Monday, June 22, 2026
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रिपोर्ट: 10 बार एचआईवी संक्रमण फैलने के बाद भी पाकिस्तान ने नहीं सीखा सबक

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इस्लामाबाद, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। पाकिस्तान में पिछले दस वर्षों और करीब दस एचआईवी प्रकोपों के बाद भी हालात में कोई खास सुधार नहीं हुआ है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, नवंबर 2024 से अक्टूबर 2025 के बीच ताउनसा में 331 बच्चों में एचआईवी संक्रमण की पुष्टि हुई है।

यह मामले तब सामने आए हैं जब सरकार ने ताउनसा के तहसील मुख्यालय अस्पताल में कार्रवाई का दावा किया था और वहां के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट को हटाकर नया अधिकारी नियुक्त किया गया था। इसके बावजूद ब्रिटिश प्रसारक बीबीसी की अंडरकवर रिपोर्ट में सामने आया कि अस्पताल में अब भी लापरवाही जारी है। रिपोर्ट में दिखाया गया कि बच्चों पर एक ही सिरिंज का बार-बार इस्तेमाल किया जा रहा है, कपड़ों के ऊपर से इंजेक्शन दिए जा रहे हैं और नर्स बिना दस्ताने के मेडिकल कचरे में हाथ डाल रही है। कई अभिभावकों ने भी पुष्टि की कि उनके बच्चों पर इस्तेमाल की गई सिरिंज दोबारा उपयोग में लाई गई थी।

पाकिस्तान के प्रमुख अखबार ‘डॉन’ की रिपोर्ट के अनुसार, आधे से ज्यादा मामलों में संक्रमण का कारण ‘दूषित सुई’ पाया गया है। पूर्व विशेष सहायक ने भी इस मुद्दे पर चिंता जताते हुए कहा कि यह समस्या केवल एक अस्पताल तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर में इस तरह की लापरवाही देखने को मिल रही है। उन्होंने बताया कि असुरक्षित स्वास्थ्य सेवाओं, जैसे डिस्पोजेबल सिरिंज का दोबारा उपयोग, बिना जांच के रक्त चढ़ाना, असुरक्षित यौन संबंध और अस्वच्छ उपकरणों के इस्तेमाल के कारण रक्त जनित बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इस तरह की घटनाओं के बाद आमतौर पर कुछ समय के लिए आक्रोश देखने को मिलता है, जांच बैठती है और सरकार कुछ कदम उठाती है, लेकिन धीरे-धीरे मामला ठंडा पड़ जाता है और फिर किसी नए प्रकोप के साथ समस्या दोबारा सामने आ जाती है।

पाकिस्तान में इससे पहले भी कई बड़े एचआईवी प्रकोप सामने आ चुके हैं। 2019 में लरकाना में 1,000 से अधिक मामले सामने आए थे, जिनमें 90 प्रतिशत तक बच्चे थे। इसके अलावा 2023 में जैकबाबाद और शिकारपुर, 2024 में ताउनसा, मीरपुरखास और डेरा गाजी खान में भी एचआईवी संक्रमण के मामले बढ़े। हैदराबाद, शहीद बेनजीरआबाद, नौशहरो फिरोज और कराची में भी ऐसे मामले दर्ज किए गए हैं।

कराची की स्वतंत्र पत्रकार जोफीन टी. इब्राहिम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि इन गंभीर लापरवाहियों के बावजूद न तो पर्याप्त जन आक्रोश दिखता है और न ही जिम्मेदार लोगों के खिलाफ ठोस कार्रवाई होती है। उन्होंने यह भी कहा कि जन जागरूकता की कमी एक बड़ी समस्या है, क्योंकि गरीब और कम जानकारी वाले मरीज यह समझ ही नहीं पाते कि एक सामान्य इंजेक्शन भी उन्हें या उनके बच्चों को जीवनभर की बीमारी दे सकता है।