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मोदी सरकार ने 351 योजनाओं में डीबीटी से कैसे बचाए 1.70 लाख करोड़ रुपये? (स्पेशल)

Oct
30 2020

नई दिल्ली, 30 अक्टूबर(आईएएनएस)। जनधन खाते, आधार और मोबाइल नंबर के जरिए सीधे लाभार्थियों तक पैसे भेजने की व्यवस्था से बिचौलियों के हाथों में 1 लाख 70 हजार करोड़ से ज्यादा की धनराशि जाने से बच गई। मोदी सरकार की ओर से 51 मंत्रालयों की 351 योजनाओं में लागू हुई डायरेक्ट बेनिफेट ट्रांसफर(डीबीटी) स्कीम से यह संभव हुआ। जैम ट्रिनिटी यानी जनधन-आधार-मोबाइल से डीबीटी को धरातल पर उतारे जाने से योजनाओं में फर्जी लाभार्थियों की पहचान आसान हुई। जिससे सरकारी योजनाओं में सेंधमारी(लीकेज) रोककर योजनाओं के असली हकदार तक लाभ पहुंचाने में सफलता मिली है। पिछले छह वर्षो में डीबीटी के तहत अब तक 12,95,468 करोड़ रुपये लाभार्थियों के खाते में जा चुके हैं। वर्ष 2020-21 में मनरेगा, पीडीएस, प्रधानमंत्री आवास योजना, सामाजिक सहायता आदि योजनाओं के लाभार्थियों के खाते में सीधे 2,10,244 करोड़ रुपये भेजे गए।

मिसाल के तौर पर मनरेगा में जब से मजदूरों के जॉब कार्ड और खातों को आधार से जोड़ा गया तो भारी संख्या में फर्जी लाभार्थी पकड़ में आए। दिसंबर 2019 तक 5.55 लाख फर्जी मजदूरों का मामला पकड़ में आने पर उन्हें योजना से हटाया गया। जिससे 24,162 करोड़ रुपये का दुरुपयोग नहीं हो सका। नहीं तो यह धनराशि फर्जी मजदूरों के खाते में पहुंचती रहती। इसी तरह डीबीटी स्कीम के कारण महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से जुड़ीं योजनाओं में 98.8 लाख फर्जी लाभार्थियों का खुलासा हुआ। फर्जी लाभार्थियों के नाम हटाए जाने से 1,523.75 करोड़ रुपये का फर्जीवाड़ा नहीं हो सका।

आधार, मोबाइल लिंक की अनिवार्यता से सरकारी राशन वितरण में 66 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा की धनराशि को सरकार गलत हाथों में जाने से रोक सकी। खाद्य और सार्वजनिक वितरण व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों के मुताबिक, तकनीक की मदद से कुल 2.98 करोड़ फर्जी लाभार्थियों को सिस्टम से हटाने के कारण कुल 66,896.87 करोड़ रुपये का दुरुपयोग रुका। डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, सरकार के 51 मंत्रालयों ने 31 दिसंबर 2019 तक कुल 1,70,377.11 करोड़ रुपये गलत हाथों में जाने से रोका।

केंद्र सरकार में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम पर बारीक नजर रखने वाले एक अधिकारी ने आईएएनएस से कहा, जैम ट्रिनिटी (जन धन- आधार- मोबाइल) ने बिचौलियों के मकड़जाल को खत्म कर दिया है। तकनीक के माध्यम से भ्रष्टाचार रोकने का यह एक सफल उदाहरण है। मनरेगा में उसे ही पैसा मिल रहा है, जो सचमुच में फावड़ा लेकर खुदाई कर रहा है। पहले आधार लिंक न होने का फायदा उठाते हुए फर्जी मजदूरों के नाम पर धनराशि निकलती थी। इसी तरह पीडीएस सिस्टम से लेकर फर्टिलाइजर्स, पेट्रोलियम मिनिस्ट्री से जुड़ीं तमाम योजनाओं में सरकारी धनराशि का दुरुपयोग रुका है, जिनमें भारी सब्सिडी जाती है।

डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर, दरअसल, एलपीजी गैस सब्सिडी, मनरेगा भुगतान, वृद्धावस्था पेंशन, छात्रवृत्ति जैसी तमाम सामाजिक सहायता की योजनाओं के लाभार्थियों के खाते में सीधे पैसे ट्रांसफर करने की योजना है। यूं तो डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर(डीबीटी) स्कीम, एक जनवरी 2013 से शुरू हुई। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में पूरे देश में मिशन मोड में इसे लागू करने पर जोर दिया। पहले चरण में 43 जिलों में डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर स्कीम शुरू हुई, फिर 78 जिलों को जोड़ा गया। फर्जी लाभार्थियों की पहचान से सरकारी पैसे के दुरुपयोग पर अंकुश लगने की दिशा में नतीजे अच्छे मिले तो 12 दिसंबर 2014 को पूरे देश में इस योजना को लागू कर दिया गया। मोदी सरकार ने मनरेगा में डीबीटी स्कीम लागू की।

इलेक्ट्रानिक पेमेंट फ्रेमवर्क के जरिए उन सभी योजनाओं में सीधे लाभार्थियों के खाते में पैसा जाने लगा, जिसमें नकद भुगतान की व्यवस्था रही। देश में 38 करोड़ से अधिक जनधन खाते, सौ करोड़ आधार, सौ करोड़ मोबाइल से डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर को धरातल पर उतारने में आसानी मिली है।

--आईएएनएस

एनएनएम/आरएचए

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