एल.बी.टी. सभागार में टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के छात्रों की “रबीन्द्रनाथ टैगोर – कहानियों के तीन छोर” की प्रभावशाली प्रस्तुति

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भोपाल : 10 जनवरी/ रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के अंतर्गत टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के प्रथम वर्ष के छात्रों द्वारा “रबीन्द्रनाथ टैगोर – कहानियों के तीन छोर” का नाट्य मंचन शनिवार को एल.बी.टी. सभागार में सम्पन्न हुआ। प्रख्यात रंगनिर्देशक देवेन्द्र राज अंकुर के मार्गदर्शन में मंचित इस प्रस्तुति में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर की तीन कालजयी कहानियों – ‘एक रात’, ‘रासमणि का बेटा’ और ‘अंतिम रात’ — को संवेदनशील नाट्य भाषा में रूपांतरित कर दर्शकों के सामने प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में रंगमंच प्रेमी, साहित्यकार, विद्यार्थी और कला अनुरागी उपस्थित रहे।

कहानी-1-सार – “एक रात”

‘एक रात’ कहानी का नायक और सुरबाला दोनों बचपन के मित्र हैं। दोनों के बीच अदृष्य प्रेम है। नायक पढ़ाई में उलझ जाता है और सुरबाला का विवाह हो जाता है। संयोग से नायक की नियुक्ति सुरबाला के ही शहर में होती है। बाढ़ आने पर दोनों की मुलाकात होती है पर पूरी रात दोनों निर्जन में चुप्पी साधे खड़े रहते है पर कोई सामाजिक सीमा नहीं टूटती। सुबह होते ही पानी उतर जाता है और दोनों चुपचाप अलग हो जाते हैं। नायक समझ जाता है कि उसका जीवन असफलताओं से भरा हो, पर उस एक रात में उसने प्रेम और आत्मिक पूर्णता का शाश्वत अनुभव पा लिया।

मंच परः दुर्गेश कुमार, प्रकाश गंगवार, विजय सरदार, हर्ष बैजल, सुमित कुमार सागर, माधव सचदेव, पूर्णिमा कुमारी।

कहानी – 2- सार – ‘रासमणि का बेटा’

‘रासमणि का बेटा’ यह टैगोर की अत्यंत मार्मिक कहानियों में से एक है। कहानी एक ऐसे परिवार के इकलौते पुत्र की कथा है, जो कभी अत्यंत संभ्रांत और संपन्न था, किंतु समय और परिस्थितियों ने परिवार को ऐसी दरिद्रता में धकेल दिया कि अंततः उसके पुत्र के प्राण ही छिन गए। कहानी का केंद्र एक खोया हुआ वसीयतनामा है, जिसे लेकर पूरे परिवार को विश्वास है कि उनका बेटा उसे अवश्य ढूँढ लाएगा। किंतु नियति कुछ और ही तय कर चुकी होती है। यह कहानी मानवीय आशा, टूटते विश्वास और सामाजिक यथार्थ की करुण अभिव्यक्ति है।

मंच परः देवव्रत कुशवाह, आशुतोष अग्निहोत्री, दक्ष कौशिक, आर्यन पंत, करण कश्यप, धर्मवीर चौधरी, नम्रता यादव।

कहानी – 3 – सार – ‘अंतिम रात’

‘अंतिम रात’ टैगोर की एक गहरी मनोवैज्ञानिक और मार्मिक कहानी है, जो मनुष्य की अंतिम घड़ी में उसके अंतर्मन, पश्चाताप और जीवन-सत्य को उजागर करती है। कहानी का केंद्रीय पात्र अपनी मृत्यु की अंतिम रात का सामना कर रहा है। मृत्यु का भय उसे बाहरी संसार से काटकर उसके भीतर की दुनिया में ले जाता है। इस अंतिम रात में उसे बोध होता है कि जिन सांसारिक उपलब्धियों पर वह गर्व करता रहा, वे सब निरर्थक हैं। जीवन का वास्तविक मूल्य प्रेम, करुणा और मानवीय संबंधों में है, जिन्हें उसने जीवन भर उपेक्षित किया। अंतिम क्षणों में पात्र मृत्यु को भय नहीं, बल्कि सत्य और मुक्ति के रूप में स्वीकार करता है।

मंच परः ऋषभ मालवीय, अभिलाष बोरबोरह, लवकुश कुमार, अभय कुमार तिवारी, मिहिर कसेरा, विक्रम वर्मा, मानसी जायसवाल

मंच परेः
कहानी- रबीन्द्रनाथ टैगोर
मार्गदर्शन- देवेन्द्र राज अंकुर
मार्गदर्शन सहयोग- विक्रान्त भट्ट
प्रकाश परिकल्पना- डॉ. चैतन्य आठले
मंच व्यवस्थापक, वेशभूषा एवं प्रकाश- संचालन– सोनू साहा
सहयोग- अविजित सोलंकी, संतोष कौशिक, चैतन्य भट्ट, शरद मिश्रा, अशोक गौर, जीतमल

रबीन्द्रनाथ टैगोर के बारे में…

रबीन्द्रनाथ टैगोर आधुनिक भारतीय साहित्य और संस्कृति के महान रचनाकार थे। वे बंगला साहित्य के माध्यम से उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दशकों में भारतीय साहित्य को नई दिशा देने वाले सृजनशील व्यक्तित्व के रूप में प्रतिष्ठित हुए। एक शिक्षित और सांस्कृतिक परिवार में जन्मे टैगोर ने बहुत कम आयु में साहित्य-सृजन आरंभ कर दिया था। उनकी काव्यकृति ‘गीतांजलि’ के लिए उन्हें सन् 1913 में साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया, जिससे वे यह सम्मान पाने वाले प्रथम एशियाई साहित्यकार बने।

