Friday, June 5, 2026
SGSU Advertisement
Home खरी बात हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ साहित्य और कलाओं को केंद्रीयता प्रदान...

हिंदी और भारतीय भाषाओं के साथ साहित्य और कलाओं को केंद्रीयता प्रदान करता विश्वरंग

0
451

संतोष चौबे

रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं डॉ. सी.वी. रमन विश्वविद्यालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किये जाने वाला टैगोर अन्तरराष्ट्रीय साहित्य एवं कला महोत्सव, शायद देश में अपनी किस्म का पहला आयोजन है जो किसी शैक्षिक संस्थान द्वारा किया जा रहा है। जहाँ टैगोर साहित्य के क्षेत्र में देश के पहले नोबल पुरस्कार विजेता थे, वहीं सी.वी. रामन को विज्ञान में देश का पहला नोबल पुरस्कार प्राप्त करने का गौरव हासिल है। इन महान भारतीयों के नाम पर स्थापित हमारे दोनों विश्वविद्यालय इस बात पर ज़ोर देते हैं कि विज्ञान और तकनीक के शिक्षण के साथ-साथ साहित्य एवं कलाओं का शिक्षण भी उतना ही महत्वपूर्ण है और एक संतुलित मनुष्य के निर्माण में वैज्ञानिक दृष्टि और कलात्मक संवेदना दोनों का होना आवश्यक है। इसमें अपनी भाषा और परंपरा के प्रति गर्व और सम्मान की भावना भी सन्निहित है।

विश्वरंग का आयोजन इन्हीं आधारों पर किया जा रहा है। जहाँ इसमें विश्व कविता एवं विश्व में हिंदी के सत्र आयोजित हैं, वहीं प्रवासी भारतीय साहित्य को भी उतना ही स्थान दिया गया है। यह उत्सव हिंदी और भारतीय भाषाओं को केंद्रीयता प्रदान करता है और उनमें आपसी भाईचारे और सम्मान की भावना विकसित करना चाहता है वहीं दूसरी ओर, यह बोलियों से भी रस ग्रहण करना चाहता है जिनके बिना भाषा बहुत विपन्न होगी। यह युवा रचनात्मकता पर जोर देता है और छूटे हुए समूहों जैसे थर्ड जैंडर तथा दिव्यांग को शामिल करना चाहता है।

साहित्य, कला, रंगमंच और संगीत का यह वृहद आयोजन आज के समय में कलाओं की अंतः संबद्धता को रेखांकित करने का एक प्रयास भी है। विश्वरंग का आयोजन इस उम्मीद के साथ किया जा रहा है कि भारत और विश्व के अन्य देशों के बीच साहित्यिक, सांस्कृतिक संवाद को और मजबूत किया जा सके, संवाद और सहयोग ज्यादा गहरा हो तथा भाषा और प्रेम के मूल रंगों से पहचान बढ़े।

साहित्य के अलावा विश्वरंग कलाओं को भी पर्याप्त स्थान प्रदान करता है। इसमें रबीन्द्र नाथ टैगोर की चित्र प्रदर्शनी तो लगाई ही जा रही है, उनके चित्रों पर आधारित रवीन्द्र कैटलॉग का प्रकाशन भी किया गया है। टैगोर के बहाने भारत में कलाओं के इतिहास पर एक राष्ट्रीय सेमीनार का आयोजन भी किया जा रहा है, जो चित्रकला पर गहन विचार-विमर्श करेगा। इसी के साथ शायद पहली बार है कि देश के नवोदित चित्रकारों से चित्र आमंत्रित कर उन्हें पुरस्कृत करने का विचार भी किया गया है।

मुझे बहुत खुशी है कि रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के आह्वान पर करीब 1000 नवोदित चित्रकारों ने अपनी पेंटिंग्स भेजी, जिनमें से 175 का चयन प्रदर्शनी हेतु किया गया है। इनमें से 5 चित्रकारों को पुरस्कृत भी किया जा रहा है। अधिकतर प्रतिभागियों ने इस बात पर आश्चर्य और प्रसन्नता जाहिर की है कि इस पूरे उपक्रम में उनसे कोई शुल्क नहीं लिया गया। इस कैटलॉग में शामिल चित्रों को देखकर आपको नवोदित चित्रकारों की प्रतिभा, विविधता और उनकी स्थानिकता का आभास हो सकेगा।

आज के उत्तर आधुनिक समय में जहाँ चित्रकला में फोटोग्राफिक चमक बढ़ी है, वहीं उसमें गहराई का लोप हुआ है। इसने चित्रकला के मीडियम पर भी प्रभाव डाला है। उदाहरण के लिए ऑयल पेन्ट्स जो चित्रकला में एक तरह की गहराई प्रदान करते थे, उनके बदले अब बहुत से अन्य मीडियम्स का प्रयोग नवोदित चित्रकार कर रहे हैं। एक तरह से ये समय की गति और उसकी बदलती छवियों को पकड़ने का प्रयास है।