Tuesday, June 23, 2026
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तकनीक सहायक है, लेकिन संगीत एक ‘आध्यात्मिक साधना’ है: मुज्तबा अजीज नजा

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मुंबई, 25 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय संगीत जगत के जाने-माने पार्श्वगायक, कव्वाल और संगीतकार मुज्तबा अजीज नजा ने समाचार एजेंसी आईएएनएस के साथ संगीत की बदलती दुनिया, तकनीक का बढ़ता प्रभाव और अपनी सूफी विरासत पर बातचीत की।

उन्होंने स्पष्ट किया कि संगीत केवल सुरों का खेल नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक साधना है, जिसे एआई कभी रिप्लेस नहीं कर सकती।

गायक ने एआई के बढ़ते हस्तक्षेप पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि तकनीक भले ही सहायक हो सकती है, लेकिन वह संगीत की ‘रूह’ को नहीं छू सकती। उन्होंने कहा, “संगीत बेहद भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव है। एआई केवल उन सीमाओं के भीतर काम करता है, जो उसे सिखाई गई है।”

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि सूफी और कव्वाली जैसी विधाएं सीधे दिल से निकलती हैं और रूहानी प्रेरणाओं पर आधारित होती हैं। ऐसी भावनाओं को एक मशीन कभी महसूस नहीं कर सकती और न ही उनकी रचना कर सकती है।

मुज्तबा अजीज नजा आगामी प्रोजेक्ट ‘डूमेडिका सुल्तान’ लेकर आ रहे हैं। उन्होंने अपने प्रोजेक्ट की जानकारी देते हुए बताया कि इसमें उनकी सूफी जड़ों की गहरी झलक देखने को मिलेगी। उन्होंने बताया, “यह गाना बहुत पहले तैयार हो गया था, लेकिन किसी वजह से उस समय रिलीज नहीं हो पाया। अब मैं इसे स्वतंत्र रूप से रिलीज करने जा रहा हूं।”

मुज्तबा अजीज नजा ने फिल्मी गानों और स्वतंत्र संगीत के बीच के अंतर पर कहा, “फिल्मों में काम करते समय एक कलाकार को निर्देशक, प्रोड्यूसर और कंपोजर जैसे कई लोगों के नजरिए को ध्यान में रखना पड़ता है। इससे अक्सर एक कलाकार की अपनी अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है। इसके विपरीत, स्वतंत्र संगीत में कलाकार को पूरी रचनात्मक आजादी मिलती है। आज सोशल मीडिया के दौर में कलाकारों के पास अपने दर्शकों तक सीधे पहुंचने का जरिया है, जो इंडिपेंडेंट म्यूजिक के लिए एक वरदान साबित हो रहा है।”

उन्होंने लाइव इवेंट्स और कव्वाली के अनुभवों पर बात करते हुए एक दिलचस्प बात बताई। उन्होंने बताया, “भले ही मैं गानों की एक सूची तैयार करके मंच पर जाता हूं, लेकिन असल जादू दर्शकों की ऊर्जा से होता है। मंच पर जाते ही जब दर्शकों की प्रतिक्रिया मिलती है तो हम मौके पर ही खुद को ढाल लेते हैं। गानों का फ्लो दर्शकों के मूड के हिसाब से बदल जाता है। कव्वाली की यही सहजता इसे अन्य विधाओं से अलग बनाती है।”

आज के व्यावसायिक युग में मुज्तबा अजीज नजा ने संगीत को ‘आध्यात्मिक साधना’ बताया। उन्होंने दुख जाते हुए कहा कि आज संगीत को केवल रोजी-रोटी का जरिया या प्रोफेशन माना जाने लगा है, जिससे उसमें मौजूद भक्ति-भाव कम हो रहा है। संगीत के लिए जिस धैर्य और समर्पण की आवश्यकता है, वह आज की युवा पीढ़ी में कम ही देखने को मिलता है।