मुंबई, 22 अप्रैल (आईएएनएस। हिंदी सिनेमा के शुरुआती दौर में जब प्लेबैक सिंगिंग अपनी पहचान बना रही थी, उस समय एक ऐसी आवाज उभरी जिसने संगीत की दुनिया को नई दिशा दी। यह कहानी है भारत की पहली प्लेबैक सिंगर मानी जाने वाली शमशाद बेगम की।
23 अप्रैल को शमशाद बेगम की पुण्यतिथि है। वह एक ऐसी गायिका थीं, जिसने अपनी अनोखी आवाज से लाखों दिलों पर राज किया, जिनकी चंचल और सरल गायकी हर महफिल की जान बन जाती थी। खास बात यह है कि उनके पिता उनकी गायकी के सख्त खिलाफ थे, लेकिन कुछ शर्तों के साथ उन्हें घर से बाहर निकलकर गाने की इजाजत मिली।
14 अप्रैल 1919 को पंजाब के अमृतसर में जन्मीं शमशाद बेगम एक पारंपरिक मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह सार्वजनिक रूप से गाएं, लेकिन परिवार और परिचितों के समझाने पर उन्होंने एक शर्त रखी कि शमशाद कभी अपनी तस्वीर नहीं खिंचवाएंगी। शमशाद ने इस शर्त को स्वीकार किया और इसी के साथ उनके करियर की शुरुआत हुई।
दिलचस्प बात यह रही कि उन्होंने खुद भी अपनी सूरत को लेकर झिझक महसूस की और जीवनभर तस्वीरों से दूरी बनाए रखी। स्कूल के दिनों में ही उनकी प्रतिभा सामने आ गई थी, उन्हें स्कूल का हेड सिंगर बनाया गया। धीरे-धीरे वह शादी-ब्याह और पारिवारिक आयोजनों में गाने लगीं। उनकी इसी लगन ने उन्हें आगे बढ़ाया और उन्होंने पेशावर रेडियो पर गाने का मौका हासिल किया। संगीतकार गुलाम हैदर ने बहुत कम उम्र में उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें पहला बड़ा मौका दिया।
इसके बाद शमशाद बेगम ने 1941 में फिल्म ‘खजांची’ से हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा। उनकी आवाज ने जल्द ही लोगों का दिल जीत लिया और वह उस दौर की सबसे लोकप्रिय गायिकाओं में शामिल हो गईं।
उन्होंने संगीतकार सी. रामचंद्र के साथ फिल्म ‘शहनाई’ में हिंदी सिनेमा का शुरुआती वेस्टर्न स्टाइल गीत गाया, जिसने उन्हें नई पहचान दिलाई। 1952 में आई फिल्म ‘बहार’ का गीत “सैयां दिल में आना रे” आज भी उतना ही लोकप्रिय है। उन्होंने उस दौर के कई सफल संगीतकारों के साथ काम किया, जिनमें ओ.पी. नैयर और नौशाद शामिल हैं। ओ.पी. नैयर ने उनकी आवाज की तुलना मंदिर की घंटियों से की थी। उनके गाए गीत जैसे “कभी आर कभी पार”, “कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना” और “लेके पहला पहला प्यार” आज भी सदाबहार माने जाते हैं।
दिलचस्प बात यह है कि लता मंगेशकर, आशा भोसले और गीता दत्त जैसी गायिकाओं के दौर में भी शमशाद बेगम ने अपनी अलग पहचान बनाए रखी। उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया।

