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"कोल्हू का बैल" पांव के छालों पर राजनीति का नमक

May
18 2020

अतुल समाधिया

एक बार एक तेली अपने कोल्हू के पास बैठा था । कोल्हू चल रहा था , बीच मे लकड़ी गड़ी थी , उस लकड़ी से दूसरी लकड़ी के सहारे बैल बंधा था । बैल के गले मे घण्टी बंधी थी । बैल गोल गोल चक्कर लगा रहा था । कोल्हू से तेल निकल रहा था । और तेली वही पास में पेड़ के नीचे बैठकर आराम से चिलम फूंक रहा था ।

तभी वहां से एक वकील साहब निकले जो उस तेली को पहले से जानते थे । रुके.! तेली के पास आये और अपने वकालती अंदाज में पूछे, क्यों भाई तेली तुम आराम से यहां चिलम फूंक रहे हो, अगर बैल घूमना बन्द कर दे तो तुम्हे तो पता ही नही चलेगा । तेली बोला साहब उसके गले मे घंटी बंधी है, हमे पता चल जायेगा । वकील बोला मान लो वो गर्दन ना हिलाए तो ? तेली बोला साहब वो चलेगा तो गर्दन तो हिलेगी ही । वकील बोला फिर भी मान लो वो बैठ जाये और गर्दन भी ना हिलाए तो ? तो तेली बोला सुनो वकील साहब हमाये बैल ने वकालात ना पढ़ी है । वो बैल है बैल ही रहेगा ।

आगे जो कहने जा रहा हूँ, उससे पहले एक बात साफ कर दूँ, की मैं कोई कांग्रेसी, वामपंथी, देहद्रोही, नही हूँ । भाजपाई भी नही हूँ । और ना ही मोदी विरोधी हूँ । बल्कि में भी मोदी जी का बहुत बड़ा फैन हूँ । उनके कई निर्णय, उनकी कार्यप्रणाली, उनकी ईमानदारी, निष्ठा और देश भक्ति का मैं कायल हूँ । पर ऐसा अंधभक्त नही हूँ कि उनके हगे को भी समेंटूँ ।

आज देश में कुछ ऐसे ही हालात बन रहे हैं । शहर छोड़कर अपने गांव परिवार खेत खलिहान के पास वापस लौटते मज़दूरों के तलवों पड़े छालों ने जब सरकारों की पोलें खोलना शुरू कीं तो राजनीति ने अपना असली चेहरा दिखाना शुरू कर दिया ।

जैसे ही यह प्रश्न उठा कि मज़दूर घरों को लौट रहे हैं उनकी दुर्दाश हो रही है, सरकार कुछ कर नही पा रही है ओर सरकार बदनाम हो रही है, तो IT CELL जागा उसने एक मैसेज बनाया जिसमे इन हालातों के लिए मज़दूतों को ही दोषी ठहरा दिया । औऱ व्हाट्सएप फेसबुक विश्व विद्यालय के प्रतिभावान विद्यार्थियों ने उसका प्रचार शुरू कर दिया । क्योंकि गुरु द्रोण के शिष्य तो पांडव ओर कौरव ही थे । कोई एकलव्य सीखेगा तो अंगूठा काट ही लेंगे । तो प्रचार शुरू हुआ कि....

ये शहर क्यों गए थे ?
वहां भी तो मज़दूरी ही कर रहे थे ।
गांव में भी क्या करेंगे, मज़दूरी ही तो करेंगे ।
जब मज़दूरी ही करना थी तो गांव मे ही कर लेते । शहर क्यों गए ?

अभी अगर विदेश में नोट छापने वाली मशीन तुम्हारी औलाद की नॉकरी छूट जाए तो अगली फ्लाइट से मम्मी मम्मी करता घर लौट आएगा ।

कई लोगों ने तो मज़दूरों पर अर्थशास्त्र के कठिन बाण भी छोड़ दिये, जिनके उत्तर शायद देश के सवसे महान अर्थशास्त्री डॉ. मनमोहन सिंह भी ना दे पाए, की जब इन मज़दूरों के पास 6000 रुपये रास्ते या किराए के थे तो ये जहां थे वही क्यों नही रुके क्यों घर की ओर चल दिये ?

कभी गांव में जाकर देखिए परिवार को सम्बल देने के लिए ये वैसे ही शहर भागते है जैसे आपकेे बच्चे विदेश । पर इनपर अशिक्षा का दंश लगा है । कमाने जाते है, पर बच्चे भी छह छह पैदा कर लेते हैं । बच्चों की संख्या शान से बताते हैं पर मेडिकल स्टोर पर प्रोटेक्शन मांगने में उन्हें शर्म आती है । नसबंदी का पूछो तो ऐसे शर्माते हैं जैसे कोई नवविवाहिता हो ।

इनके हालात आपकी परिवार नियोजन योजना, शिक्षा प्रणाली, आर्थिक योजनाओं, ओर खुद को विकासशील राष्ट्र कहने पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं ।

यहां भी जवाब तेली वाला ही मिलेगा साहब । ना तो इन मजदूरों ने अर्थशास्त्र पढ़ा है, ना वो आपकी तरह स्मार्ट वर्किंग का नॉलेज रखता है । उसे आपने पढ़ने ही कहाँ दिया ? पढ़ लेता तो मज़दूरी क्यों करता ?

आपने तो कह दिया, "मेरे देश वासियों आप जहां हैं वहीं रहें । में आपसे केवल 21 दिन मांग रहा हूँ । इस महामारी को भगाने में मुझे आपका साथ चाहिए ।"

आस्था और विश्वास से सराबोर मज़दूर सहित सारे देश ने आपकी बात मान ली । आपने कहा दिए जलाओ, जलाए । आपने कहा ताली बजाओ, बजाई । पर आपने लॉक डाउन 2, लोक डाउन 3 शुरू कर दिए ।

आप भूल गए कि जो जहां है वहां कब तक रह सकता है । अगर उसने 3000 कमाए हैं, ओर 3000 का कर्ज लेकर अंधकार मय भविष्य के साथ कैसे जियेगा । मकान मालिक को कैसे किराया देगा । आपने तो कह दिया मकान मालिक किराया नहीं मांगे । पर वो भी तो उस किराए पर ही निर्भर हैं । एक महीना रह भी लिए तो क्या । आगे की कहानी तो मालिक की भी तय नही है । तब क्या होगा ?

इसलिए गांव चलो । वहां मां बाप हैं , अपनी छत है । काका हैं बाबा हैं पूरा कुटुम्ब है, मिली जुली खेती है । किसी तरह गुज़रा हो ही जायेगा । सबसे बड़ी बात वहां अपनी मिट्टी पर बैठकर नमक से निवाला हलक में उतर जाएगा । कम से कम वहां कोई शहर वालों की तरह जिनका शहर हमने इन हाथों से सजाया , कोई हमे बिस्तर पर लेटे लेटे, फेसबुक और व्हाट्सएप के ज़रिए दोषी तो नही ठहरायेगा ।

पढ़े लिखे नहीं है, मज़दूर हैं । मजबूर नही हैं । समझलो बैल ही हैं । घर जाने दो साहब । रास्ते मे रोक कर पीटोगे तो पिट भी लेंगे । जैसा हाँकोगे हंक जाएंगे ।

पर सहनशक्ति की परीक्षा मत लेना । छुट्टा छोड़ोगे या छेड़ोगे तो सींग से उठाकर पटक देंगे ।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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