मेटियोरोलॉजिकल मेजरमेंट सिस्टम क्या है, जानें कैसे करता है काम?

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नई दिल्ली, 23 मार्च (आईएएनएस)। मेटियोरोलॉजिकल मेजरमेंट सिस्टम या एमएमएस एक उन्नत हवाई उपकरण है, जो वायुमंडल की तात्कालिक स्थिति या मौसम को सटीक और उच्च रिजॉल्यूशन में मापता है। यह मुख्य रूप से विमान पर लगाया जाता है और एयरक्राफ्ट के आस-पास के वातावरण की महत्वपूर्ण जानकारी कलेक्ट करता है।

एमएमएस मौसम विज्ञानियों, शोधकर्ताओं और मौसम पूर्वानुमान मॉडलों के लिए अत्यंत उपयोगी है। अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा इसके बारे में विस्तार से जानकारी देता है। एमएमएस एक इन-सीटू एयरबोर्न इंस्ट्रूमेंट है, जिसका इस्तेमाल मुख्य रूप से वैज्ञानिक अनुसंधान और मौसम अध्ययन के लिए किया गया है। यह वायुमंडल के विभिन्न पैरामीटर्स को मापता है, जैसे वायुमंडलीय दबाव, तापमान, हवा की दिशा और गति, ट्रू एयरस्पीड, टर्बुलेंस, पोटेंशियल टेम्परेचर, रेनॉल्ड्स नंबर, टर्बुलेंस डिसिपेशन रेट ये सभी माप आमतौर पर 20 हर्ट्ज (प्रति सेकंड 20 बार) की दर से लिए जाते हैं, जिससे बहुत सटीक और उच्च-रिजॉल्यूशन डेटा मिलता है।

एमएमएस को विशेष रूप से कैलिब्रेट किया जाता है ताकि मौसम के प्रभावों का डेटा प्राप्त हो सके। अब सवाल है कि यह कैसे काम करता है? एमएमएस विमान के विभिन्न हिस्सों पर लगे सेंसरों के माध्यम से काम करता है। मुख्य सेंसरों में शामिल हैं- नोज बूम या पिटोट-स्टैटिक प्रोब यह हवा की गति और दबाव मापने के लिए है। तापमान प्रोब, जो तापमान के लिए है। इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम और जीपीएस यह विमान की गति, स्थिति और दिशा के लिए सेट किए जाते हैं।

इसके साथ ही थ्री-डायमेंशनल हवा के वेक्टर मापने वाले सेंसर शामिल हैं। विमान उड़ान भरते समय ये सेंसर लगातार डेटा इकट्ठा करते हैं। एमएएस में लगे कंप्यूटर सिस्टम इस डेटा को प्रोसेस करते हैं और सुधार लगाते हैं, जैसे विमान की गति से होने वाले तापमान प्रभाव या दबाव में बदलाव। परिणामस्वरूप मिलने वाला डेटा मौसम के सूक्ष्म बदलावों जैसे टर्बुलेंस, हवा की धाराएं को समझने में मदद करता है। यह डेटा मौसम पूर्वानुमान मॉडल को बेहतर बनाने, जलवायु अध्ययन करने और विमान सुरक्षा के लिए भी उपयोगी होता है।

भारत में इसरो और अन्य वैज्ञानिक संस्थान ऐसे सिस्टम का उपयोग करके वायुमंडल की गहन जानकारी इकट्ठा करते हैं। यह न केवल मौसम समझने में मदद करता है, बल्कि भविष्य के पूर्वानुमानों को भी सटीक बनाता है।

इसरो ने पूरे भारत में 1158 ऑटोमैटिक वेदर स्टेशन्स का नेटवर्क बनाया है। ये स्टेशन मौसम की जानकारी जैसे तापमान, हवा की गति, दबाव और बारिश आदि को अपने आप रिकॉर्ड करते हैं। इसरो ने इनमें से कई उपकरण खुद विकसित किए हैं।

इस डेटा से मौसम का सटीक पूर्वानुमान तैयार किया जाता है और मौजूदा पूर्वानुमानों की जांच भी होती है। इसके अलावा, इसरो के नेशनल एटमॉस्फेरिक रिसर्च लेबोरेटरी में एमएसटी रडार 24 घंटे हवाओं को मॉनिटर करता है। इससे बादल, तूफान जैसी वायुमंडलीय घटनाओं को गहराई से समझने में मदद मिलती है। ये सभी काम मौसम विज्ञान के अनुसंधान और बेहतर पूर्वानुमान के लिए किए जाते हैं।