राममनोहर लोहिया : बर्लिन से लौटकर चुना ‘स्वदेशी समाजवाद,’ पश्चिमी विचारों को दी चुनौती

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नई दिल्ली, 22 मार्च (आईएएनएस)। 23 मार्च 1910 को उत्तर प्रदेश के अकबरपुर में जन्मे डॉ. राममनोहर लोहिया का जीवन आरंभ से ही असाधारण था। मात्र ढाई वर्ष की अल्पायु में ही उनके सिर से मां का साया उठ गया, लेकिन इस व्यक्तिगत त्रासदी ने एक सामाजिक चेतना की नींव रख दी। उनके पालन-पोषण की जिम्मेदारी किसी एक जाति या वर्ग तक सीमित नहीं रही, बल्कि पड़ोस की विभिन्न जातियों की महिलाओं ने उन्हें मातृत्व का स्नेह दिया।

एक अबोध बालक के रूप में समाज के हर तबके के बीच पलने का ही परिणाम था कि उनके भीतर बचपन में ही जातिवाद और छुआछूत जैसी कुरीतियों के प्रति विद्रोह के बीज अंकुरित हो गए थे।

बर्लिन विश्वविद्यालय (जर्मनी) से अर्थशास्त्र और राजनीति विज्ञान में डॉक्टरेट करने वाले लोहिया जब भारत लौटे, तो वे पश्चिमी विचारों के गुलाम नहीं थे। उस दौर में जब भारतीय बुद्धिजीवी या तो पश्चिमी पूंजीवाद के मुरीद थे या फिर सोवियत रूस के कम्युनिज्म के, लोहिया ने ‘स्वदेशी समाजवाद’ की एक बिल्कुल नई राह चुनी।

उन्होंने कार्ल मार्क्स की रटी-रटाई थ्योरी को यह कहकर खारिज कर दिया कि भारत में वर्ग-संघर्ष केवल पैसे का नहीं है। यहां ‘जाति’ ही वर्ग तय करती है। उनका स्पष्ट मानना था कि जब तक भारत में जाति व्यवस्था जिंदा है, तब तक आर्थिक समानता की कोई भी बात बेमानी है।

लोहिया की आजादी की भूख सिर्फ ब्रिटिश-शासित भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं थी। 18 जून 1946 को, जब भारत अपनी आजादी के जश्न की तैयारी कर रहा था, लोहिया पुर्तगाली तानाशाहों की आंखों में धूल झोंककर गोवा पहुंच गए। वहां उन्होंने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए पुर्तगालियों के खिलाफ सविनय अवज्ञा आंदोलन छेड़ दिया। आज भी गोवा में 18 जून को ‘गोवा क्रांति दिवस’ के रूप में मनाया जाता है।

इतना ही नहीं, पड़ोसी देश नेपाल में निरंकुश ‘राणा शासन’ को उखाड़ फेंकने के लिए उन्होंने नेपाली राष्ट्रवादियों (जैसे बीपी कोइराला) को भारत में हथियार, पनाह और रणनीतिक समर्थन दिया। वे सच्चे अर्थों में एक अंतरराष्ट्रीय लोकतंत्र सेनानी थे।

देश आजाद हुआ, लेकिन लोहिया का संघर्ष खत्म नहीं हुआ। उन्होंने माना कि सत्ता में बैठी कांग्रेस अब ‘आम आदमी’ की नहीं, बल्कि ‘अभिजात्य वर्ग’ की पार्टी बन गई है। उन्होंने बिना झिझक सत्ता से बगावत कर दी और ‘गैर-कांग्रेसवाद’ का नारा दिया। उनका “3 आना बनाम 15 आना” का भाषण आज भी भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे जोरदार और ऐतिहासिक भाषण माना जाता है।

सरकार द्वारा निर्धारित एक दिन में प्रति व्यक्ति आय 15 आना के विषय पर संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। डा. लोहिया ने कहा, “यह आंकड़ा सुधार लिया जाए, भारत की साठ फीसद जनता की प्रति व्यक्ति आय महज तीन आने रोजाना है।” उन्होंने इसके पीछे के तथ्यों और सूत्रों का हवाला देते हुए एक बेहद लंबा और रोचक भाषण दिया था, जिसके बाद संसद में नेहरू मंत्रिमंडल के समक्ष काफी बौद्धिक चर्चा हुई, जिसे संसद में अब तक की सबसे स्वस्थ बहस माना जाता है।

लोहिया केवल सवाल नहीं उठाते थे, वे समाधान भी गढ़ते थे। उन्होंने दुनिया को अन्याय से लड़ने के लिए ‘सप्त क्रांति’ (सात क्रांतियां) का अचूक मंत्र दिया। इसमें स्त्री-पुरुष समानता, जाति-प्रथा का विनाश, रंगभेद का अंत, निजी निजता की रक्षा और आर्थिक समानता जैसे मोर्चे शामिल थे।

आज हम जिस ‘पंचायती राज’ और ‘सत्ता के विकेंद्रीकरण’ की बात करते हैं, उसका असली विचार लोहिया का ‘चौखंभा राज्य’ ही था। उनका सपना था कि सत्ता को चार खंभों (गांव, जिला, प्रांत और केंद्र) में बराबर बांटा जाए, ताकि दिल्ली में बैठा नेता नहीं, बल्कि गांव का आम आदमी अपने फैसले खुद ले सके।

उन्होंने ‘अंग्रेजी हटाओ’ और ‘जाति तोड़ो’ जैसे उग्र आंदोलन चलाए। उनका अंग्रेजी का विरोध भाषा से नहीं, बल्कि उस सिस्टम से था जो अंग्रेजी के नाम पर गरीबों और ग्रामीणों को सत्ता और शिक्षा से दूर रखता था। उन्होंने सामूहिक भोज शुरू करवाए जहां हर जाति के लोग एक साथ भोजन करते थे।

1990 के दशक में जिस ‘मंडल आयोग’ ने पिछड़ों (ओबीसी) को 27 प्रतिशत आरक्षण दिया और भारतीय राजनीति की धुरी बदल दी, उसकी वैचारिक नींव दशकों पहले लोहिया ने ही “पिछड़े पावें सौ में साठ” के नारे के साथ रख दी थी। आज उत्तर भारत की राजनीति में सक्रिय तमाम क्षेत्रीय पार्टियां लोहिया के ही विचारों की उपज हैं।

12 अक्टूबर 1967 को इस महान ‘विद्रोही संन्यासी’ ने दिल्ली में अपनी आखिरी सांस ली। उनके पास ना कोई बैंक बैलेंस था, ना कोई प्रॉपर्टी और ना ही कोई अपना घर।