दक्षिण कोरिया-भारत शिखर सम्मेलन में आर्थिक साझेदारी पर लगी मुहर, 2030 तक 50 अरब डॉलर व्यापार का लक्ष्य

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सियोल, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग भारत और वियतनाम की अपनी दो-देशों की यात्रा से स्वदेश लौट आए हैं, जहां उन्होंने मध्य-पूर्व संघर्ष से उत्पन्न अनिश्चितताओं से निपटने के लिए ऊर्जा और आपूर्ति शृंखलाओं में रणनीतिक सहयोग के विस्तार पर ध्यान केंद्रित किया है।

योनहाप समाचार एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ली ने दोनों देशों के नेताओं के साथ शिखर सम्मेलन आयोजित करने के बाद अपनी छह-दिवसीय यात्रा समाप्त की, जिसका उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों में आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को और गहरा करना था।

सोमवार को, ली ने नई दिल्ली में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय शिखर सम्मेलन आयोजित किया और महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), वित्त और जहाज निर्माण सहित अन्य क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की।

दोनों पक्षों ने अपने ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ को अपग्रेड करने के लिए बातचीत में तेजी लाने का भी संकल्प लिया। देशों का कहना है कि इससे 2030 तक उनका द्विपक्षीय व्यापार मौजूदा 25 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर तक पहुंचने में मदद मिलेगी।

बुधवार को, ली ने हनोई में वियतनाम के शीर्ष नेता टो लाम के साथ शिखर-स्तरीय वार्ता की और ऊर्जा, बुनियादी ढांचे तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने साथ ही आपूर्ति शृंखलाओं के लिए समन्वय बढ़ाने पर सहमति जताई।

शिखर सम्मेलन के बाद ली ने कहा, “मध्य पूर्व में हाल के घटनाक्रमों को देखते हुए, हम ऊर्जा संसाधनों और प्रमुख कच्चे माल की स्थिर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए द्विपक्षीय सहयोग को मज़बूत करना जारी रखेंगे।”

दोनों पक्षों ने अपने ‘व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते’ को उन्नत करने के लिए बातचीत में तेजी लाने का भी संकल्प लिया। वहीं देशों का कहना है कि इससे 2030 तक उनका द्विपक्षीय व्यापार मौजूदा 25 अरब डॉलर से बढ़कर 50 अरब डॉलर तक पहुंचने में मदद मिलेगी।

दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था और लगभग 1.5 अरब की आबादी वाले देश भारत के साथ सहयोग बढ़ाने के लिए, ली-मोदी शिखर सम्मेलन के दौरान 15 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए गए।

विशेष रूप से, ली ने जहाज निर्माण क्षेत्र में सहयोग की उम्मीद जताई। यह उम्मीद उस समझौते पर हस्ताक्षर के बाद व्यक्त की गई, जिसके तहत इस दक्षिण एशियाई देश में एक शिपयार्ड के संयुक्त निर्माण की नींव रखी जाएगी।