पीएम मोदी ने मणि शंकर मुखोपाध्याय के निधन पर जताया शोक, रचनाओं में जिंदगी को संवेदनशीलता के साथ दिखाने की तारीफ की

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नई दिल्ली, 20 फरवरी (आईएएनएस)। प्रसिद्ध बंगाली लेखक मणि शंकर मुखोपाध्याय, जिन्हें साहित्य जगत में ‘शंकर’ के नाम से जाना जाता था, का 93 वर्ष की आयु में शुक्रवार को कोलकाता के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन से बंगाली साहित्य जगत में शोक की लहर दौड़ गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मणि शंकर मुखोपाध्याय को श्रद्धांजलि अर्पित की और उनके परिवार, मित्रों तथा लाखों प्रशंसकों के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।

पीएम मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करके मणि शंकर मुखोपाध्याय के निधन पर दुख जताया। उन्होंने लिखा, “मणि शंकर मुखोपाध्याय, जिन्हें प्यार से शंकर के नाम से जाना जाता था, के निधन से बहुत दुख हुआ। वे बंगाली साहित्य में एक बहुत बड़ी हस्ती थे, जिनके शब्दों में लोगों की जिंदगी को संवेदनशीलता और समझ के साथ दिखाया जाता था। अपनी यादगार रचनाओं के जरिए उन्होंने कई पीढ़ियों के पाठकों पर असर डाला और भारत की साहित्यिक दुनिया को समृद्ध बनाया। उनके परिवार, दोस्तों और अनगिनत चाहने वालों के प्रति मेरी गहरी संवेदनाएं। ओम शांति।”

मणि शंकर मुखोपाध्याय का जन्म 7 दिसंबर 1933 को हुआ था। वे बंगाली साहित्य के सबसे लोकप्रिय और प्रभावशाली लेखकों में से एक थे। उनकी रचनाएं शहरी जीवन की जटिलताओं, महत्वाकांक्षाओं, नैतिक द्वंद्वों और सामाजिक यथार्थ को बखूबी उकेरती थीं। उनकी सबसे प्रसिद्ध कृतियां ‘चौरंगी’, ‘सीमाबद्ध’, ‘जनअरण्य’, ‘कतो अजाना’ और ‘एक एका एकाशी’ हैं। ‘चौरंगी’ को सत्यजीत रे ने 1968 में फिल्म रूपांतरित किया, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध हुई। उनकी कई अन्य रचनाएं भी फिल्मों में रूपांतरित हुईं, जिनमें सत्यजीत रे की ‘सीमाबद्ध’ और ‘जनअरण्य’ शामिल हैं।

शंकर ने 70 वर्षों से अधिक के लेखन करियर में दर्जनों उपन्यास, कहानी संग्रह, संस्मरण और निबंध लिखे। 2020 में उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार ‘एक एका एकाशी’ (संस्मरण) के लिए मिला। वे व्यंग्य, हास्य और गहन मानवीय संवेदना के मिश्रण के लिए जाने जाते थे, और उनकी लेखनी ने शहरी मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और संघर्षों को जीवंत रूप दिया, जिसने कई पीढ़ियों को प्रभावित किया।