तिब्बत में चीन के कथित अत्याचारों पर अमेरिका का सख्त रुख, नया बिल पेश

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वॉशिंगटन, 2 मई (आईएएनएस)। अमेरिका के सीनेटर रिक स्कॉट और जेफ मर्कले ने हाल ही में ‘तिब्बत एट्रोसिटीज डिटरमिनेशन एक्ट’ पेश किया है। इस कानून के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री को यह तय करना होगा कि चीन की ओर से तिब्बत में की जा रही कार्रवाइयां जनसंहार या मानवता के खिलाफ अपराध हैं या नहीं।

आधिकारिक बयान के मुताबिक, यह बिल 29 अप्रैल को पेश किया गया, जो तिब्बती यूथ कांग्रेस की ओर से मनाए जाने वाले ‘शहीद दिवस’ के साथ मेल खाता है। इस दिन उन लोगों को याद किया जाता है जिन्होंने तिब्बत की आजादी के लिए अपनी जान दी।

सीनेटर स्कॉट ने कहा, “कम्युनिस्ट चीन तिब्बत में जनसंहार कर रहा है। इससे बचने का कोई रास्ता नहीं है। बीजिंग की सरकार ने तिब्बती लोगों पर अत्याचार करते हुए हत्या, यातना, जबरन नसबंदी, जबरन विस्थापन, सरकार द्वारा अपहरण और कई तरह के मानवाधिकार उल्लंघन किए हैं। यह उसी तरह है जैसे वह उइगर मुसलमानों के खिलाफ भी कर रहा है, ईसाइयों को दबा रहा है और मेरे दोस्त जिमी लाई जैसे राजनीतिक कैदियों को जेल में डाल रहा है।”

उन्होंने कहा, “यह खून-खराबा रुकना चाहिए और चीन को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए। मुझे खुशी है कि मैं सीनेटर मर्कले के साथ मिलकर इस दिशा में काम कर रहा हूं।”

सीनेटर मर्कले ने भी तिब्बतियों पर हो रहे लगातार अत्याचारों पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि‍ चीन तिब्बतियों की संस्कृति मिटाने, बच्चों को परिवार से अलग करने, निगरानी बढ़ाने, जेल में डालने और यातना देने जैसे काम कर रहा है। ऐसे में अमेरिका चुप नहीं रह सकता। चीन लगातार अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत तिब्बती लोगों के अधिकारों को नजरअंदाज कर रहा है, और हमें साफ कहना होगा कि इन अपराधों को अनदेखा नहीं किया जाएगा।”

बयान में अमेरिका के विदेश विभाग और मानवाधिकार संगठनों की रिपोर्ट्स का भी जिक्र किया गया है। इन रिपोर्ट्स में कहा गया है कि तिब्बत में जबरन गायब करना, बिना वजह हिरासत में रखना, यातना देना और खास तौर पर तिब्बतियों को निशाना बनाना जारी है। इसमें 1995 में गायब हुए उस बच्चे का मामला भी शामिल है, जिसे दलाई लामा ने 11वें पंचेन लामा के रूप में पहचाना था और जिसका आज तक कुछ पता नहीं चला।

इसके अलावा, कई रिपोर्ट्स में यह भी सामने आया है कि तिब्बत में बड़े पैमाने पर बोर्डिंग स्कूल चलाए जा रहे हैं, जहां बच्चों को उनके परिवारों से अलग रखा जाता है। इन स्कूलों में तिब्बती भाषा और संस्कृति को सीमित किया जाता है और बच्चों को राजनीतिक सोच के मुताबिक ढालने की कोशिश की जाती है, साथ ही उन पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।

बयान में कहा गया है कि इतने सारे सबूत सामने आने के बाद अब यह जरूरी हो गया है कि यह जांच की जाए कि चीन की नीतियां 1948 के ‘जनसंहार कन्वेंशन’ के तहत जनसंहार की श्रेणी में आती हैं या फिर ये मानवता के खिलाफ अपराध हैं।