2047 तक भारत होगा भौतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से करेगा विश्व का नेतृत्व: दत्तात्रेय होसबाले (आईएएनएस साक्षात्कार)

0
8

वॉशिंगटन, 25 अप्रैल (आईएएनएस): भारत धीरे-धीरे उस स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां वह अपनी आर्थिक शक्ति को अपनी सभ्यतागत मूल्यों के साथ जोड़कर विश्व का मार्गदर्शन कर सके। यह बात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरआरएस) के महासचिव दत्तात्रेय होसबाले ने कहा है कि 2047 में भारत भौतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से विश्व का नेतृत्व करने वाला होगा।

आईएएनएस को दिए एक साक्षात्कार के दौरान दत्तात्रेय होसबाले ने आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने कहा कि संगठन का राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में पहुंचना उसके बढ़ते प्रभाव को दर्शाता है, जो राजनीति, समाज और संस्कृति के विभिन्न क्षेत्रों में दिखाई देता है। साथ ही, यह राष्ट्रीय एकता और वैश्विक सद्भाव की व्यापक दृष्टि को आगे बढ़ाता है।

पूरा साक्षात्कार पढ़ें

आईएएनएस): आरएसएस ने अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूरे कर लिए हैं। आप पिछले 100 वर्षों में इसकी वृद्धि को कैसे देखते हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: आरएसएस ने पिछले विजयदशमी के दिन अपने 100 वर्ष पूरे किए। इन 100 वर्षों में संगठन ने देश के हर हिस्से और कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है और भारत के सामाजिक, राजनीतिक तथा सांस्कृतिक जीवन पर गहरा प्रभाव डाला है। यह यात्रा आसान नहीं रही। संगठन को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद आरएसएस ने कठिन परिस्थितियों को पार किया और यह समाज के समर्थन और स्वयंसेवकों की मेहनत के कारण संभव हुआ।

आरएसएस का प्रमुख प्रभाव ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ यानी अपनी राष्ट्र, संस्कृति और सभ्यता पर गर्व के रूप में देखा जाता है। ये मूल्य आज भी प्रासंगिक हैं और इन्हीं के आधार पर हमें राष्ट्रीय जीवन का निर्माण करना चाहिए, पहले भारत के और फिर समूची मानवता के हित में। इस विचार को समाज का व्यापक समर्थन मिला है, और आज आरएसएस को राष्ट्रीय जीवन के केंद्र में माना जाता है। यह केवल राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृति, उद्योग, शिक्षा, ग्रामीण विकास और कई अन्य क्षेत्रों में भी सक्रिय है।

सेवा कार्यों के अलावा, आरएसएस स्वयंसेवकों ने दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विशेष योगदान दिया है। पहला, प्राकृतिक आपदाओं के दौरान तत्काल राहत और पुनर्वास कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका रही है। दूसरा, देश की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के प्रति वे हमेशा सतर्क रहते हैं। इस तरह आरएसएस ने अपनी भूमिका का निर्वहन किया है।

आईएएनएस: आरएसएस के स्वयंसेवक या उसके सहयोगी संगठन केंद्र और कई राज्यों में सत्ता में हैं। आप इस राजनीतिक सशक्तीकरण को कैसे देखते हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: सबसे पहले, लोगों में अपनी संस्कृति और सभ्यता के प्रति गर्व की भावना बढ़ी है। दूसरी बात, स्वयंसेवकों ने यह साबित किया है कि वे समाज और लोगों के कल्याण के लिए बेहतर काम कर सकते हैं। लोगों ने इसे अनुभव किया है। इसी कारण केंद्र में लगातार तीसरी बार स्वयंसेवक पृष्ठभूमि वाले नेतृत्व को अवसर मिला है।

राज्य स्तर पर भी यही स्थिति है, क्योंकि राजनीति को केवल स्वार्थ, वोट बैंक या तुष्टिकरण तक सीमित मानने की धारणा जनता को स्वीकार नहीं थी। दशकों के अनुभव के बाद लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला कि व्यवस्था ऐसे लोगों के हाथ में होनी चाहिए, जो ईमानदारी, सांस्कृतिक जागरूकता और राष्ट्रीय एकता के साथ काम करें। अक्सर राजनीति के नाम पर समाज को विभिन्न आधारों पर बांटा जाता रहा है, लेकिन आरएसएस पृष्ठभूमि से आए लोगों ने सामाजिक एकता बनाए रखने में योगदान दिया है।

