फणीश्वरनाथ रेणु की ‘मारे गए गुलफाम’, जिस पर बनी राजकपूर अभिनीत प्रसिद्ध फिल्म ‘तीसरी कसम’

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नई दिल्ली, 3 मार्च (आईएएनएस)। फणीश्वरनाथ रेणु हिंदी साहित्य के उस दौर के लेखक हैं, जिन्होंने गांव और खेतों की जिंदगी को ऐसे पन्नों पर उतारा कि पढ़ते ही पाठक खुद उसकी खुशबू में खो जाए। उनकी कहानी ‘मारे गए गुलफाम’ भी कुछ ऐसी ही है, जिस पर राजकपूर अभिनीत प्रसिद्ध फिल्म ‘तीसरी कसम’ बन चुकी है।

फिल्म में हीरामन नामक एक सरल और भोले बैलगाड़ी चालक की कहानी दिखाई गई है, जो सफर के दौरान घूम-घूमकर नौटंकी करने वाली नर्तकी हीराबाई से दोस्ती करता है और धीरे-धीरे उससे प्रेम करने लगता है। उनकी इस यात्रा के माध्यम से फिल्म ‘तीसरी कसम’ मासूमियत, सामाजिक पूर्वाग्रह और आम लोगों के जीवन की शांत गरिमा को संवेदनशील ढंग से प्रस्तुत करती है। फिल्म का शीर्षक ‘तीसरी कसम’ हीरामन के उस संकल्प को दर्शाता है, जिसमें वह मोहभंग के बाद भी अपने आदर्शों और मूल्यों पर अडिग रहने का निर्णय करता है।

फिल्म और कहानी दोनों में सबसे खूबसूरत बात यह है कि यह सिर्फ प्यार की कहानी नहीं है। यह सामाजिक पूर्वाग्रह, ग्रामीण जीवन की चुनौतियों और आम लोगों की गरिमा को बड़े संवेदनशील तरीके से दिखाती है। गांव के लोग, उनके त्योहार, उनकी बातें, उनकी छोटी-छोटी खुशियां सब कुछ कहानी का हिस्सा है।

रेणु की खासियत भी यह थी कि उन्होंने कभी शहरों के ऊंचे महलों या चमचमाती सड़कों के मोह में फंस कर कहानी नहीं लिखी, बल्कि अपने गांव, अपने आसपास की दुनिया की सच्चाई को उसी सजीव अंदाज में पेश किया जैसे लोग सच में बोलते हों।

फणीश्वरनाथ रेणु का जन्म 4 मार्च 1921 को बिहार के पूर्णिया जिले के औराही हिंगना गांव में हुआ था। छोटे से गांव का वो जीवन, जहां हर किसी की जिंदगी एक-दूसरे से जुड़ी होती थी, उनके लेखन का आधार बन गया। गांव की गलियों में बच्चे खेलते, बूढ़े चौपाल में बैठकर कहानियां सुनाते और महिलाएं अपनी दिनचर्या के काम में लगी रहतीं, यही सारी छोटी-छोटी बातें रेणु ने अपने उपन्यासों और कहानियों में उतार दी।

रेणु की भाषा में एक अलग मिठास है। कोई भारी-भरकम शब्द नहीं, कोई अंग्रेजी का दिखावा नहीं। जैसे गांव के लोग बोलते हैं, वैसे ही उनके पात्र भी बोलते हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियां हर स्तर के पाठक को सहज और करीब लगती हैं। चाहे आप गांव में पले-बढ़े हों या शहर में, उनकी भाषा आपको खींच लेती है और आप भी गांव की दुनिया का हिस्सा बन जाते हैं।

उनका जीवन भी उनकी कहानियों जितना ही रोचक था। स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रहना, जेल जाना, नेपाल की क्रांति में भाग लेना और फिर राजनीति से दूर होकर साहित्य की ओर लौटना—इन अनुभवों ने उनके लेखन को और गहराई दी। यही वजह है कि उनकी कहानियों में केवल गांव का दृश्य ही नहीं, बल्कि मनुष्य का संघर्ष, संवेदनाएं और जीवन के उतार-चढ़ाव भी दिखाई देते हैं।

फणीश्वरनाथ रेणु के हिंदी साहित्य में दिए योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया और उन पर डाक टिकट भी जारी किया गया है।