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कोरोना : बहुत से लोग दूसरों की जिंदगी बचाने के लिए खुद की जिंदगी लगा रहे दांव पर

Mar
25 2020

मनोज निगम

22 मार्च 2020 को प्रधानमंत्री ने लोगों से सर्तकता बरतते हुए जनता कर्फ्यू की अपील की और साथ ही अपनी जान जोखिम में डालकर कोरोना वायरस के खिलाफ जंग में जुटे डाक्टर, मेडिकल स्टाफ और मीडियाकर्मियों को धन्यवाद अर्पित करने का आव्हान किया। तब से ही मेरा ध्यान सफाईकर्मियों, पुलिसकर्मियों, डाक्टर और मेडिकल स्टाफ की ओर ज्यादा जाने लगा। बीते चार पांच दिन काफी सारे सफाईकर्मियों को देखा उनसे बातचीत की उनकी परेशानियों को समझने की कोशिश की, कुछेक के फोटो ले लिए, कुछ महिला सफाईकर्मियों ने फोटो लेने को मना कर दिया, तो उनके फोटो नही लिए। अधिकांश सफाईकर्मियों के पास दस्ताने, मास्क नही थे, खासकर जो नगर निगम के वाहन चला रहे थे उनके पास तो नही थे। ऐसे ही एक सज्जन से बात की, तो पहले तो उन्हौनें फोटो लेने से मना करते हुए हाथ कैमरे के आगे अड़ा दिया, लेकिन जब बात की तो उन्हौनें कहा कि कचरा उठाने वालों को तो मास्क मिलें है लेकिन हमें नही, हमको भी मिलना ही चाहिए, ऐसा कहते हुए एक दूसरे व्यक्ति भी आ गए जो कि कचरा उठाते है और उन्हौनें सहर्ष फोटो लेने की हामी भर दी।

सार्वजनिक शौचालय का केयरटेकर चाहता है कि उसको भी सुरक्षा उपकरण दिए जाएं। इस हेल्थ इमरजेंसी में वैसे तो सरकार की जिम्मेदारी है कि सभी नागरिकों को मास्क, सेनेटाइजर उपलब्ध करवाएं लेकिन सफाई कर्मचारी जो दिन-रात सफाई में लगे हुए हैं नगर निगम आयुक्त से गुजारिश है कि सफाई कर्मचारियों को तुरंत मास्क और अन्य सुरक्षा के उपकरण तत्काल उपलब्ध कराएं। कलेक्टर साहब को वाट्सअप पर जानकारी दी तो उन्हौनें अभी तक नही देखी।

जनता कर्फ्यू के दौरान पुलिस वालों द्वारा आम जनता को पीटते हुए कुछ फोटो वायरल हुए, देखकर दुख हुआ। धारा 144 लगाने और लाक डाउन के दौरान दूध, सब्जी की तलाश में निकले तो घर से एक किलोमीटर के दायरें में कई सारे सांची बूथ बंद मिलें, सब्जी वाले कहीं भी ना मिले, चलते चलते एक शराब की खुली दुकान हमें चिड़ा रही थी। सोमवार को सुबह सुबह दूध भी मिल गया, अन्य आवश्यक सामान और सब्जी भी, यह भी सुखद रहा कि आवश्यक जरूरत की सामग्री को लेने के लिए सुबह कहीं भी हबड़-तबड़ नहीं दिखी ना ही ग्राहकों में और ना ही दुकानदारों में, हालांकि यह जरूर हुआ कि सब्जी वालों ने रेट कुछ बड़ा दिए। पुराने शहर से यह भी खबर आतीं रही कि लाक डाउन के बावजूद आवाजाही चलती रहीं, लोग नही सुधरे और बिगड़ती स्थिति को सुधारने के लिए प्रशासन को कर्फ्यु तक लगाना पड़ गया।

मंगलवार को कर्फ्यु वाले दिन दूध वाली दुकान नही खुली तो चौराहे पर खड़ा इंतजार कर रहा था, देखा कि तीन चार पुलिसकर्मी है जो वाहन से आनें जानें वालों को रोक रहे है, कोई परिवार अपने बच्चे को लेने जा रहा था, कोई व्यक्ति पानी भरने, एक मौलाना साहब नमाज पढ़ने मस्जिद जा रहे थे। हेडसाहब ने सबको बहुत ही अच्छी तरह से समझाया, लगा कि वाजिब कारणों से लोग निकले है तो जाने भी दे रहे थे, देखकर सुखद अहसास हुआ और यह देखकर दुख भी कि दिन भर इनको लोगों से बातचीत करना होता है उसके बावजूद भी उनके मुंह पर मास्क नही लगा हुआ था।

किराने की दुकान खुली तो दुकानवाली बंगाली महिला जिन्हें हम भाभी कहते है, एक अधेड़ को डांट पिला रहीं थी, कि पूरी दुनियां को अपनी जान की पड़ी है और तुम तम्बाकू का पाऊच मांगने चले आए हो, मुझसे कहने लगीं की देखो ना भाई साहब लोग मानते ही नही, थोड़ी देर के लिए ही तो दुकान खुलती है और लोग सिगरेट, गुटका मांगने चले आते है, हम लोगों को जरूरी सामान दें या फिर मरने का सामान। रास्ते में कबाड़ी के दुकान के पीछे चार-पांच हाथ ठेले जमीन से लम्बवत खडे होकर दिहाडियों का दुख बयां कर रहे थे। घर पर आकर देखा तो अखबार बिखरा हुआ नीचे पड़ा हुआ था और उस पर खबर का शीर्षक झांक रहा था कि “दोपहर 12 से शाम 5 बजे तक खुली रहेंगी शराब दुकाने “ मैं अवाक् था। जब सुप्रीम कोर्ट, रेल का पूरा सिस्टम और कईं अन्य सेवाएं बंद है तो शराब की दुकान में क्या खास है।

इस वैश्विक आपदा के समय मेरे पास अब सफाईकर्मियों, स्वास्थ्यकर्मियों, मीडियाकर्मियों, पुलिसकर्मियों और दिहाडियों और जरूरी सामान की छोटी-छोटी दुकान के दुकानदारों को दोनों हाथ जोडकर नम आंखों से धन्यवाद अर्पित करने के और घर पर चुपचाप बैठने के अलावा कोई चारा नही था।

(लेखक सामाजिक कार्यकर्ता हैं)

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