नई दिल्ली, 10 मार्च (आईएएनएस) राज्यसभा में पर्यावरण वन एवं जलवायु मंत्रालय के कामकाज पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद नीरज डांगी ने कहा कि मंत्रालय को विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने में कई गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा, जैसे कि बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) के लिए जंगलों का अत्यधिक उपयोग, आदिवासियों के अधिकारों को लागू करने में धीमी प्रगति व जंगल की आग और जलवायु परिवर्तन से बढ़ता खतरा। डांगी ने इस दौरान अरावली पर्वत श्रृंखला के महत्व को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि अरावली पर्वत श्रृंखला दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है।
यह लगभग 2 अरब साल पुरानी है और लगभग 670 किलोमीटर लंबी है। यह पर्वत श्रृंखला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसका महत्व केवल पहाड़ के रूप में नहीं है, बल्कि यह थार रेगिस्तान और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच प्राकृतिक दीवार का काम करती है। मानसून को रोककर बारिश में मदद करती है। चट्टानें भूजल रिचार्ज करने में मदद करती हैं व धूल भरी आंधियों को रोकती हैं।
नीरज डांगी ने कहा कि यदि अरावली नष्ट होती है, तो पूर्वी राजस्थान में बारिश कम हो सकती है व खेती प्रभावित होगी। भूजल स्तर गिर सकता है और धूल भरी आंधियां दिल्ली तक पहुंच सकती हैं। उन्होंने कहा कि 2018 में सरकारी समिति ने पाया कि 128 पहाड़ियों में से 31 पहाड़ियां गायब हो चुकी हैं और इसका कारण अवैध खनन है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने मई 2024 में निर्देश दिया कि अरावली की एक समान परिभाषा तय की जाए ताकि संरक्षण स्पष्ट हो सके। इसके लिए एक समिति बनाई गई। नीरज डांगी ने कहा कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया ने पहले से ही एक परिभाषा दी थी। इसमें पूरी पर्वत श्रृंखला को एक इकाई मानकर संरक्षण की बात थी, लेकिन समिति ने नई सिफारिश दी कि 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाले भू-आकृतियों को ही अरावली माना जाए।
सांसद ने कहा कि राजस्थान में मैप की गई 12,081 पहाड़ी संरचनाओं में से केवल 1048 (लगभग 8.7 प्रतिशत) ही इस परिभाषा में आतीं। बाकी 90 प्रतिशत से अधिक पहाड़ियां संरक्षण से बाहर हो जातीं। वहां खनन संभव हो सकता था।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट में एमिकस क्यूरी ने बताया कि फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया की विस्तृत रिपोर्ट दबा दी गई। उस रिपोर्ट में बताया गया था कि छोटी पहाड़ियां भी पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण हैं। उन पहाड़ियों की घाटियां प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल रिचार्ज कर सकती हैं।
डांगी ने सवाल उठाया कि क्या पर्यावरण मंत्रालय ने अपनी ही संस्था की रिपोर्ट दबा दी और क्या सुप्रीम कोर्ट को गलत जानकारी दी गई।

