इस्लामाबाद, 7 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में गरीबी अब अस्थायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक बन चुकी है और आम नागरिक सरकार की अरबों डॉलर की नीतिगत गलतियों की भारी कीमत चुका रहे हैं। यह खुलासा एक रिपोर्ट में किया गया है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान के योजना, विकास और विशेष पहल मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2018 में करीब 5 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे थे, जो 2024 तक बढ़कर लगभग 7 करोड़ हो गए हैं।
रिपोर्ट में बताया गया कि 2018 में बिजली का औसत टैरिफ करीब 11 रुपये प्रति यूनिट था, जो अब बढ़कर लगभग 50 रुपये प्रति यूनिट हो गया है। इसे सामान्य वृद्धि नहीं बल्कि “संरचनात्मक झटका” बताया गया है। बिजली महंगी होने से खाद्य पदार्थों के दाम बढ़े, वास्तविक आय घटी, उद्योग प्रभावित हुए और छोटे कारोबार बंद होने लगे।
रिपोर्ट के मुताबिक, बढ़े हुए बिजली बिल ने लोगों के जीवन पर कई गंभीर प्रभाव डाले हैं। इससे दैनिक जरूरतों का खर्च बढ़ गया है और परिवारों को भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी जरूरतों में कटौती करनी पड़ रही है।
स्थिति यह है कि बिजली बिल बढ़ने पर लोग चिकन की जगह दाल खाने लगे हैं, दूध में पानी मिलाना पड़ रहा है और फलों का सेवन कम हो गया है। स्कूल फीस और इलाज जैसे खर्च टाले जा रहे हैं, जबकि कई बच्चों को पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ रहा है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि सरकार की ऊर्जा नीतियों के कारण ही यह स्थिति पैदा हुई है। महंगे बिजली प्रोजेक्ट्स और उच्च क्षमता भुगतान (कैपेसिटी चार्ज) के चलते बिजली की कीमतें बढ़ीं, जिससे उत्पादन लागत भी बढ़ी और हर चीज महंगी हो गई।
रिपोर्ट में 1995 के एक पावर प्रोजेक्ट और 2017 के चीन-पाकिस्तान कोयला बिजली प्रोजेक्ट का उदाहरण देते हुए बताया गया कि इन परियोजनाओं की लागत और क्षमता भुगतान का बोझ अंततः आम जनता पर पड़ा।
रिपोर्ट के अनुसार, आज जो बिजली टैरिफ लोग दे रहे हैं, वह सिर्फ बिजली की कीमत नहीं बल्कि सरकार की पिछली नीतिगत गलतियों की भरपाई है। इसी वजह से पाकिस्तान का मध्यम वर्ग भी तेजी से गरीबी की ओर खिसक रहा है।

