वनमाली कथा सम्मान समारोह : नया यथार्थ, नया स्वप्न एवं नई प्रस्तुति से मिलकर बनती है नई कहानी : राकेश बिहारी

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भोपाल : 27 फरवरी/ सुप्रतिष्ठित कथाकार, शिक्षाविद् तथा विचारक स्व. जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ के रचनात्मक योगदान और स्मृति को समर्पित संस्थान वनमाली सृजन पीठ, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं आईसेक्ट पब्लिकेशन के द्वारा आयोजित किए जा रहे तीन दिवसीय राष्ट्रीय वनमाली कथा सम्मान समारोह का दूसरा दिन साहित्यिक गतिविधियों के नाम रहा। इसके तहत दिन की शुरुआत वनमाली सम्मान से सम्मानित रचनाकारों के रचनापाठ से हुई। यह सत्र दो हिस्सों में आयोजित किया गया। इसके पहले हिस्से की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार और विश्वरंग के निदेशक संतोष चौबे ने की। इसमें लेखक आशुतोष ने अपनी कहानी ‘पिता का नाच’ का पाठ किया। उन्होंने इसमें एक नंदू के किरदार के प्रेरक प्रसंग को प्रस्तुत किया। इसके बाद अनिल यादव ने ‘इमामदस्ता’ कहानी का पाठ करते हुए मीशम नाम के बच्चे की कहानी सुनाई। वहीं, ‘तद्भव’ पत्रिका के अखिलेश जी ने इसकी संपादकीय का पाठ करते हुए आज के युग और स्मार्ट गैजेट और स्मार्ट तकनीक की बात कही और बताया किस प्रकार आज युवा अपने दिन के 8-9 घंटे स्मार्ट फोन पर बिता रहे हैं। इस दौरान प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा ने अपनी बात रखते हुए प्रवासी साहित्यकारों को आ रही चुनौतियों से अवगत कराया। संतोष चौबे ने अपने वक्तव्य में साहित्यकारों के रचनापाठ की सराहना करते हुए कहानी की आत्मा के विषय पर बात की। उन्होंने कहा कि कहानी की आत्मा उस प्रभाव में है जो पाठक के सुनने के बाद पाठक के मन में जो भाव पैदा करे और कुछ प्रभाव डाले। इसके बाद रचनापाठ के दूसरे हिस्से की शुरुआत लेखक अरविंद मिश्र से हुई। उन्होंने वनमाली कथा सम्मान के तहत विज्ञान कथाओं को सम्मानित किए जाने की पहल की सराहना की और अपनी कहानी ‘अंतिम इच्छा’ का पाठ किया। इसमें उन्होंने प्रो. माधवन की कहानी को वर्णन किया जिन्हें क्रायोजेनिक कैप्सूल के जरिए भविष्य में पहुंचाया गया था। अगली कड़ी में लेखक प्रत्यक्षा ने अपनी कहानी ‘जिस दिन नागिन झील का पानी जल गया’ का पाठ किया। अध्यक्षीय उद्बोधन साहित्यकार शिवमूर्ति ने देते हुए अरविंद मिश्र की विज्ञान कथा की प्रशंसा की और प्रत्यक्षा जी के गद्य के बारे में बात करते हुए उनके सुनाने के अंदाज की सराहना की। इसके अलावा उन्होंने अपने आने वाले उपन्यास से तीन कहानियों का पाठ किया।

कार्यक्रम के अगले सत्र में “नयी सदी की नयी कहानी” विषय पर बात करते हुए वरिष्ठ रचनाकारों द्वारा पिछले दो दशकों की कहानियों का मूल्यांकन किया गया। इस सत्र का आयोजन भी दो हिस्सों में हुआ जिसमें पहले सत्र में लेखक राकेश बिहारी और रश्मि रावत के वक्तव्य हुए। इसके अलावा अध्यक्षता मुकेश वर्मा ने की। अपने वक्तव्य में राकेश बिहारी ने नई कहानी के बनने के बारे में बात की जिसमें उन्होंने नया यथार्थ, नया स्वप्न एवं नई प्रस्तुति से मिलकर नई कहानी बनती है। वहीं, रश्मि रावत ने अपने उद्बोधन में रचनात्मक शून्यता पर बात की। उन्होंने कुछ कहानियों का सार लेते हुए बताया कि वैमनस्यता से प्रतिकार की कहानी ही देश प्रेम है। इसी तरह उन्होंने बाजारवाद, पूंजीवाद, फासीवाद पर कहानियों के संदर्भ दिए। उन्होंने बताया हम मूल संवेदनाओं और जीवन की बात करेंगे तभी साहित्य सार्थक होगा। आज की कहानियां कौंध की तरह या चमत्कार की तरह कहानी कहती हैं पर उनमें समाज का सही निचोड़ नहीं होता। कहानियां नकली यथार्थ बोध से पीड़ित हैं।

कार्यक्रम के दूसरे हिस्से में लेखक प्रियम अंकित और राजीव कुमार ने भी “नयी सदी की नयी कहानी” पर अपने विचार व्यक्त किए। इस दौरान प्रियम अंकित ने अपने वक्तव्य में नया होने के निहितार्थ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि सामान्यतौर पर लोग बाद में आए को नया कहते हैं। जैसे 19वीं शताब्दी के बाद 20वीं शताब्दी को नया और इसकी प्रत्येक चीज को नया कहा जाता है। यह मेरे हिसाब से नए पन की सतही परिभाषा है। जबकि नए कहानीकार आपने आसपास के वातावरण, समाज, व्यवहारिक दुनिया में बदलते समय के बदलते यथार्थबोध से नएपन को गढ़ते हैं। इससे पहले राजीव कुमार ने अपनी बात रखते हुए 25 वर्षों के कहानियों में बदलाव को साझा किया। उन्होंने बताया कि इसमें सकारात्मक एवं नकारात्मक बदलाव दोनों ही तरह के हैं। बदलावों में मुख्य प्रभाव पूंजीवाद और पाश्चात्य दुनिया के प्रभावों का रहा है। अध्यक्षीय उद्बोधन विनोद तिवारी जी ने दिया।

