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अफगान शांतिवार्ता में रोड़ा बन रही अफगानिस्तान में व्याप्त हिंसा

Sep
16 2020

नई दिल्ली, 16 सितम्बर (आईएएनएस)। दोहा, कतर में बहुप्रतीक्षित अंतर-अफगान वार्ता से पहले अफगानिस्तान में व्यापक तौर पर हिंसा देखने को मिली है। वार्ता शुरू होने के कुछ दिन पहले ही अफगानिस्तान के पहले उपराष्ट्रपति अमरुल्ला सालेह को काबुल में बम विस्फोट के साथ निशाना बनाया गया, जिसमें दस नागरिकों की मौत हो गई। वार्ता के दौरान ही देश के 34 प्रांतों में से 18 पर हमले हुए और हिंसा हुई है।

दूसरी ओर, असंभव प्रतीत होने वाली वार्ता को संभव बनाने और एक अनुकूल माहौल बनाने के लिए अफगान सरकार ने कुछ कट्टर आतंकवादियों सहित 5,000 कैदियों को न चाहते हुए भी छोड़ना पड़ा है। वहीं तालिबान ने भी 1,000 सैनिकों को रिहा कर दिया है, जिन्हें उसने पकड़ लिया था।

अफगान सरकार और तालिबान के बीच 12 सितंबर को अंतर-अफगान वार्ता शुरू हुई। संयोग से यह वार्ता अमेरिका में 11 सितंबर को हुए हमले की 19वीं वर्षगांठ के एक दिन बाद शुरू हुई। यह अमेरिकी कूटनीति का ही परिणाम है, जिसने दोनों पक्षों को वार्ता की मेज पर लाने के लिए मजबूर कर दिया। 29 फरवरी को दोहा में ऐतिहासिक अमेरिका-तालिबान समझौते के दस दिनों के भीतर इसके सिरे चढ़ जाने की संभावना थी, मगर दोनों पक्षों द्वारा उठाए गए कुछ मुद्दों के कारण वार्ता में देरी हुई। दरअसल कई मुद्दों पर दोनों पक्ष एक दूसरे के साथ बात नहीं करना चाहते थे।

विशेष रूप से राष्ट्रपति अशरफ गनी के नेतृत्व वाली अफगान सरकार इस तथ्य से भी नाखुश है कि अमेरिकी और नाटो सैनिक युद्ध-ग्रस्त देश से वापस जा रहे हैं। गनी ने बताया कि तालिबान ने अफगान सुरक्षा बलों पर हमलों को नहीं रोककर अमेरिका-तालिबान समझौते के प्रावधानों का लगातार उल्लंघन किया है।

हालांकि, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस बात पर स्पष्ट हैं कि वह अपने सैनिकों को अफगान के युद्ध के मैदान से हटा रहे हैं और दोनों पक्षों में एक समाधान का पता लगाने के लिए बातचीत करना चाहते हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ऐसा लगता है कि अफगान सरकार को छोड़कर बाकी सभी उत्सुक हैं कि अमेरिकी सेना बाहर निकल रही है। तालिबान भी इससे खुश है, क्योंकि उसे भी सत्ता के दरवाजे खुलते नजर आ रहे हैं। पाकिस्तान संतुष्ट है कि अमेरिका वापस हट रहा है, क्योंकि वह अफगानिस्तान में एक प्रॉक्सी सरकार चाहता है। असंख्य आतंकवादी समूह इससे खुश हैं। ट्रंप भी उत्सुक हैं कि अमेरिकियों का अफगानिस्तान में कोई खास वास्ता नहीं है और उन्हें इसे अपने बीच ही हल करना चाहिए। अफगानिस्तान में सुलह कराने के लिए अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जल्माय खलीलजाद के माध्यम से वह सैनिकों को वापस लाने के लिए अमेरिकी मतदाताओं से किए गए अपने वादे को पूरा करने के लिए उत्सुक हैं।

फिलहाल 12 सितंबर की वार्ता 21-सदस्यीय वार्ता टीमों के बीच तालिबान के प्रमुख वार्ताकार मौलवी शेख अब्दुल हकीम और अफगान सरकार के लिए एक पूर्व खुफिया प्रमुख मासूम स्टेनकेजई द्वारा अंजाम दी गई है।

नेशनल काउंसिल फॉर नेशनल रिकंसिलिएशन के प्रमुख अब्दुल्ला अब्दुल्ला और चार महिलाएं भी अफगान सरकार की ओर से बातचीत में शामिल हैं।

अमेरिका-तालिबान समझौते के आधार पर, वार्ता केवल दो चीजों पर केंद्रित है-एक व्यापक युद्ध विराम और एक शक्ति-साझाकरण व्यवस्था। दोनों ही जटिल हैं। 29 फरवरी से अब तक तालिबान ने अपने हमलों को वापस लेने के लिए झुकाव नहीं दिखाया है। बिल्कुल इसके विपरीत इसने दोनों सरकारी बलों के साथ-साथ नागरिकों पर भी हमले बढ़ा दिए हैं। तालिबान और सरकार के बीच शक्ति-साझेदारी के बारे में तालिबान ने स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट नहीं किया है कि वह दोनों प्रावधानों के तहत क्या चाहता है।

(ये कटेंट इंडिया नैरेटिव डॉट कॉम के साथ साझेदारी के तहत लिया गया है।)

--आईएएनएस

एकेके/एएनएम

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