इन मृत किसानों को शहीद का दर्जा देकर उनके परिवार को 25 लाख का मुआवजा और पेंशन देना चाहिए। 

 इस आंदोलन से एक बात देश की सभी राजनीतिक पार्टियों को हमेशा के लिए समझ लेना चाहिए कि देश का किसान और मजदूर जब सड़कों पर उतरता है , तब वह तब तक हार नहीं मानता जब तक अपनी मांगों को नहीं मनवा लेता क्योंकि वास्तविक अर्थों में यह देश किसान और मजदूरों का ही है और उनके बिना इस देश की व्यवस्था नहीं चल सकती। इस देश के सही मायनों में मालिक किसान और मजदूर हैं। किसान मजदूरों को मेरा सलाम । जय मजदूर और जय किसान ।

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रानी शर्मा

लेखिका www.kharinews.com की सम्पादक हैं.

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