वनमाली कथा सम्मान का भव्य समापन, आज का समय कथेतर का समय माना जाता है : संतोष चौबे

0
117

भोपाल : 28 फरवरी/ सुप्रतिष्ठित कथाकार, शिक्षाविद् तथा विचारक स्व. जगन्नाथ प्रसाद चौबे ‘वनमाली’ के रचनात्मक योगदान और स्मृति को समर्पित संस्थान वनमाली सृजन पीठ, रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय एवं आईसेक्ट पब्लिकेशन के द्वारा आयोजित किए जा रहे तीन दिवसीय राष्ट्रीय वनमाली कथा सम्मान समारोह का तीसरा एवं अंतिम दिन विमर्श, युवाओं के कहानी पाठ और नाट्य प्रस्तुति के नाम रहा। इसमें दिन की शुरुआत ‘कथेतर का रचना विधान’ सत्र से हुई। इसमें वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के समय को कथेतर का समय माना जाता है इसलिए वनमाली सम्मान में कथेतर सम्मान को भी शामिल किया गया है। इसके बाद उन्होंने अपने प्रसिद्ध कथेतर ‘कथा भोपाल’ के अंश का पाठ किया। इसमें कथानक में भोपाल के बनने का इतिहास, वर्तमान परिदृश्य और भविष्य की दृष्टि शामिल है जो पाठकों को रूचिकर लगते हैं। इस सत्र की अध्यक्षता प्रतिष्ठित साहित्यकार ममता कालिया ने की। ममता कालिया ने अपने उद्बोधन में कहा कि कथेतर ने कथा को पीछे छोड़ दिया है, पाठकों में कथेतर को लेकर बहुत जिज्ञासा है। कथेतर में लेखक जीवन के बारे में लिखते हैं। अपने वक्तव्य के दौरान उन्होंने निर्मल वर्मा जैसे वरिष्ठ लेखक और सिटी ऑफ जॉय जैसी मशहूर किताबों का जिक्र किया। आत्मीय सान्निध्य महेश दर्पण का रहा। इस दौरान उन्होंने अपने वक्तव्य में कहा कि आज का भूगोल कल का इतिहास होता है, ऐसे में कथेतर जैसी नई विद्या अपने साथ अनंत संभावनाएं लेकर आई है।

इसी सत्र के दूसरे हिस्से में लेखक अनिल यादव, कबीर संजय, आलोक रंजन ने अपने वक्तव्य दिए। अपने वक्तव्य में कबीर संजय ने कहा कि कथेतर आज नए सिरे से लोकप्रिय हो रहा है। कथेतर जीवन है और उसके विविध रूपों में बिखरा हुआ है। कथा-कहानियों से ही मानव सभ्यता विकसित हुई है। कथेतर साहित्य, विज्ञान, पर्यावरण, प्रकृति के मिलन बिंदु तक मिलाता है जो जीवन की समरसत का वर्णन करता है। वहीं आलोक रंजन ने कहा कि कथा एक धुरी है जिसकी परीधी में बहुत सारी बातें हैं। कथेतर एक नया माध्यम है जिससे समाज को नए सिरे से देखने और समझने की दिशा मिलती है। कथेतर में प्रमाणिकता तलाश सकते हैं। तार्किकता भी परख सकते हैं। इसमें अनिल यादव ने कथेतर के लोकप्रिय होने का कारण बताते हुए कहा कि पिछले तीस सालों में भारत में, विशेष रूप से हिंदी पट्टी में अभूतपूर्व बदलाव हुए हैं जैसे पिछले 1000 साल में भी नहीं हुए हैं।

कथेतर लेखन में नयापन लाकर लेखक को तैयार भी करता है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में शशांक ने कहा कि कथेतर में एक लय होती है जो एक कहानीकार से दूसरे कहानीकार को अलग पहचान देती है। साथ ही बताया कि हिंदी कहानियों की वजह से कहानियां जीवन जगत की प्रतिलिपियां बनाती हैं।

अगला सत्र “कहानी का युवा स्वर” रहा जिसमें युवा लेखकों शहादत खान, सुमेधा अग्रश्री, निहाल पराशर ने अपनी रचनाओं का पाठ किया। इसमें अध्यक्षता संतोष चौबे ने की। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के रहने वाले शहादत खान ने अपनी रचना ‘कुर्बान’ का पाठ किया। इसमें उन्होंने एक बकरे की कहानी सुनाई जिसे कुर्बानी के लिए पाला जाता है। परंतु परिवार को उससे अत्यधिक लगाव हो जाता है। और जब वह बकरा कुर्बानी पर जाता है तो घर के लोग बीमार तक पड़ जाते हैं। सुमेधा अग्रश्री ने रचना …. पाठ किया। वहीं निहाल पराशर ने अपनी रचना ‘पटना का सुपरहीरो’ को पढ़ा जिसमें एक बच्चा अपने शहर के रोल मॉडल को देखता है और उस जैसा बनने की कोशिश करता है। अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में संतोष चौबे ने युवा रचनाकारों की सराहना करते हुए कहा कि तीनों युवा जिज्ञासा और आश्चर्य से अच्छी भाषा का संधान करते हुए अच्छी विवरणात्मकता के साथ कहानी संभव करते हैं। मुझे सभी की कहानी सुनकर बहुत अच्छा लगा। साथ ही उन्होंने कहा कि लेखक को भावुक होना चाहिए। यह उसके लेखन को बेहतर बनाता है। कार्यक्रम के अंत में आभार वक्तव्य वनमाली सृजन पीठ भोपाल के अध्यक्ष मुकेश वर्मा ने दिया। उन्होंने सभी युवा रचनाकारों की सराहना करते हुए कहा कि लेखकों की युवा पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ रही है, इससे बहुत आश्वस्ती मिलती है।