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अदालत से बाहर के बयान से गवाह की विश्वसनीयता नहीं मापी जा सकती

Dec
14 2019

नई दिल्ली, 14 दिसम्बर (आईएएनएस)। निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले के संबंध में एक आवेदन पर सुनवाई करते हुए दिल्ली की एक अदालत ने कहा कि किसी गवाह की विश्वसनीयता का पता उसके द्वारा अदालत के बाहर कही गई बात से नहीं लगाया जा सकता है।

अधिवक्ता ए. पी. सिंह द्वारा दायर अर्जी पर सुनवाई करते हुए मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट सुधीर कुमार सिरोही ने कहा, गवाह हलफनामे के तहत बयान दर्ज कराते हैं। जो वे अदालत के बाहर कहते हैं, उसके आधार पर एक गवाह के रूप में उनकी विश्वसनीयता पर सवाल नहीं उठा सकते हैं।

अधिवक्ता सिंह 2012 में निर्भया सामूहिक दुष्कर्म और हत्या मामले में मौत की सजा पाए चार में से एक अपराधी के पिता की ओर से घटनाक्रम के एकमात्र गवाह के खिलाफ एफआईआर की मांग कर रहे थे।

इस मामले में अगली सुनवाई 20 दिसंबर को होगी। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि एकमात्र गवाह ने पैसे लेकर विभिन्न समाचार चैनलों को साक्षात्कार दिए हैं। उन्होंने यह दावा किया कि मीडिया ट्रायल के परिणामस्वरूप मामले को प्रभावित किया गया है।

एकमात्र चश्मदीद गवाह 23 वर्षीय पीड़िता का दोस्त है, जो उस घटनाक्रम के समय बस में उसके साथ था। इस दौरान उसे भी चोटें आई थीं।

पवन कुमार गुप्ता के पिता हीरा लाल गुप्ता द्वारा दायर की गई शिकायत में कुछ हालिया मीडिया रिपोटरें का हवाला दिया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि गवाह ने विभिन्न समाचार चैनलों पर साक्षात्कार के लिए पैसे लिए थे।

शिकायत में कहा गया है कि एकमात्र गवाह होने के नाते उसकी गवाही ने मामले के परिणाम को ²ढ़ता से प्रभावित किया है, जिसके कारण अभियुक्तों को मौत की सजा दी गई है।

मीडिया रिपोटरें का हवाला देते हुए अधिवक्ता सिंह ने कहा कि उक्त तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर यह स्पष्ट है कि उसकी गवाही झूठी और मनगढ़ंत थी।

एक 23 वर्षीय युवती का 16 दिसंबर, 2012 को वीभत्स तरीके से दुष्कर्म किया गया और उसके साथ काफी अत्याचार भी किया, जिससे उसकी मौत हो गई। सभी छह आरोपियों को गिरफ्तार कर यौन उत्पीड़न और हत्या का मामला दर्ज किया गया। आरोपियों में से एक नाबालिग था, जिसे जुवेनाइल अदालत में पेश किया गया था। इसके अलावा एक अन्य आरोपी ने तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी।

सितंबर 2013 में ट्रायल कोर्ट द्वारा चारों दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई थी और मार्च 2014 में दिल्ली हाईकोर्ट ने, मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इस सजा को बरकरार रखा।

--आईएएनएस

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