आईएएनएस: आप भारत के बाहर, विदेशों में आरएसएस के बढ़ते प्रभाव को कैसे देखते हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: आरएसएस भारत की सीमाओं के भीतर कार्य करता है, लेकिन दुनिया के विभिन्न देशों में रहने वाले स्वयंसेवक वहां भी सक्रिय हैं। वे स्थानीय स्तर पर हिंदू समाज को संगठित करने का प्रयास करते हैं। वे न केवल भारत में लोगों की मदद करते हैं, बल्कि जिस देश में रहते हैं, वहां के समाज की सेवा भी करते हैं। वे हमेशा इस बात का ध्यान रखते हैं कि जिस देश में वे रहते हैं, उसके प्रति उनकी निष्ठा और योगदान सर्वोपरि हो, क्योंकि वह उनकी कर्मभूमि है, जबकि भारत उनकी जन्मभूमि या प्रेरणाभूमि है। सांस्कृतिक और धार्मिक जुड़ाव के कारण वे दूर रहकर भी भारत की सेवा करते हैं।

आईएएनएस: ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ पूरी दुनिया एक परिवार है। इस संदर्भ में आरएसएस वैश्विक स्थिरता और समृद्धि में क्या भूमिका निभा सकता है?

दत्तात्रेय होसबाले: ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का संदेश हर स्वयंसेवक के मन में गहराई से समाया हुआ है। वह जहां भी जाता है, सभी को एक ही परिवार का सदस्य मानता है। यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि उनके दैनिक जीवन और सामाजिक कार्यों में दिखाई देता है। जी-20 सम्मेलन के दौरान भी “वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर” का यही संदेश दिया गया था। यह भावना स्वयंसेवकों के आचरण में और व्यापक रूप से हिंदू समाज में भी दिखाई देती है।

आईएएनएस: आरएसएस का वैश्विक दृष्टिकोण क्या है?

दत्तात्रेय होसबाले: आज दुनिया कई गंभीर चुनौतियों से गुजर रही है। पहली चुनौती है वर्चस्ववाद, जो अब भी कई हिस्सों में मौजूद है और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को बढ़ाता है। दूसरी, धर्म के नाम पर हिंसा और आतंकवाद मानवता के लिए बड़ा खतरा हैं। तीसरी चुनौती पर्यावरण और पारिस्थितिकी से जुड़ी है। विज्ञान और तकनीक का विकास स्वागत योग्य है, लेकिन यह पर्यावरण संतुलन की कीमत पर नहीं होना चाहिए। चौथी बड़ी समस्या है परिवारों का टूटना। उपभोक्तावाद और लालच के कारण परिवार कमजोर हो रहे हैं। किसी भी अच्छे परिवार की नींव विश्वास, प्रेम और स्नेह पर होती है। इनके बिना परिवार टिक नहीं सकते।

दुनियाभर में यह एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। यदि परिवार स्वस्थ हैं तो समाज और राष्ट्र भी स्वस्थ होंगे। इसलिए एक मजबूत, एकजुट और सामंजस्यपूर्ण परिवार का निर्माण आवश्यक है।

इसी कारण आरएसएस मानता है कि भारतीय दर्शन के संदेश विविधता के साथ सार्वभौमिक एकता को अपनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही सतत विकास, पर्यावरण संतुलन और प्रकृति, व्यक्ति, परिवार तथा राष्ट्रों के बीच सामंजस्य जरूरी है। यदि इन सभी पहलुओं में संतुलन स्थापित किया जाए, तो मानव जीवन अधिक बेहतर हो सकता है।

आईएएनएस: भारत लगभग 700 वर्षों तक विदेशी शासन के अधीन रहा। इसका भारतीय या हिंदू मानस पर गहरा प्रभाव पड़ा। क्या हम उस मानसिक प्रभाव से उबर चुके हैं या वह अभी मौजूद है?

दत्तात्रेय होसबाले: भारत के इतिहास में संघर्ष और विदेशी शासन, दोनों रहे हैं। राजनीतिक स्वतंत्रता मिले लगभग 80 वर्ष हो चुके हैं, लेकिन कुछ क्षेत्रों में औपनिवेशिक मानसिकता अभी दिखाई देती है। इसलिए डिकोलोनाइजेशन (औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति) की प्रक्रिया अभी पूरी तरह नहीं हुई है। राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक और अन्य प्रकार की स्वतंत्रता भी आनी चाहिए थी, लेकिन यह अभी पूर्ण रूप से हासिल नहीं हुई।

