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मप्र में भाजपा के लिए सर्वमान्य चेहरे का चयन बड़ी चुनौती

Mar
22 2020

भोपाल, 22 मार्च (आईएएनएस)। मध्यप्रदेश में कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने के बाद यह तय है कि अगली सरकार भाजपा की बनने जा रही है, मगर दल का नेता अर्थात मुख्यमंत्री कौन होगा, यह बड़ा सवाल है क्योंकि पार्टी में कई दावेदार हैं। हालत, एक अनार सौ बीमार जैसी है।

राज्य में बाहरी समर्थन से चल रही कमलनाथ सरकार को आखिरकार 20 मार्च को इस्तीफा देना ही पड़ गया क्योंकि कांग्रेस के 22 विधायकों ने बगावत कर दी थी और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा भी दे दिया था, क्योंकि इन इस्तीफों को विधानसभा अध्यक्ष द्वारा मंजूर कर लिए जाने से सरकार अल्पमत में आ गई थी। अब भाजपा की सरकार बनना तय है, क्योंकि वर्तमान में भाजपा के पास सदन में उपलब्ध सदस्यों की संख्या के मुकाबले बहुमत है।

कमलनाथ सरकार को इस्तीफा दिए तीसरा दिन गुजर गए, मगर भाजपा के विधायक दल की न तो बैठक हो पाई है और न ही पार्टी राज्यपाल के सामने अपना दावा पेश कर पा रही है। इसकी वजह कोरोनावायरस को बताया जा रहा है। पार्टी ने सोमवार को विधायक दल की बैठक बुलाई है मगर यह बैठक हो पाएगी इस पर संशय बना हुआ है क्योंकि कोरोना वायरस का खतरा लगातार बढ़ रहा है और भोपाल में लॉकडाउन घोषित कर दिया गया है जो 24 मार्च तक लागू रहेगा।

भाजपा के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती एक सर्वमान्य नेता के चयन की है, क्योंकि कई दावेदार हैं। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहे हैं और वर्तमान में भाजपा के विधायकों में सबसे ज्यादा विधायक उन्हीं के समर्थन में हैं, मगर भाजपा के कुछ नेता चौहान की जगह किसी और को कमान सौंपने की पैरवी कर रहे हैं, इनमें केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद पटेल, थावरचंद गहलोत के अलावा राकेश सिंह, दलित नेता डा. वीरेंद्र सिंह, सत्यनारायण जटिया के नाम भी सामने आ रहे हैं।

भाजपा के सूत्रों की माने तो तोमर एक बड़े दावेदार हैं मगर उनके लिए यह आसान नहीं है, ऐसा इसलिए क्योंकि ज्योतिरादित्य सिंधिया जो अभी हाल ही में भाजपा में आए हैं ग्वालियर-चंबल क्षेत्र से आते हैं, जहां से सांसद नरेंद्र सिंह तोमर हैं। वहीं भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा भी चंबल के निवासी हैं। यह बात अलग है कि वह खजुराहो से सांसद हैं। इसके अलावा तीन राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल से भाजपा के मुख्यमंत्री राजपूत वर्ग से हैं और चौहान भी इसी वर्ग से आते हैं।

वहीं भाजपा के अंदर दलित और पिछड़े की राजनीति को महत्व दिया जा रहा है। इसके चलते डा. वीरेंद्र कुमार का बड़ा दावा बनता है मगर उनके सामने भी समस्या बुंदेलखंड की है, जहां से प्रदेश अध्यक्ष शर्मा सांसद हैं, यही समस्या प्रहलाद पटेल के सामने हैं। इन स्थितियों में मालवा-निमाड़ अंचल से आने वाले थावरचंद गहलोत और सत्यनारायण जटिया का दावा मजबूत हो रहा है मगर इन दोनों नेताओं का राजनीतिक प्रभाव पूरे प्रदेश में नहीं है।

राजनीतिक विश्लेषक अरविंद मिश्रा का कहना है कि यह बात सही है कि भाजपा के पास मुख्यमंत्री पद के एक नहीं कई दावेदार हैं और यही स्थिति भाजपा के लिए मुसीबत का कारण बन रही है। राज्य में 25 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है और यह चुनाव सरकार के भविष्य को तय करने वाले होंगे। इसलिए भाजपा किसी तरह का जोखिम नहीं लेगी, वह ऐसे चेहरे को सामने लाएगी, जिसका विरोध कम से कम हो और प्रदेश की जनता के बीच उसकी पकड़ भी हो, साथ ही ज्योतिरादित्य सिंधिया की सहमति भी उसके साथ हो।

राज्य की वर्तमान स्थिति पर गौर करें तो एक बात साफ हो जाती है कि 230 सदस्यों वाली विधानसभा में 25 स्थान रिक्त हैं। वर्तमान में 205 विधायक हैं, जिसमें भाजपा के 106 विधायक हैं। सपा का एक, बसपा दो और चार निर्दलीय हैं। इस तरह वर्तमान में भाजपा को बहुमत हासिल है। इस तरह 25 स्थानों पर आगामी समय में होने वाले उपचुनाव सरकार के भविष्य के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे।

--आईएएनएस

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