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टैगोर विश्वविद्यालय में विज्ञानिका के मंच पर कवियों ने की शिरकत, कविताओं में उजागर हुई विज्ञान की दुनिया

Feb
25 2020

भोपाल: 25 फरवरी/ विज्ञान प्रसार दिल्ली एवं डाॅ. सी वी रमन विज्ञान संचार केन्द्र रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में विज्ञान कवि सम्मेलन ‘विज्ञानिका’ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़़ी ने की। कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि वरिष्ठ कवि पं. सुरेश नीरव उपस्थित थे। कवि कथाकार, विज्ञान संचारक एवं रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे की विशेष उपस्थिति में यह अनूठा कार्यक्रम आयोजित हुआ।

इस अवसर पर संतोष चौबे ने कहा कि विज्ञान कविता में विज्ञान के सिद्धांत से कुछ अधिक करना पड़ेगा। इसमें मनुष्य का आना जरुरी है। उन्होंने कहा कि हमें विज्ञान और परंपरा को जोड़ना होगा। वहीं देवेन्द्र मेवाड़ी ने संबोधित करते हुए कहा कि विज्ञान को साहित्य के माध्यम से सरसता प्रदान कर आम लोगों तक पहुंचा सकते हैं।

इंदौर की तृप्ति मिश्रा ने पर्यावरण पर अपनी चिंता प्रकट करते हुए ‘प्रकृति का आवरण-पर्यावरण, स्वच्छता का व्याकरण-पर्यावरण, सूर्योदय की लालिमा-पर्यावरण, हर श्रृंगार की भिनी खुषबू-पर्यावरण’.. । राग तेलंग की कविता ‘मुझे नहीं पता मान लो किस गणितज्ञ की खोज है, मुझे यह भी नहीं पता की क्यों गणित में मान लो से शुरू की गई चीजें आखिर में सिद्ध हो जाती हैं’ को लोगों ने खूब सराहा। संतोष चौबे ने तीन कविताओं की प्रस्तुति दी। उनकी पहली कविता (आदमी और सूरज) ‘नदी ने तड़प कर कहा मत घोलो मेरी षिराओं में जहर, पेड़ ने सहम कर कहा मै सदियों से तुम्हारा दोस्त फिर मुझ पर तुम्हारी आरी क्यों’ ने सभी को सोचने पर विवष कर दिया। इसके अलावा ‘प्रार्थना’ कविता का पाठ भी किया गया। बलराम गुमास्ता ने ‘यह जो रात है शुरक्षक से कविता पढ़ी। बेटी ने पूछा कैसे होती है रात मैनें कहा धुरी पर घूमती है अपनी धरती का जो हिस्सा सूरज के सामने से घूम जाता है, वहां हो जाता है अंधेरा इस तरह सूरज के डूबने से होती है रात।

चेतन चर्चित ने ‘विज्ञान क्या है और विज्ञान की क्या आवष्यकता है उस पर कविता ‘प्रगति के बीच का धरती से फिर उद्भव नहीं होगा, सृजन के विष्व का कोई कहीं भी नभ नहीं होगा, असंभव ही लगेंगे जिंदगी में काम सारे तब बिना विज्ञान के कुछ भी यहां संभव नहीं होगा’ सुनाई। सुरेष नीरव की गजल ‘आज की तरक्की के ये रंग सुहाने हैं डूबते जहाजों पर तैरते खजाने हैं टूटती ओजोन परतें रोज आसमानों में आतिषों की बारिष है प्यास के तराने हैं कटते हुए जंगल के लापता परिंदांे को आसुओं की सूरत में दर्द गुनगुनाने हैं गलते हुए ग्लेषियर हैं सूखते मुहाने हैं’।

ग्वालियर से आये सुनील जैन ने विज्ञान गीत सुनाए। उनका गीत ‘मन के आंगन में उठती जिज्ञासा को पहचानें हम, आओं अपनी रुचि प्रकृति को जानें हम’। विज्ञान प्रसार से आए हुए मान्यवर्धन कंठ ने विज्ञानिका के संबंध में जानकारी देते हुए कविता पाठ किया। ‘ये है विज्ञानिका, है ये विज्ञानिका, वैज्ञानिक दृदृष्टि निर्माणिका, है ये विज्ञानिका’। देवन्द्र मेंवाड़ी ने विज्ञान गीतों की सुमधुर प्रस्तुति दी। उनके गीत ‘आसमान में लाखों तारे टिमटिमाते तारे कितने सारे टिमटिमाते तारे, तारे कितने सारे उन तारों में एक हमारा सबसे प्यारा तारा जीवनदाता है कहलाता तारा सबसे न्यारा..। संतोष कौषिक ने ‘इनसे ही उपजा है जीवन अमर रहें ये नाम, पानी धरती और हवा को बारम्बार प्रणाम........ सुनें ध्यान से सुनें ध्यान से सब जीवों का किस्सा, आखिर ये भी तो हैं भाई इस कुदरत का हिस्सा, इनकी भी तो इस धरती पर ब-सजय़े खूब आबादी, पंछी को हो आसमान में उड़ने की आजादी, धरती से जो भी जन्मा है धरती की सन्तान, पानी धरती और
हवा को बारम्बार प्रणाम’ सुनाई। मधु मिश्रा, सारिका घारु, दिव्या गुप्ता और डाॅ. केदार गुप्ता ने भी अपनी कविताएं सुनाई।

इस मौके पर ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ के नए अंक का विमोचन किया गया। वहीं विज्ञान नाटक ‘गैलीलियो’ को वृत्त चित्र के माध्यम से दर्षकों को दिखाया गया। कवि सम्मेलन में पर्यावरण, जल संरक्षण, विज्ञान दर्षन, विज्ञान के सिद्धांतों आदि वि-ुनवजयायों पर कविताएं, गजलें और गीत प्रस्तुत किये गए। इस अवसर पर बडी संख्या में दर्षक उपस्थित थे। इस कार्यक्रम के संयोजक आईक्यूएसी रबीन्द्रनाथ टैगोर विष्वविद्यालय के निदेषक श्री नितिन वत्स रहे।

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