भारत, हिंदू धर्म, समाज और इतिहास के बारे में कई बार विकृत कथाएं प्रस्तुत की गई हैं। यह केवल बाहरी लोगों द्वारा नहीं, बल्कि दुर्भाग्य से भारत में ही पले-बढ़े लोगों द्वारा भी इस औपनिवेशिक मानसिकता के कारण हुआ है। इसलिए, यह आवश्यक है कि भारत की कथा तथ्यों, अनुभवों और वास्तविकताओं के आधार पर सही की जाए, न कि केवल वैचारिक या राजनीतिक दृष्टिकोण से। जब यह होगा, तब मानसिक डिकोलोनाइजेशन संभव होगा और वही वास्तविक स्वतंत्रता होगी।

आईएएनएस: इसके कुछ उदाहरण दे सकते हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: आज भी कई लोग ‘आर्य आक्रमण’ जैसी बातों पर विश्वास करते हैं, जिसे लंबे समय तक पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाया गया, जबकि अब इसे प्रमाणित नहीं माना जाता। दूसरा, भारत की वैज्ञानिक विरासत के बारे में लोगों को पूरी जानकारी नहीं है। तीसरा, भारतीय समाज के बारे में गलत धारणाएं—जैसे कि जाति संबंधी मुद्दों को लेकर विदेशों (जैसे अमेरिका और ब्रिटेन) में बनाए जा रहे कानून—यह भी एक गलत नैरेटिव है।

भाषाओं के संदर्भ में भी, पहले भारतीय भाषाएं बोलने वालों को कम शिक्षित समझा जाता था, जिससे शिक्षित वर्ग में हीनभावना पैदा हुई। अब स्थिति बदल रही है और भारतीय भाषाएं फिर से फल-फूल रही हैं। इसी तरह, भारत की सांस्कृतिक एकता को भी गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया कि भारत 1947 के बाद ही एकजुट हुआ, जबकि वास्तव में भारत सदियों से सांस्कृतिक रूप से एक रहा है।

अगर ऐसा न होता, तो आदि शंकराचार्य केरल से देश के चारों कोनों तक नहीं जाते और स्वामी विवेकानंद कोलकाता से कन्याकुमारी तक पूरे भारत का भ्रमण नहीं करते। हम सांस्कृतिक रूप से एक हैं—एक लोग, एक राष्ट्र, लेकिन यह धारणा बनाई गई कि हम ब्रिटिश शासन या 1947 के बाद एक राष्ट्र बने, जबकि हम हजारों वर्षों से एक राष्ट्र रहे हैं।

आईएएनएस: पहले 100 वर्षों में आरएसएस ने बहुत कुछ हासिल किया है। अगले 100 वर्षों के लिए इसके लक्ष्य क्या हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: मैं यह नहीं कह सकता कि अगले 100 वर्षों में क्या होगा, लेकिन यह निश्चित है कि भारत आगे बढ़ेगा, समृद्ध होगा और मानवता की सेवा करेगा। भारत को आत्मविश्वासी, एकजुट और सामंजस्यपूर्ण बनाना आवश्यक है, ताकि वह मानवता के उत्थान में योगदान दे सके। स्वामी विवेकानंद ने कहा था—“उठो भारत, अपनी आध्यात्मिक शक्ति से दुनिया को जीत लो।” आरएसएस समाज को इसके लिए तैयार करना चाहता है।

इतिहासकार अर्नोल्ड टॉयनबी ने भी कहा था कि यदि मानवता को बचना है, तो उसे भारतीय मार्ग अपनाना होगा, क्योंकि भारत में नैतिकता और सभ्यतागत मूल्य आज भी जीवित हैं। इसलिए लोगों को इस वैश्विक भूमिका के लिए तैयार करना जरूरी है। जब तक वे राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत, आत्मविश्वासी और सक्षम नहीं होंगे, तब तक वे यह भूमिका नहीं निभा सकते।

आईएएनएस: क्या आपको लगता है कि भारत का समय आ गया है?

दत्तात्रेय होसबाले: भारत का समय हमेशा से रहा है। प्रश्न यह है कि क्या भारतीय इसके प्रति जागरूक हैं या नहीं। हमारा उद्देश्य भारत को इस दिशा में जागृत करना है।

आईएएनएस: 2047 में आप भारत को कैसा देखते हैं?

दत्तात्रेय होसबाले: भौतिक रूप से समृद्ध और आध्यात्मिक रूप से विश्व का मार्गदर्शन करने वाला।

आईएएनएस: क्या 100 वर्षों बाद आरएसएस को सुधार या पुनर्गठन की आवश्यकता है?

