नई दिल्ली, 1 फरवरी (आईएएनएस)। ‘इस धरती पर कुदरत ने महामानव की सृष्टि की। जहां पर देवताओं की प्रथम ये देवभूमि थी। यहीं गंगा से सजपुर सोने गहराता तो है घना, यहीं ऋषियों ने तप करके महावेदों की रचना की। जहां के ऊंचे शिखरों पर प्रथम होता सवेरा, इसी हिमनंद की गोदी में उत्तराखंड है मेरा।’ पर्वतीय संस्कृति के लोकवाहक, गढ़वाली गीतों के पुरोधा और रचनाकार जीत सिंह नेगी ने इसी देवभूमि की आत्मा को शब्दों, सुरों और रंगमंच के माध्यम से जन-जन तक पहुंचाने का काम किया।
जीत सिंह नेगी का 2 फरवरी 1925 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल में जन्म हुआ। विश्वयुद्ध के युग में पहाड़ी बालक का बचपन वर्मा के फौजियों के बीच में गुजरा। बारूद की गंध भी इस बालक के मन से पहाड़, गांव, पनघट और खसियारियों की यादें धुंधला नहीं सकी। जब जीत सिंह नेगी लोकगीत सुनाया करते थे, तब लोगों के मन में पहाड़ जाने की इच्छा और प्रबल हो जाती।
कहा जाता है कि जीत सिंह नेगी उस दौर के गायक केएल सहगल से बहुत प्रभावित थे। इसीलिए उन्होंने लय सहगल की अपनाई, लेकिन मूल पहाड़ी ही रखा। वे सिर्फ एक रचनाकार या लोकगायक नहीं, बल्कि पहाड़ी संस्कृति के सच्चे उपासक और संवाहक बने। उन्होंने ‘गीत गंगा’, ‘जौंल मगरी’, ‘छम घुंघरू बाजला’, ‘मलेथा की कूल’ और ‘भारी भूल’ जैसी रचनाएं कीं।
उनके लोकगीतों की व्यापकता और लोकप्रियता को भारतीय जनगणना सर्वेक्षण विभाग ने भी प्रमाणित किया। भारत सरकार के जनगणना विभाग के ग्राम सर्वेक्षण में सामूहिक सर्वप्रिय लोकगीतों में जीत सिंह नेगी का गीत भी शामिल था। नई पीढ़ी को जीत सिंह नेगी की रचनाओं से परिचित कराने के उद्देश्य से नरेंद्र सिंह नेगी ने उनके गाए गीतों को अपने स्वर में लयबद्ध किया।
उत्तराखंड के एक प्रतिष्ठित लोक गायक और संगीतकार नरेंद्र सिंह नेगी ने खुद उनके गीतों को गाया था। नरेंद्र सिंह नेगी ने एक इंटरव्यू में बताया, “एक बार दुबई में मैं प्रोग्राम कर रहा था तो वहां कुछ बुजुर्ग लोग थे। उन्होंने मुझसे कहा कि जब भी भारत जाना होता है, आपके गाने तो हमें मिल जाते हैं और हम रिकॉर्डिंग ले आते हैं, लेकिन जीत सिंह नेगी की रिकॉर्डिंग नहीं मिलती है। मैंने उन लोगों को जवाब दिया कि वे ऐसी अवस्था में हैं कि रिकॉर्डिंग नहीं हो सकती है।”
नरेंद्र सिंह नेगी ने अपने शब्दों में कहा, “बाद में जब मैं देहरादून में पोस्टेड था, तब 1991-92 में मैंने जीत सिंह नेगी के सामने एक प्रस्ताव रखा था कि लोग आपके गानों को ढूंढते हैं, लेकिन आपके गाने मार्केट में नहीं हैं। मैंने उनसे इजाजत मांगी कि आपके गीत गीतों को मैं अपनी आवाज में गाना चाहता हूं, तो इस पर वे बहुत खुश हुए। उन गीतों को लिखने पर जीत सिंह नेगी के लिए कंपनी ने 25 हजार रुपए का चेक दिया था। जब इस चेक को उन्हें सौंपा गया तो उनकी आंखों में आंसू आ गए थे। वह रिकॉर्डिंग को लेकर बहुत खुश हुए थे।”
जीत सिंह नेगी उत्तराखंड के पहले लोकगायक हैं, जिनके गीतों को उन्हीं के स्वर में 1947 में एचएमवी कंपनी ने रिकॉर्ड किया था। उनके गीतों का ग्रामोफोन रिकॉर्ड 1949 में यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी ने जारी किया था।

