यादों में हलीम : पर्दे के पीछे के असली उस्ताद, जिनकी धुन पर ‘मधुबन में राधिका’ ने किया नृत्य

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मुंबई, 17 फरवरी (आईएएनएस)। अक्सर जब हम भारतीय शास्त्रीय संगीत और सितार की बात करते हैं, तो हमारे जहन में पंडित रवि शंकर और उस्ताद विलायत खां के नाम पहले आते हैं। लेकिन, 20वीं सदी के संगीत के आकाश में एक ‘सितार त्रयी’ थी, जिसका तीसरा और सबसे प्रयोगात्मक कोना अब्दुल हलीम जाफर खां थे।

18 फरवरी, 1927 को मध्य प्रदेश के छोटे से शहर जावरा में जन्मे अब्दुल हलीम जाफर खां को संगीत विरासत में मिला था। उनके पिता, उस्ताद जाफर खां, इंदौर बीनकर घराने के दिग्गज थे। बीन (रुद्रवीणा) का भारी-भरकम अनुशासन और ध्रुपद की गंभीरता हलीम जाफर खां के बचपन का हिस्सा थी। लेकिन नियति उन्हें कहीं और ले जाना चाहती थी। जब परिवार मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) आया, तो समुद्र की लहरों की तरह इस युवा कलाकार की महत्वाकांक्षाएं भी हिलोरे लेने लगीं।

किशोरावस्था में, जब अन्य बच्चे खेलकूद में व्यस्त थे, हलीम जाफर रेडियो पर अपनी जगह बना रहे थे। 1940 के दशक तक आते-आते, संगीत जगत में चर्चा शुरू हो गई थी, “एक लड़का आया है, जो सितार को रुद्रवीणा की तरह बजाता है।”

यहीं पर हलीम जाफर खां ने वह किया, जिसने उन्हें बाकी उस्तादों से अलग कर दिया। उन्होंने महसूस किया कि सितार अब तक ‘एकल’ (मोनोफोनिक) है। यानी एक बार में एक ही सुर निकाल सकता है। लेकिन, उनका मन पश्चिमी वाद्ययंत्रों की तरह ‘हारमनी’ पैदा करना चाहता था। उन्होंने ‘चपका अंग’ और ‘पॉलीफोनी’ जैसी तकनीकों का आविष्कार किया, जहां वे एक ही समय में सितार के दो अलग-अलग तारों को झंकृत करते थे। नतीजा यह होता था कि सुनने वाले को लगता था जैसे दो सितार एक साथ बज रहे हों।

अक्सर शास्त्रीय संगीतकार फिल्मों से दूरी बनाकर रखते थे, लेकिन हलीम जाफर खां का नजरिया अलग था। वे मानते थे कि सुर, सुर होता है, चाहे वह दरबार में गूंजे या सिनेमा हॉल में।

फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ (1959) का वह दृश्य याद कीजिए, जहां उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई और सितार के बीच जुगलबंदी होती है। वह सितार हलीम जाफर खां का ही था। शहनाई, जिसमें सांस का अटूट प्रवाह होता है, और सितार, जिसकी आवाज तार छेड़ते ही कम होने लगती है। इन दोनों का मेल असंभव माना जाता था। लेकिन खां साहब ने अपनी ‘मींड’ (स्वरों को खींचने की कला) से सितार को इतना ‘गाते हुए’ बजाया कि शहनाई और सितार एक हो गए।

फिल्म ‘कोहिनूर’ का अमर गीत “मधुबन में राधिका नाचे रे” आज भी संगीत के विद्यार्थियों के लिए एक चुनौती है। उस गीत में हलीम जाफर खां ने ही सितार बजाई थी।

1958 में मशहूर अमेरिकी जैज पियानोवादक डेव ब्रूबेक भारत आए थे। मुंबई के एक होटल के कमरे में उनकी मुलाकात हलीम जाफर खां से हुई। भाषा अलग थी, संस्कृति अलग थी, लेकिन संगीत एक था।

इतनी उपलब्धियों, पद्म श्री, पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी जैसे सर्वोच्च सम्मानों के बावजूद, उस्ताद अब्दुल हलीम जाफर खां हमेशा जमीन से जुड़े रहे। बांद्रा में उनका घर संगीत, शायरी और सादगी का संगम था। वे न तो पंडित रवि शंकर की तरह ग्लोबल स्टारडम के पीछे भागे और न ही उस्ताद विलायत खां की तरह किसी प्रतिद्वंद्विता में पड़े। वे अपनी ही धुन में मगन रहने वाले एक संत-कलाकार थे।