Monday, June 22, 2026
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भारतीय सेना की राइजिंग स्टार कॉर्प्स ने दिखाई ‘रेकी वॉरियर्स’ की ताकत, जानें ये कैसे करते हैं काम

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नई दिल्ली, 26 अप्रैल (आईएएनएस)। भारतीय सेना की राइजिंग स्टार कॉर्प्स ने अपने आधिकारिक ‘एक्स’ हैंडल पर एक खास पोस्ट शेयर करते हुए ‘रेकी वॉरियर्स’ की ताकत और क्षमताओं को उजागर किया है।

आधिकारिक ‘एक्स’ पोस्ट में लिखा गया, “अदृश्य नजरें, बेजोड़ सटीकता। फ्लेउरडेलिस रेकी वॉरियर्स ने अपनी निगरानी, ​​स्थिति के बारे में जागरूकता और तेजी से जवाब देने की स्किल्स को बेहतर बनाया।”

दरअसल, ‘रेकी वॉरियर्स’ भारतीय सेना की विशेष और बेहद प्रशिक्षित स्काउटिंग यूनिट्स होती हैं, जो सीमा के पीछे जाकर खुफिया जानकारी जुटाने का काम करती हैं। इनका मुख्य लक्ष्य बिना नजर आए, तेजी और सटीकता के साथ दुश्मन की गतिविधियों और इलाके की जानकारी जुटाना होता है, ताकि सेना के कमांडर सही और तेज फैसले ले सकें।

संरचना की बात करें तो भारतीय सेना की हर आर्मर्ड रेजिमेंट और मैकेनाइज्ड इन्फैंट्री बटालियन में एक रेकी ट्रूप शामिल होता है। एक सामान्य ट्रूप में करीब एक अधिकारी और 30 जवान होते हैं। ये सैनिक कठिन परिस्थितियों में ट्रेनिंग लेते हैं और अक्सर डेजर्ट कॉर्प्स (कोणार्क कॉर्प्स) और व्हाइट टाइगर डिवीजन जैसी यूनिट्स द्वारा आयोजित हाई-इंटेंसिटी प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते हैं, जहां उनकी सहनशक्ति, दिशा ज्ञान और छिपकर काम करने की क्षमता को परखा जाता है।

‘रेकी वॉरियर्स’ अक्सर इंफैंट्री की ‘घातक प्लाटून’ के साथ मिलकर काम करते हैं। घातक प्लाटून को दुश्मन पर तेज और सटीक हमला करने के लिए जाना जाता है और रेकी यूनिट उन्हें जरूरी खुफिया जानकारी उपलब्ध कराती है।

‘रेकी वॉरियर्स’ की स्टील्थ (गुप्त रूप से काम करना) और स्पीड (तेजी) खासियत है। ये हल्के उपकरणों के साथ तेजी से आगे बढ़ते हैं ताकि दुश्मन की नजर से बच सकें। आधुनिक तकनीक के तहत इनके पास पोर्टेबल बैटलफील्ड सर्विलांस रडार (बीएफएसआर) जैसे उपकरण होते हैं, जो 700 मीटर दूर रेंगते व्यक्ति और 14 किलोमीटर दूर भारी वाहनों का पता लगा सकते हैं।

इसके अलावा, अब इन्हें ड्रोन और हाई-टेक कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे आधुनिक उपकरण भी दिए गए हैं, जिससे ये रियल-टाइम में जानकारी साझा कर सकते हैं। इनका मुख्य काम रूट की जांच, इलाके की निगरानी और दुश्मन की स्थिति को समझना होता है, जिससे सेना को रणनीतिक बढ़त मिलती है।