कोलकाता, 14 मार्च (आईएएनएस)। कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र 1967 में अपनी स्थापना के बाद से ही राजनीतिक विचारधाराओं का अखाड़ा रहा है। यह पश्चिम बंगाल के 42 लोकसभा क्षेत्रों में से एक है। सालों से इसने सत्ता समीकरणों में महत्वपूर्ण बदलाव देखे हैं, जो पश्चिम बंगाल के बदलते राजनीतिक परिदृश्य को दर्शाते हैं। इसी ठीक तरह कृष्णानगर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली 7 विधानसभा सीटों की स्थिति रही है, जहां जनता अक्सर बदलाव को चुनती है।
कृष्णानगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के सभी सात विधानसभा क्षेत्र नादिया जिले में स्थित हैं। इन सीटों में तेहट्टा, पलाशीपारा, कालीगंज, नकाशीपारा, छपरा, कृष्णानगर उत्तर और कृष्णानगर दक्षिण शामिल हैं।
2021 के विधानसभा चुनाव में कृष्णानगर उत्तर को छोड़ सभी सीटों पर तृणमूल कांग्रेस को विजय हासिल हुई थी। कृष्णानगर उत्तर से भाजपा के टिकट पर मुकुल रॉय ने जीत हासिल की थी, लेकिन पिछले साल उनका निधन होने से यह सीट खाली हो गई। तेहट्टा सीट भी खाली है। यहां से 2021 में चुनाव जीतने वाले टीएमसी के तपस कुमार साहा का पिछले साल निधन हो गया। कालीगंज से टीएमसी विधायक नसीरुद्दीन अहमद का भी निधन होने से वह खाली हो गई थी। हालांकि, उपचुनाव में यह सीट फिर से टीएमसी को मिल गई।
फिलहाल, पलाशीपारा से टीएमसी के माणिक भट्टाचार्य, कालीगंज से अलीफा अहमद, नकाशीपारा से कल्लोल खान, छपरा से रुकबानुर रहमान और कृष्णानगर दक्षिण से उज्ज्वल बिस्वास विधायक हैं।
तेहट्टा निर्वाचन क्षेत्र 1977 और 2006 के बीच अस्तित्व में नहीं था। 1951 और 1972 के बीच हुए सात चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने छह बार जीत हासिल, जबकि भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) को 1971 में एक बार जीत मिली। हालांकि, 2011 में निर्वाचन क्षेत्र के पुनर्गठित होने के बाद माकपा ने फिर से जीत मिली। 2016 और 2021 में यहां टीएमसी ने कब्जा जमाया। हालांकि, पिछले कुछ चुनावों में यहां भाजपा का भी वोटबैंक बढ़ा है, जो सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लिए चिंता का विषय बनता जा रहा है।
पलाशीपारा में टीएमसी को 2016 में पहली बार जीत मिली और उसने 2021 में इसे फिर से दोहराया। 2016 से पहले यहां माकपा इकलौती पार्टी थी, जिसने 1977 के बाद से कोई चुनाव नहीं हारा था। वहीं, कालीगंज विधानसभा क्षेत्र ने अक्सर राजनीतिक बदलाव को चुना। भले शुरुआत 6 चुनावों में कांग्रेस को जनता ने जिताया, लेकिन उसके बाद से यहां परिवर्तन का दौर रुका नहीं है। 2016 में कांग्रेस ने टीएमसी से यह सीट वापस छीनी थी, लेकिन 2021 में टीएमसी ने अपनी दूसरी जीत हासिल करके कांग्रेस का पत्ता साफ किया। उसके बाद 2025 के उपचुनाव में भी टीएमसी को जीत मिली।
1951 में स्थापित नकाशीपाड़ा में अब तक 17 चुनाव हुए हैं। कांग्रेस, माकपा और टीएमसी को यहां पांच-पांच बार जीत मिली। मगर 2001 के बाद से परिस्थितियां बदलीं और यह तृणमूल कांग्रेस का मजबूत गढ़ बन चुकी है। लगातार 5 चुनावों में टीएमसी यहां विजयी रही है। हालांकि, भाजपा अभी भी लोकसभा की ताकत को विधानसभा स्तर की सफलता में बदलने की कोशिश कर रही है।
नादिया जिले का छपरा विधानसभा क्षेत्र 1962 में स्थापित हुआ। तब से लेकर अब तक यहां 15 चुनाव हुए हैं। भले शुरुआत (1962 से 1972 तक) पांच चुनावों में जनता ने राजनीतिक दलों को बदला, लेकिन 1977 में माकपा ने यहां पैर इस तरह जमाए कि 1977 से 2006 तक लगातार 7 बार जीत हासिल की। 2011 से 2021 तक टीएमसी भी यहां जीत की हैट्रिक लगा चुकी है।
परिसीमन के बाद कृष्णानगर उत्तर विधानसभा क्षेत्र 2011 में अस्तित्व में आया। अब तक 3 चुनावों में यहां दो राजनीतिक दलों को अवसर मिले। 2011 और 2016 में जहां टीएमसी विजयी रही, वहीं 2021 में भाजपा ने अपना खाता खोला। दूसरी तरफ, कृष्णानगर दक्षिण विधानसभा क्षेत्र में तृणमूल कांग्रेस का दबदबा कायम है। पिछले तीनों चुनावों में टीएमसी को जीत मिली।