दत्तात्रेय होसबाले: आरएसएस निरंतर विकसित होने वाला संगठन है। यह समय के अनुसार अपने कार्यों और तरीकों में बदलाव करता रहा है। स्वतंत्रता से पहले और बाद में इसकी कार्यप्रणाली में बदलाव हुए। बाद में योग और प्राणायाम पर अधिक जोर दिया गया। सेवा कार्यों को संगठित रूप दिया गया और इसके लिए अलग विभाग बनाए गए। नई आवश्यकताओं के अनुसार प्रशिक्षण और कौशल विकास पर भी ध्यान दिया गया।

अब ‘पंच परिवर्तन’ (सामाजिक समरसता, परिवार, पर्यावरण-अनुकूल जीवन, राष्ट्रीय स्वाभिमान और नागरिक कर्तव्य/सिविक सेंस) पर काम किया जा रहा है।

आज विज्ञान और तकनीक तेजी से बढ़ रहे हैं, लेकिन नागरिक कर्तव्य और अनुशासन में कमी महसूस की जाती है, इसलिए इस पर भी ध्यान दिया जा रहा है।

साथ ही, समाज में जो लोग विभिन्न क्षेत्रों में अच्छा काम कर रहे हैं, उन्हें जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है, ताकि सामूहिक शक्ति से समाज का अधिक भला हो सके।

आईएएनएस: 100 वर्षों बाद भी आरएसएस को लेकर कई मत और मिथक हैं। आप इसे कैसे परिभाषित करेंगे?

दत्तात्रेय होसबाले: आरएसएस मानव सामाजिक पूंजी का निर्माण करता है। यह एक संगठन भी है, एक आंदोलन भी और एक जीवन शैली भी है, जो हिंदू सभ्यता और मूल्यों से जुड़ी है। यह मॉडल दुनिया के किसी भी देश में लागू किया जा सकता है, ताकि वहां के समाज का कल्याण हो सके, साथ ही वैश्विक दृष्टिकोण भी बना रहे।

आईएएनएस: विदेशों के धार्मिक नेताओं के लिए आपका संदेश?

दत्तात्रेय होसबाले: धर्म से परे एक व्यापक आध्यात्मिकता होती है। धर्म और आध्यात्मिकता एक ही नहीं हैं। आध्यात्मिकता उससे ऊपर है। हर धर्म की अपनी सभ्यतागत जड़ें होती हैं। यदि उन्हें समझा जाए तो मानवता की एकता आसान हो सकती है। भारत के संदर्भ में, सभी लोग भारतीय हैं और अपनी आस्था के अनुसार किसी भी धर्म का पालन कर सकते हैं। हम धर्म के आधार पर भेदभाव के खिलाफ हैं और सभी को आस्था की स्वतंत्रता होनी चाहिए, लेकिन इसके साथ ही हर व्यक्ति को राष्ट्र के प्रति निष्ठावान होना चाहिए। राष्ट्र से ऊपर कोई धर्म नहीं है।

आईएएनएस: आप क्या सोचते हैं कि वर्तमान राजनीतिक नेतृत्व को भारत में अब कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए?

दत्तात्रेय होसबाले: “वन नेशन, वन इलेक्शन” की दिशा में पहल हो चुकी है और महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी एक क्रांतिकारी कदम है, जो भारत में लागू होने जा रहा है। तीसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों में राजनीतिक जागरूकता और राजनीतिक शिक्षा होनी चाहिए, ताकि वे सही निर्णय ले सकें—जो समाज और राष्ट्र के लिए आवश्यक है।

एक और बात, राजनीतिक दलों से ऊपर उठकर “राष्ट्र पहले” की भावना अपनाई जानी चाहिए। सभी राजनीतिक दलों को इस सिद्धांत को मानना चाहिए।

राजनीति को इसी दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए और तुष्टिकरण की राजनीति, जिसने सामाजिक ताने-बाने, राष्ट्रीय कल्याण और एकता को नुकसान पहुंचाया है, उसे पूरी तरह समाप्त किया जाना चाहिए।

आईएएनएस: भारत के युवाओं के लिए आपका संदेश क्या है?

दत्तात्रेय होसबाले: युवा बने रहें, चुनौतियों को स्वीकार करें और जीवन भर सीखते रहें। भारत को महान बनाएं और मानवता की सेवा करें। पश्चिमीकरण को आधुनिकता न समझें। आधुनिक बनें, विज्ञान और तकनीक का उपयोग करें, लेकिन उसके गुलाम न बनें। उसे मानवता के कल्याण के लिए इस्तेमाल करें।

भारतीय युवाओं में अपार क्षमता है। उस क्षमता का उपयोग करें। बड़े सपने देखें और कड़ी मेहनत तथा सेवा की भावना के साथ उन्हें साकार करें।

—आईएएनएस

वीसी