वनमाली जी की कहानियों पर आधारित नाटक “दधीचि” का मंचन
समाज के भ्रष्टाचार और वर्गों की लड़ाईयों को नाटक के माध्यम से किया प्रस्तुत
वनमाली कथा समारोह के अंतर्गत आयोजित किए जा रहे दो दिवसीय टैगोर नाट्योत्सव का आगाज शाम के सत्र में हुआ। इसमें वनमाली जी की कहानियों पर आधारित नाटक ‘दधीचि’ की नाट्य प्रस्तुति ‘रंगशीर्ष’ संस्था के कलाकारों द्वारा निर्देशक संजय मेहता के निर्देशन में दी गई। इसमें उन्होंने वनमाली जी के जीवन और विचारों को उनकी लिखी कहानी ‘रेल का डिब्बा’, ‘आदमी और कुत्ता’ व ‘जिल्दसाज’ को नाटक ‘दधीचि’ में पिरोकर पेश किया।

नाटक ‘दधीचि’ की कहानी

नाटक की शुरुआत दो सूत्रधारों द्वारा वनमाली जी का जीवन वृत्तांत बताने से होती है जिसमें उनके शिक्षक जीवन और आदर्श विचारों की झलक मिलती है। इसी कड़ी में सूत्रधार उनकी तीन कहानियों का जिक्र करते हैं जो जीवन की आवश्यक सीख देती हैं। शुरुआत ‘रेल के डिब्बे’ से होती है जहां कुछ टिकट लेकर चलने वाले लोग बिना टिकट वालों को बैठने की जगह तक नहीं देते हैं। यह पैसे वालों और गरीबों के बीच की दुनिया के अंतर को दिखाता है। इसके बाद ‘आदमी और कुत्ता’ कहानी में 3 सिंधी शरणार्थी बहुत सारा सामान ट्रेन में ले जा रहे हैं। इस सामान का किराया बचाने के लिए उन्होंने इसकी टिकट लेने के बजाए टी.सी. और पुलिस वाले को घूस दी हुई है। जब ट्रेन में लोग उनसे पूछते हैं कि बैठने की जगह पर सामान क्यों रखा हुआ है तो वे गर्व से बताते हैं कि हमने घूस देकर सामान रखवाया है। वे आदमी को उसके स्वार्थी प्रकृति के कारण कुत्ता मानते हैं और उन्हें लगता है प्रत्येक आदमी पैसे का लोभी है। उनके इस विचार को ट्रेन का एक यात्री तोड़ता है जो अपनी जेब से पैसे देकर उनके सामान का पूरा टिकट बनवाता है। तीसरी कहानी ‘जिल्दसाज’ में एक बेहतरीन जिल्द बांधने वाले को दर्शाया गया है जो व्यवहार से अकड़ू है। उसके पास एक दिन एक गरीब महिला अपने बेटे की किताब की जिल्द बंधवाने आती है। तब वह महिला के अत्यधिक निवेदन पर कम पैसों में जिल्द बांधने को राजी हो जाता है। बाद में वह उस महिला के प्रेम में पड़ जाता है और शादी के लिए आग्रह कर देता है। परंतु महिला उसे इंकार कर देती है। नाटक के अंत में सूत्रधार बताते हैं वनमाली जी ने जीवन भर साहित्य और कला की सेवा की। जिस प्रकार दधीचि ने अपनी हड्डियों का दान कर देवताओं को अस्त्र प्रदान किया उसी प्रकार वनमाली जी अपना जीवन खपाकर साहित्य और कलाओं की सेवा और इन्हें लोगों तक पहुंचाने का प्रयास किया।

मंच पर

योगेश परिहार, रूपेश तिवारी, प्रेम प्रकाश अष्ठाना, चित्रांश, प्रिया, अंकिता, लोकेश, आसिम, अथर्व, पंकज, ऋषभ, मो. फैजान, प्रिया, रेणुका, रंजना

 

मंच परे

नाट्य रूपांतरण, मंच परिकल्पना वाद्य यंत्र एवं निर्देशन – संजय मेहता

लेखक – जगन्नाथ प्रसाद चौबे (वनमाली)

प्रकाश परिकल्पना एवं नियंत्रण – कमलेश मेहता

संगीत निर्देशक – मो. रहीमुद्दीन

वेशभूषा – फैजान, अंकिता, प्रिया, गायत्री, ऋषभ

मंच सामग्री – अथर्व, अभय, आसिम, रूपेश

मंच व्यवस्थापक – मो. फैजान

 

कल (28.2.2024) के कार्यक्रम

11 बजे से – कथेतर का रचना विधान विषय पर विमर्श

3 बजे से ‘कहानी का युवा स्वर’ रचनापाठ का आयोजन

6.30 बजे से – प्रतिष्ठित रंग निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर के निर्देशन में संभव संस्था के कलाकारों द्वारा संतोष चौबे की कहानियों की नाट्य प्रस्तुति