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वनमाली कथा सम्मान समारोह में रचनापाठ और देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में नाटक “सतह पर तैरती उदासी” का हुआ मंचन

Apr
17 2022

भोपाल : 17 अप्रैल/ राष्ट्रीय वनमाली कथा सम्मान समारोह के अंतर्गत तीसरे दिन की सुबह वनमाली कथा सम्मान से सम्मानित रचनाकारों का कहानी पाठ आयोजित किया गया। सर्वप्रथम वरिष्ठ कहानीकार एवं आलोचक धनंजय वर्मा ने “आलोचक की दर्द भरी कहानी” का पाठ किया। युवा कथाकार मनोज पांडे ने अपनी कहानी “जेब कतरे का बयान” का पाठ किया। वरिष्ठ विज्ञान कथाकार  श्री देवेंद्र मेवाड़ी ने विज्ञान कथा का पाठ किया एवं विज्ञान कथा लेखन की प्रक्रिया पर प्रकाश डाला ।

वरिष्ठ कथाकार हरि भटनागर ने अपनी चर्चित कहानी “भय” का पाठ किया। लंदन से आई वरिष्ठ साहित्यकार दिव्या माथुर की घरेलू हिंसा पर केंद्रित कहानी का पाठ प्रशांत सोनी द्वारा किया गया। युवा कथाकार उपासना ने इस अवसर पर शहरी चकाचौंध में गुम होती जिंदगी को मार्मिक रूप से रेखांकित करती कहानी का पाठ किया। इस अवसर पर कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए ममता कालिया ने कहा कि विश्व रंग एवं वनमाली सृजन पीठ ने भोपाल को कथामय बना दिया है। यह पल कितने अविस्मरणीय है कि कथाकार कथा सुना रहे हैं और सुनने वालों में भी अधिकांश रचनाकार यहां पर मौजूद है। कहानी हमेशा जिंदा रहेगी वह कभी खत्म नहीं हो सकती है। इस सत्र का सफल संचालन वनमाली के संपादक कुणाल सिंह ने किया। आभार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रेखा कस्तवार ने किया।

शाम के सत्र की शुरुआत रवीन्द्र भवन सभागार में हुई। इसमें मुख्य अतिथि पूर्व अपर मुख्य सचिव मप्र शासन मनोज श्रीवास्तव और अध्यक्षता रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति संतोष चौबे ने की। इसके अलावा बीज वक्तव्य मुकेश वर्मा का रहा। इस दौरान आईसेक्ट पब्लिकेशन के तहत प्रकाशित धनंजय वर्मा की पुस्तक “यूं होता तो क्या होता”, “शशांक जी की “सपने सोने नहीं देते”, पुस्तक डॉ. रेखा कस्तवार की कहानियों का संकलन, विनय उपाध्याय की “सफह पर आवाज”, सुधीर सक्सेना की “सलाम लुई पाश्चर”, डॉ. जयजयराम आनंद की “अचरज अचरज आनंद”, अशोक कुमार धमेनिया की “ऋषि रेणु”, राजेंद्र शर्मा की “ऋण अभी शेष है”, गोकुल सोनी की “वो तीस घंटे” और आरएस खरे की “तिमोथी” का विमोचन किया गया। इसके अलावा प्रभू जोशी, मुकेश वर्मा, ममता कालिया, शशांक, मनीषा कुलश्रेष्ठ, तरूण भटनागर, मनोज कुमार पांडेय, सत्यप्रकाश, कैलाश बनवासी और मनोज रूपड़ा जैसे प्रतिष्ठित लेखकों की दस-दस कहानियों की संकलित पुस्तकों को विमोचन किया गया। साथ ही “कथा भोपाल” का लोकार्पण भी किया गया। रचना पाठ की शुरुआत सुधीर सक्सेना ने अपनी कहानी “सलाम लुई पाश्चर” से की।

इसके बाद ज्ञान चतुर्वेदी, उर्मिला शिरीष, गोकुल सोनी और साधना बलवटे द्वारा साहित्य के पहलुओं पर बात करते हुए “स्थानिक्ता का विश्वरंग” विषय पर वक्तव्य दिया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि संतोष चौबे ने कथा का स्वर्ग रच दिया है। साहित्य के क्षेत्र में उनका योगदान इस स्तर का है कि उन्हें साहित्य का संरक्षक या साहित्य का इंवेस्टर का पुरस्कार प्रदान किया जा सकता है। साथ ही उन्होंने कहा कि साहित्य में भोपाल पर ऐसा कार्य किया जाना चाहिए जिसमें भोपाल एक पात्र की भूमिका में आए और हमेशा के लिए अमर किया जा सके।  वहीं अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि हिंदी भाषा की समृद्धता की और विदेशी और स्थनीय भाषाओं में आदान प्रदान को बढ़ावा देने पर जोर दिया। आगे उन्होंने कहा कि टेक्नोलॉजी ने हिंदी का वैश्वीकरण बढ़ा दिया है। इसके अलावा बाल साहित्य पर काम किए जाने पर बल दिया।

वनमाली कथा सम्मान समारोह के अंतर्गत अंतिम दिन देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में संतोष चौबे द्वारा लिखित नाटक “सतह पर तैरती उदासी” का मंचन किया गया. 

सतह पर तैरती उदासी एक ऐसे रिश्तो की कहानी है, जो कभी कहीं नहीं पहुंचना ही ऐसे रिश्तों की नियति होती है। नाटक में 3 लोगों की कहानी को दर्शाया गया है जिसमें एक पत्नी और उसका पति है। इसके अलावा पत्नी की एक दोस्त भी है। कहानी में पति और पत्नी में एक अच्छा रिश्ता देखने को मिलता है। परंतु इसके साथ ही पति को उसकी पत्नी की दोस्त से भी प्रेम हो जाता है। कहानी फिर इसके ईर्द गिर्द ही घूमती है। नाटक की पृष्ठभूमि झारखंड में राजनगर नाम के शहर पर तैयार की गई है। दूसरी लड़की को प्रेम है पर उसके जीवन में उदासी है क्योंकि वह उसे कभी नहीं मिलेगा। उसका एक प्रेमी था जो एक कारखाने में काम करता था। एक लड़ाई के दौरान उसकी गोली मारकर हत्या कर दी जाती है। उसे कहीं भी प्यार मिलने की उम्मीद नहीं है। इस पर केस चलता रहता है और कारखाना भी बंद हो जाता है। नाटक में एक ओर मरता हुआ कारखान है और दूसरी ओर चलता हुआ जीवन दर्शाया गया है।

दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त देवेन्द्र राज अंकुर देशभर में अनेक व्यावसायिक व शौकिया मंडलियों के साथ नाटकों का निर्देशन कर चुके हैं। संभव ग्रुप के संस्थापक सदस्य और कहानी का रंगमंच के प्रणेता श्री अंकुर अध्यापक, कैम्प निर्देशक और नाट्य निर्देशक की हैसियत से देशभर में कार्यशालाओं में भागीदारी करते रहे हैं और देश के कई शहरों में अपनी प्रस्तुतियों का मंचन कर चुके हैं। कई नाटकों का अंग्रेजी व अन्य भाषाओं से अनुवाद तथा पत्र- पत्रिकाओं में नियमित रूप् से रंगमंच विषयक लेखन। रंग आलोचना में आपकी तेरह से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। आप राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक रहे हैं। रंगमंच के क्षत्र में विशेष योगदान के लिए आपको संगीत नाटक अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

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