कर्नाटक : भाजपा की प्रदर्शन की चेतावनी, कहा- मुख्यमंत्री सिद्दारमैया को माफ नहीं करेंगे लोग

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बेंगलुरु, 24 अप्रैल (आईएएनएस)। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की अध्यक्षता में आंतरिक आरक्षण पर चर्चा के लिए विशेष कैबिनेट बैठक हुई। इस बीच कर्नाटक भाजपा ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि सरकार ने दलितों को आंतरिक आरक्षण देने के बजाय भ्रम पैदा किया है, जिससे समाज में मतभेद बढ़ रहे हैं और समुदायों के बीच टकराव की स्थिति बन रही है।

भाजपा ने दावा किया कि राज्य के लोग इस मुद्दे पर सरकार को माफ नहीं करेंगे।

भाजपा के प्रदेश कार्यालय में मीडिया से बात करते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री और भाजपा सांसद गोविंद करजोल ने कहा कि सिद्दारमैया को अहिंदा (दलितों, अल्पसंख्यकों और पिछड़ी जातियों का एक राजनीतिक गठबंधन) नेता कहलाने का हक नहीं है और उन्होंने दलित समुदायों को धोखा दिया है।

करजोल ने चेतावनी दी कि अगर न्याय नहीं मिला, तो पिछले तीन दशकों से आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे समुदाय सड़कों पर उतरेंगे। उन्होंने सरकार से कम से कम जस्टिस सदाशिव आयोग की सिफारिशों को लागू करने या किसी भी वर्ग के साथ अन्याय किए बिना सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने की अपील की।

उन्होंने दोहराया कि भाजपा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संवैधानिक मूल्यों के अनुसार 101 समुदायों को आरक्षण का लाभ देने की मांग करती है। सरकार पहले आंतरिक आरक्षण लागू करे और बाद में उसमें जो भी कमी हो, उसे ठीक किया जा सकता है।

करजोल ने बताया कि राज्य में पिछले 30 वर्षों से आंतरिक आरक्षण को लेकर संघर्ष चल रहा है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी आबादी के अनुसार आरक्षण बढ़ाने की मांग की जा रही है। इन मांगों को नजरअंदाज करते हुए राज्य सरकार ने सही तरीके से आरक्षण लागू नहीं किया और अदालत के निर्देशों में भी बदलाव किया।

उन्होंने सवाल उठाया कि सरकार आरक्षण के मुद्दे पर जातियों के बीच टकराव क्यों पैदा कर रही है और क्या अदालत के आदेशों में बदलाव कर आरक्षण घटाने के बाद भी सिद्दारमैया को अहिंदा नेता माना जा सकता है। जब आंतरिक आरक्षण की मांग तेज हुई, तब कांग्रेस सरकार ने जस्टिस सदाशिव आयोग का गठन किया और बाद में जस्टिस नागमोहन दास से भी रिपोर्ट ली।

उन्होंने बताया कि भाजपा सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने दलित आंदोलन को स्वीकार करते हुए अनुसूचित जातियों का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों का 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया था, जो उनकी आबादी के अनुरूप था। सामाजिक न्याय के तहत चार श्रेणियां भी बनाई गई थीं।

उन्होंने आगे कहा कि तत्कालीन कानून मंत्री के नेतृत्व में कैबिनेट की उपसमिति ने अपनी रिपोर्ट दी और सिफारिश केंद्र को भेजी गईं। इसके आधार पर आरक्षण का बंटवारा इस तरह किया गया, मडिगा और संबंधित समुदायों को 6 प्रतिशत, चलवाडी और उपजातियों को 5.5 प्रतिशत, लांबानी, भोवी, कोरमा और कोराचा समुदायों को 4.5 प्रतिशत, और घुमंतू समूहों को 1 प्रतिशत।

उन्होंने कहा कि इसे 2022 में दोनों सदनों से मंजूरी मिली, राज्यपाल की स्वीकृति भी मिली और यह कानून बन गया। चार वर्षों तक एससी और एसटी को क्रमशः 17 और 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिला। सिद्दारमैया सरकार अदालत में प्रभावी ढंग से अपना पक्ष नहीं रख पाई और न ही इसे संवैधानिक सामाजिक न्याय के सिद्धांतों के अनुसार लागू किया।

उन्होंने कहा कि आंशिक रोक के बाद सरकार ने अदालत में एक मेमो दाखिल कर कहा कि वह 17 प्रतिशत और 7 प्रतिशत आरक्षण जारी नहीं रखेगी, बल्कि 1995 के आदेश के अनुसार एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण लागू करेगी, और इसके लिए अनुमति मांगी।

उन्होंने कहा कि अदालत ने कोई विकल्प न होने के कारण इसे स्वीकार कर लिया और यह भी जोड़ा कि किसी भी अदालत ने 17 प्रतिशत और 7 प्रतिशत आरक्षण पर रोक या आपत्ति नहीं जताई थी।

उन्होंने सरकार पर खुद ही आरक्षण घटाने और दलितों के साथ अन्याय करने का आरोप लगाया, जिससे उसका अहिंदा नेता कहलाने का नैतिक अधिकार खत्म हो गया है।

उन्होंने इस मुद्दे की समीक्षा के लिए मुख्य सचिव के अधीन एक अन्य समिति बनाने पर सवाल उठाया और कहा कि जब पहले से ही रिपोर्ट मौजूद हैं, तो सरकार के पास ऐसा करने का क्या नैतिक अधिकार है?