टैगोर का साहित्यिक योगदान अत्यंत व्यापक है। उन्होंने कविता, कहानी, उपन्यास और नाटक सभी विधाओं में सशक्त लेखन किया। ‘काबुलीवाला’, ‘पोस्टमास्टर’, ‘छुट्टी’ जैसी कहानियाँ तथा ‘गोरा’, ‘घरे-बाइरे’ जैसे उपन्यास उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं। ‘मुक्तधारा’ और ‘विसर्जन’ उनके प्रसिद्ध नाटकों में शामिल हैं। साहित्य के साथ-साथ टैगोर एक महान संगीतकार और चित्रकार भी थे। रवीन्द्र संगीत ने भारतीय संगीत परंपरा को नई पहचान दी। भारत और बांग्लादेश के राष्ट्रगान उनकी ही रचनाएँ हैं। इस प्रकार रबीन्द्रनाथ टैगोर एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी महान कलाकार और विचारक थे।

निर्देशकः देवेन्द्र राज अंकुर

देवेन्द्र राज अंकुर ने दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में स्नातकोत्तर तथा राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से निर्देशन में विशेषज्ञता प्राप्त की है। आपने देशभर में अनेक व्यावसायिक और शौकिया रंगमंच समूहों के साथ नाट्य निर्देशन किया है।

आप ‘संभव’ समूह के संस्थापक सदस्य तथा ‘कहानी का रंगमंच’ के प्रणेता हैं। अध्यापक, कैम्प निर्देशक और नाट्य-निर्देशक के रूप में देशभर में कार्यशालाओं में सक्रिय भागीदारी रही है। अनेक नाटकों का अंग्रेजी एवं अन्य भाषाओं से अनुवाद, तथा पत्र-पत्रिकाओं में नियमित रंगमंच विषयक लेखन।

रंग आलोचना पर आपकी सात से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। टैगोर फेलोशिप से सम्मानित प्रो. अंकुर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के निदेशक भी रह चुके हैं। रंगमंच के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए आपको संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

निर्देशकीय

मुझे प्रसन्नता है कि इन दिनों मैं टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में प्रथम वर्ष के छात्रों के साथ एक प्रस्तुति पर कार्य कर रहा हूँ। इस प्रस्तुति के लिए रबीन्द्रनाथ टैगोर की तीन कहानियाँ चुनी गई हैं- ‘एक रात’, ‘रासमणि का बेटा’ और ‘अंतिम रात’। इन कहानियों का कोई पारंपरिक नाट्य-रूपांतरण नहीं किया गया है। हमारा प्रयास यह है कि टैगोर ने जिस तरह इन्हें लिखा है, उसी मूल रूप में इन्हें मंच पर दृश्यात्मक अनुभव में बदला जाए। मैंने इस प्रयोग को ‘कहानी का रंगमंच’ नाम दिया है।

इस प्रक्रिया में अभिनेता स्वयं कहानी को पढ़ते हुए, उसके भीतर से गुजरते हुए यह खोजते हैं कि शब्द उनके लिए किस प्रकार का दृश्य संसार रचते हैं। वे मंच पर बार-बार रचना करते हैं, उसे तोड़ते हैं और फिर नए सिरे से बनाते हैं। 26 दिसंबर से प्रस्तुति के दिन तक हम इसी निरंतर अभ्यास से गुजर रहे हैं, ताकि छात्र यह समझ सकें कि एक प्रस्तुति कैसे जन्म लेती है, विशेषकर तब जब वह नाटक नहीं, बल्कि कहानी जैसी साहित्यिक विधा पर आधारित हो। हमारा उद्देश्य यह है कि ये कहानियाँ, बिना किसी छेड़छाड़ के, अपने मूल स्वरूप में देखने की विधा में परिवर्तित हो सकें। प्रतिदिन छात्र अपने बनाए दृश्य लेकर आते हैं, जिन्हें हम सभी शिक्षक मिलकर देखते हैं और फिर उन्हें एक नया दृश्य संसार रचने के लिए प्रेरित करते हैं। कम से कम तीन बार इस पुनर्रचना की प्रक्रिया से गुजरना हमारा लक्ष्य है।

अभी तक दो चरण पूरे हो चुके हैं और अब छात्र तीसरे दृश्य संसार की रचना में लगे हैं। इसके बाद देखा जाएगा कि प्रस्तुति अपना अंतिम रूप क्या ग्रहण करती है। यह प्रक्रिया मेरे लिए अत्यंत आनंददायक है, क्योंकि मेरा मानना है कि रंगमंच के अनुभव के लिए आलेख, अभिनेता और दर्शक इन तीनों के अतिरिक्त और कुछ आवश्यक नहीं है। प्रारंभ में छात्रों को यह संकोच था कि बिना सेट, संगीत और प्रकाश के प्रस्तुति कैसे आकार लेगी, लेकिन अब वे स्वयं अनुभव कर चुके हैं कि कहानी के शब्द ही दृश्य रचते हैं, और उनकी अपनी जीवंत भाषा उस दृश्य का हिस्सा बन जाती है। चूँकि यह कार्य अभी प्रक्रिया में है, इसलिए फिलहाल मैं इतना ही कह सकता हूँ और इतना कहना भी मुझे बहुत अच्छा लग रहा है।