यादों में बिक्रमजीत कंवरपाल: भारतीय सेना का वह मेजर, जिसने 34 की उम्र में देखा बॉलीवुड का सपना

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मुंबई, 30 अप्रैल (आईएएनएस)। एक्टर बिक्रमजीत कंवरपाल सिर्फ एक अभिनेता नहीं थे, उनकी रगों में शौर्य की विरासत बहती थी। 29 अगस्त 1968 को हिमाचल प्रदेश के सोलन में जन्मे बिक्रमजीत के पिता मेजर द्वारका नाथ कंवरपाल भारतीय सेना के एक सम्मानित अधिकारी और ‘कीर्ति चक्र’ विजेता थे। आर्मी की छावनियों में पलने-बढ़ने वाले बिक्रमजीत के लिए अनुशासन कोई नियम नहीं, बल्कि जीवनशैली थी।

​देश के प्रतिष्ठित लॉरेंस स्कूल, सनावर में पढ़ाई के दौरान ही उनके भीतर अभिनय का बीज फूट चुका था। दोस्त उन्हें प्यार से ‘बिज’ या ‘बिजू’ बुलाते थे। स्कूल के नाटकों में वह अक्सर छाए रहते, लेकिन जब करियर चुनने की बारी आई, तो उन्होंने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए 1989 में भारतीय सेना के ‘हॉडसन्स हॉर्स’ (आर्मर्ड कॉर्प्स) में कमीशन प्राप्त किया।

​फौज में मेजर कंवरपाल का जीवन किसी रॉकस्टार से कम नहीं था। उनके बैचलर रूम में दोस्तों की महफिलें सजती थीं। शानदार अंग्रेजी बोलने वाले और गजब के खुशमिजाज बिक्रमजीत रस्साकशी से लेकर क्लब की पार्टियों तक, हर जगह लीडर हुआ करते थे।

​लेकिन यह जीवन सिर्फ पार्टियों तक सीमित नहीं था। उन्होंने दुनिया के सबसे खतरनाक युद्धक्षेत्र सियाचिन ग्लेशियर में भी अपनी सेवाएं दीं। हाड़कंपा देने वाली ठंड और हर पल मौत के साये ने उन्हें वह फौलादी आत्मविश्वास दिया, जिसके दम पर उन्होंने बाद में मायानगरी मुंबई के संघर्षों का हंसते हुए सामना किया। 13 वर्षों की शानदार सेवा के बाद, जब उनका सैन्य करियर बुलंदी पर था, मेजर कंवरपाल ने 34 साल की उम्र में उन्होंने कैमरे का सामना करने का फैसला लिया।

​उनकी पहली मुलाकात ​साल 2002 में मुंबई के खार इलाके में मशहूर अभिनेत्री और निर्देशक पूजा भट्ट से हुई और इसके बाद उन्हें पहली फिल्म ‘पाप’ (2003) में काम करने का मौका मिला। इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2000 के दशक में जब बॉलीवुड को यथार्थवादी किरदारों की जरूरत थी, मेजर कंवरपाल निर्देशकों की पहली पसंद बन गए।

​’कॉर्पोरेट’ में सीनियर वीपी, ‘डॉन’ में डॉ. अशोक खिलवानी, ‘रॉकेट सिंह’ में खड़ूस बॉस इनामदार या ‘मर्डर 2’ में कमिश्नर अहमद खान, जब भी पर्दे पर सत्ता, रुतबे या खौफ की बात आती, कंवरपाल का चेहरा सबसे सटीक बैठता था। उनका लहजा, उनकी शारीरिक मुद्रा और वह ठहराव इतना असली था कि उन्हें अभिनय करने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। यहां तक कि ‘फ्रोजन’ और ‘द गाजी अटैक’ जैसी फिल्मों में उन्होंने सैन्य सलाहकार के रूप में अपने असल जीवन के अनुभवों को सिनेमा के पर्दे पर उतारा।

टेलीविजन और ओटीटी की दुनिया में तो वे छा गए थे। ’24’ में एजेंट प्रधान, ‘अदालत’ में तेज-तर्रार वकील रंधावा और ‘स्पेशल ऑप्स’, ‘भौकाल’ और ‘योर ऑनर’ जैसी वेब सीरीज ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया।

​पर्दे पर बेहद सख्त दिखने वाले ‘बिजू’ असल जिंदगी में एक बेहद कोमल और जिंदादिल इंसान थे। सेट पर वह फौज वाले अनुशासन में रहते, लेकिन पैकअप के बाद वह क्रू के साथ सबसे ज्यादा मस्ती करने वाले इंसान थे।

​वह ‘सॉफ्ट रॉक’ संगीत के दीवाने थे। जब वह महफिल में गिटार पकड़कर जॉन डेनवर का ‘कंट्री रोड्स टेक मी होम’ गाते, तो सुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते। बेहतरीन डांसर होने के साथ-साथ वह सेट पर सबके ‘बड़े भाई’ थे, जो अपने सैन्य दिनों के किस्से सुनाकर लोगों में जोश भर देते थे।

2021 में, जब कोरोना वायरस की दूसरी लहर ने पूरे देश को अपनी चपेट में ले लिया था, ​बिक्रमजीत कंवरपाल भी इस जानलेवा वायरस का शिकार हो गए। सियाचिन की बर्फीली खाइयों और वहां मंडराती मौत को मात देने वाला यह सैनिक मुंबई के एक अस्पताल में वायरस से जंग हार गया। 1 मई 2021 की सुबह, उन्होंने अपनी अंतिम सांस ली।