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अनुच्छेद 370 : 2 महीने बीत गए, सुप्रीम कोर्ट ने नहीं किया कोई हस्तक्षेप

Oct
05 2019

अमिया कुमार कुशवाहा

जम्मू एवं कश्मीर से अनुच्छेद 370 को रद्द किए करीब दो महीने बीत चुके हैं, लेकिन इस मामले में केंद्र सरकार के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने अबतक कोई हस्तक्षेप नहीं किया है। मालूम हो कि अनुच्छेद 370 को रद्द किए जाने के विरोध में कई लोगों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की थी।

सरकार के फैसले की संवैधानिक वैधता का मुद्दा अब न्यायमूर्ति एन.वी. रमना की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष है। मामले पर सुनवाई के लिए इस पीठ का गठन एक अक्टूबर को किया गया था।

दायर की गईं करीब 12 अलग-अलग याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में 14 नवंबर को सुनवाई होगी। इसके साथ ही केंद्र और जम्मू एवं कश्मीर को सुप्रीम कोर्ट में अपनी-अपनी प्रतिक्रियाएं दाखिल करनी होगी और राज्य से विशेष दर्जा हटाए जाने के फैसले से संबंधित सभी कागजात सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखने होंगे।

सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू एवं कश्मीर में विशेष राज्य का दर्जा बनाए रखने की याचिकाकर्ताओं के अनुरोध को ठुकरा दिया है। इससे जम्मू एवं कश्मीर को 31 अक्टूबर को दो अलग-अलग केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित करने के नए कानून का रास्ता साफ हो गया है। हालांकि केंद्र द्वारा राज्य को विभाजित करने का फैसला बना रहेगा या नहीं, यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर आधारित होगा।

हालांकि स्थिति की गंभीरता को देखते हुए, शीर्ष अदालत ने दलीलों की जांच करने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाई है। इस मामले पर सबसे पहली याचिका छह अगस्त को दायर की गई थी।

केंद्र सरकार द्वारा जम्मू एवं कश्मीर से पांच अगस्त को विशेष राज्य का दर्जा रद्द किए जाने के ठीक एक दिन बाद ही अधिवक्ता एम.एल. शर्मा ने इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

हालांकि उनकी याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने दोषपूर्ण करार दिया था।

कुछ दिनों बाद ही नेशनल कान्फ्रेंस के नेता मोहम्मद अकबर लोन ने भी स्वराज का जिक्र करते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और कहा कि एक संघीय ढांचे के अंतर्गत स्वायत्तशासित स्वशासन का अधिकार महत्वपूर्ण मौलिक अधिकार है।

उन्होंने कहा कि जम्मू एवं कश्मीर की पूर्व रियासत द्वारा अनुच्छेद 370 को राज्य में शांति बहाल करने और लोकतांत्रिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए बड़े पैमाने पर विचार करने के बाद लागू किया गया था, जो जम्मू एवं कश्मीर के भारत संघ के साथ संबंधों को परिभाषित और नियंत्रित करता है।

इनके बाद कई अन्य लोगों ने भी इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाएं दायर की थी। इनमें आईएएस अधिकारी से राजनेता बने शाह फैजल, सज्जाद लोन के नेतृत्व वाले पीपल्स कान्फ्रेंस, माकपा नेता मोहम्मद यूसुफ तारिगामी, कश्मीरी कलाकार इंदर सलीम उर्फ इंदरजी टिक्कू, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों और ब्यूरोक्रेट्स सहित कई अन्य लोग शामिल हैं और उन्होंने राष्ट्रपति के आदेशों को चुनौती दी, जिसने सुप्रीम कोर्ट का ध्यान अपनी ओर खींचा।

प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई ने 28 सितंबर को न्यायमूर्ति एन. वी. रमना, न्यायमूर्ति एस. के. कौल, न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई और न्यायमूर्ति सूर्यकांत को लेकर पांच सदस्यीय संविधान पीठ का गठन किया था, जो इस मामले पर सुनवाई करेगी।

संविधान पीठ के अलावा अन्य कुछ याचिकाओं की सुनवाई के लिए तीन सदस्यीय पीठ भी गठित की गई है। इन याचिकाओं में जम्मू एवं कश्मीर में लॉकडाउन और अन्य बंदिशों में राहत की मांग की गई है।

हालांकि केंद्र और जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने कहा कि घाटी में लगे प्रतिबंधों को एक के बाद एक कर के हटाया जा रहा है, ताकि घाटी में हिंसा जैसी घटनाओं को टाला जा सके।

न्यायमूर्ति एन. वी. रमना, न्यायमूर्ति बी. आर गवई और न्यायमूर्ति आर. सुभाष रेड्डी की तीन सदस्यीय पीठ 16 अक्टूबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी।

माकपा के नेता सीताराम येचुरी ने अपनी पार्टी के नेता मोहम्मद युसुफ तारिगामी की नजरबंदी को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। वहीं एक मलेशियाई एनआरआई व्यवसायी की पत्नी आसिफा मुबीन ने अपने पति की नजरबंदी को कोर्ट में चुनौती दी है।

इसके अलावा कोर्ट कांग्रेसी नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की एक्जीक्यूटिव संपादक अनुराधा भसीन की याचिका पर भी सुनवाई कर रही है। वहीं बाल अधिकार कार्यकर्ता एनाक्षी गांगुली ने घाटी में बच्चों की हिरासत को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

जम्मू एवं कश्मीर प्रशासन ने प्रतिबंधों में ढील दिए जाने की याचिकाओं पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में दायर अपने एक हलफनामे में कहा है कि घाटी में लागू प्रतिबंधों में ढील बरती गई है। 100 प्रतिशत लैंडलाइन सेवा को बहाल कर दिया गया है, जबकि सीआरपीसी की धारा 144 को भी हटा लिया गया है।

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